प्लस टू शक्षिक के 600 पद खाली

Author : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 03 Dec 2015 8:45 PM

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प्लस टू शिक्षक के 600 पद खाली हजारों छात्रों को नहीं हो सकी कई विषयों की पढ़ाई इंटर की परीक्षा की तैयारी में छूट रहे पसीने अधिकांश प्लस टू विद्यायों में कई विषयों के शिक्षक नहीं दरभंगा : बिहार बोर्ड की इंटर परीक्षा में तीन महीने से भी कम का वक्त बचा है. परीक्षार्थी गंभीरतापूर्वक […]

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प्लस टू शिक्षक के 600 पद खाली हजारों छात्रों को नहीं हो सकी कई विषयों की पढ़ाई इंटर की परीक्षा की तैयारी में छूट रहे पसीने अधिकांश प्लस टू विद्यायों में कई विषयों के शिक्षक नहीं दरभंगा : बिहार बोर्ड की इंटर परीक्षा में तीन महीने से भी कम का वक्त बचा है. परीक्षार्थी गंभीरतापूर्वक डिविजन के रणनीति पर काम कर रहे होंगे. भला हो भी क्यों नहीं, इस परीक्षा से उनके कैरियर की दिशा निर्धारित होती है. डॉक्टर, इंजीनियर क्षेत्र में कैरियर बनाने वाले छात्रों के लिए इसके विषय वस्तु की पूरी जानकारी आवश्यक है. वहीं सिविल सेवा सहित अन्य क्षेत्रों के लिए इंटर की परीक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है. प्रत्येक वर्ष जिला से हजारों छात्र सम्मिलित होते हैं. इस बार भी इस परीक्षा के तीनों संकायों से 31 हजार छात्रों को शामिल होने की संभावना है. इसमें शामिल होने वाले छात्रों की पढ़ाई कॉलेज अथवा प्लस टू विद्यालयों में हुई है. इसमें से अधिकांश परीक्षार्थी ऐसे विद्यालय से हैं, जहां विषयवार शिक्षक तक उपलब्ध नहीं है. अभीभी इन विद्यालयों में प्लस टू के 600 से ज्यादा पद रिक्त हैं. वहीं हाल के वर्षों में अपग्रेड विद्यालयों में संसाधनों की घोर कमी है. अलग-अलग कक्षाओं के लिए वर्ग कक्ष, उपस्कर, प्रयोगशाला, लाइब्ररी आदि की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है. कई स्कूलों में निर्माण कार्य कछुआ की गति से चल रही है. ऐसे में इन विद्यालयों में अध्ययनरत करीब 50 फीसदी छात्र-छात्राओं का सिलेबस कैसे हुआ होगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं होगा. संभावना है कि इस विद्यालय में पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं प्राइवेट ट्यूशन का सहारा लिये होंगे, तो फिर ऐसे में प्रश्न उठना लाजिमी है कि जिस शिक्षा पर सरकार सालाना लाखों-करोड़ों व्ययय करती है उससे अगर उनके लिए शिक्षा की समुचित व्यवस्था नहीं है तो आज की पीढ़ी की शिक्षा में किस प्रकार की गुणवत्ता होगी. इनका भविष्य कैसा होगा. यह गंभीर विचारणीय विषय है. सभी हाइस्कूलों को है प्लस टू का दर्जा जिले के सभी 79 हाइस्कूलों को वर्तमान में प्लस टू का दर्जा मिला हआ है, जहां इंटर की पढ़ाई होना है. इन विद्यालयों से करीब 15 हजार छात्र इसबार की इंटर परीक्षा के लिए पंजीकृत हैं. वर्ष 89 में 5 राजकीय माध्यमिक विद्यालयों को प्लस टू का दर्जा मिला था. इसके बाद वर्ष 2007 में 16 एवं इसके बाद 2008 से 2013 तक सभी हाइस्कूलों में इंटर की पढ़ाई शुरू है. विभिन्न विषयों के 600 पद रिक्त प्लस टू शिक्षकों के विभिन्न विषयों के 600 से ज्यादा पद रिक्त हैं. कई प्लस टू विद्यालयों में कई विषयों के शिक्षक नहीं हैं. ऐसे में इन विषयों की पढ़ाई नहीं हुई होगी. विज्ञान विषय की बात करें तो भौतिकी, रसायन एवं गणित विषयों में से प्रत्येक के 50-50 पद अभी भी रिक्त है. वहीं अंग्रेजी के 115, मनोविज्ञान विषय के 53 तथा समाजशास्त्र में 58 पद रिक्त है. भाषा विषयों में एनआरबी हिंदी, उर्दू, मैथिली में भी प्रत्येक के 40 पद खाली है. इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि कई विद्यालय ऐसे हैं जहां इन विषयों के शिक्षकों का पदस्थापन तक नहीं हो सका है. कोचिंग व प्राइवेट ट्युशन पर निर्भरता कई छात्रों ने बताया कि नामांकित स्कूलों में शिक्षकों की वजह से सिलेबस पूरा नहीं होने की बात स्वीकारते हैं. उनका कहना है कि इसकी भरपाई प्राइवेट ट्युशन अथवा कोचिंग से पूरा कर रहे हैं. कईयों का कहना है कि स्वाध्याय एवं मार्गदर्शन से इसकी तैयारी में जुटने की बात कहते हैं. संगीत व कंप्यूटर शिक्षकों की कमी उच्च माध्यमिक विद्यालयों में संगीत व कंप्यूटर विषयों की नियोजन प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाने के कारण कंप्यूटर के 11 एवं संगीत के 37 पद खाली है. विद्यालय प्रशासन की विवशता जब विद्यालय में आधारभूत संरचना एवं विषयवार शिक्षक नहीं होंगे तो उन विषयों की पढ़ाई कैसे होगी. यही विवशता अधिकांश विद्यालय प्रशासन का है. कई प्रधानाध्यापकों का कहना है कि कई विषयों के शिक्षक पद खाली रहने के कारण छात्रों की इन विषयों की पढ़ाई करा पाना संभव नहीं हो पाता है. बॉक्स::::::::::::::नाम किसी का, काम किसी और का दरभंगा : जब इंटर परीक्षा के परिणाम निकलते हैं तो जिलों के टॉपर में ऐसे विद्यालयों के टॉपर निकलते हैं, जहां उन्हें पठन-पाठन की मूलभूत सुविधा तक नहीं है. ऐसे में इसपर प्रश्न उठना लाजिमी है कि इतने कम सुविधा में यहां के छात्र कैसे टॉपरों में शामिल हुए. कहीं ऐसा तो नहीं है कि ये छात्र का नामांकन इस कॉलेज अथवा प्लस टू विद्यालयों में औपचारिक तो नहीं है. ऐसी संभावना की गुंजाइश ज्यादा रहती है क्योंकि बताया जा रहा है कि टॉपरों का श्रेय इनके प्राइवेट ट्युशन अथवा काेचिंग संस्थान का होता है जहां के शिक्षा के आधार पर अच्छा रिजल्ट प्राप्त होता है. इस परिणामों के बाद कई संस्थान अथवा ट्यूटर दावा भी करते हैं. ऐसे में इस तरह की परंपरा सरकारी स्कूली शिक्षा का क्या संदेश जाता है इसपर गंभीर विचार की जरूरत है.

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