कैंपस.... मिथिला का दर्शन आत्मज्ञान का सारांश : प्रोवीसी

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 30 Nov 2015 9:42 PM

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कैंपस…. मिथिला का दर्शन आत्मज्ञान का सारांश : प्रोवीसीप्रत्येक क्षेत्र में दार्शनिक दृष्टि का महत्व दो दिनी राष्ट्रीय सेमिनार प्रमाण पत्र वितरण के साथ संपन्न फोटो संख्या- 15परिचय- प्रमाण पत्र के साथ छात्र-छात्राएं दरभंगा : मिथिला का दर्शन आत्मज्ञान है. भारतीय दर्शन के प्राचीन काल के आचार्य याज्ञवल्क्य ने अपनी पत्नी मैत्रेयी को आत्मज्ञान दिया […]

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कैंपस…. मिथिला का दर्शन आत्मज्ञान का सारांश : प्रोवीसीप्रत्येक क्षेत्र में दार्शनिक दृष्टि का महत्व दो दिनी राष्ट्रीय सेमिनार प्रमाण पत्र वितरण के साथ संपन्न फोटो संख्या- 15परिचय- प्रमाण पत्र के साथ छात्र-छात्राएं दरभंगा : मिथिला का दर्शन आत्मज्ञान है. भारतीय दर्शन के प्राचीन काल के आचार्य याज्ञवल्क्य ने अपनी पत्नी मैत्रेयी को आत्मज्ञान दिया था जो भारतीय दर्शन का सारांश है. उक्त बातें ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ सैयद मुमताजुद्दीन ने कही. बतौर मुख्य अतिथि वे एमआरएम कॉलेज में चल रहे दो दिनी राष्ट्रीय सेमिनार के समापन समारोह में सोमवार को बोल रहे थे. आयोजक कॉलेज के दर्शन विभाग व सीएम कॉलेज के संस्कृत विभाग के संयुक्त तत्वावधान में भारतीय दर्शन के विकास में मिथिला का योगदान विषयक यूजीसी संपोषित सेमिनार में कुलसचिव डॉ अजीत कुमार सिंह ने गीता के कर्मयोग को चरितार्थ करने वाले राजर्षि जनक के चिंतन का विश्लेषण किया तथा विस्तार से दार्शनिकों के नामों का उल्लेख करते हुए कहा कि हमें किसी भी क्षेत्र में कार्य करने के लिए दार्शनिक दृष्टि रखना आवश्यक है. वहीं तिरूपति के डॉ राधाकांत ठाकुर ने कहा कि भारतीय दर्शन की महत्ता इस बात से प्रभावित होती है कि आज भी दक्षिण के दिग्गज विद्वान मिथिला आकर इस यज्ञ भूमि को प्रणाम करने के लिए लालायित रहते हैं. इस सत्र को संस्कृत पीजी विभाग के डॉ जयशंकर झा, डॉ विद्यानाथ झा आदि ने संबोधित किया. सीएम कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ वीरेंद्र कुमार चौधरी की अध्यक्षता में हुए समापन सत्र में इसी कॉलेज के संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ आरएन चौरसिया ने अतिथियों का स्वागत किया तथा संचालन डॉ पुनीता झा एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ रूपकला सिन्हा ने किया. इस सत्र में डॉ अमरनाथ झा, डॉ कृष्ण कुमार चौधरी, डॉ कन्हैया चौधरी सहित कई विद्वान, शिक्षक, शोधार्थी एवं दोनों महाविद्यालय के शिक्षा कर्मी मौजूद थे. समापन समारोह के दौरान 300 प्रतिभागियों को प्रतिकुलपति के हाथो प्रमाण पत्र दिया गया. /इमिथिला ने दी दर्शन को नयी दिशा/इइससे पूर्व सेमिनार के दूसरे दिन के प्रथम तकनीकी सत्र में जेएनयू के प्रो ठाकुर शिवलोचन शांडिल्य ने मीमांसा दर्शन एवं मिथिला के दार्शनिकों की योगदान पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि मीमांसा, कुमारील भट्ट, प्रभाकर तथा मुरारी मिश्र ये तीन प्रमुख सत्य हुए हैं. मीमांसा दर्शन कर्मकांड का मूलक है, परंतु दार्शनिक दृष्टि से यह वाक्य विज्ञान है. वर्तमान में भारतीय दर्शन ही प्रमुख धाराएं है. तर्क और भाषा विश्लेषण तर्क से संबधित गहन चिंतन न्यायदर्शन में होता है तथा मीमांसा दर्शन भाषा विश्लेषण पर जोड़ दिया गया है. उन्होंने कहा कि मिथिला में प्राचीन और आधुनिक दोनों काल में वो उर्जा रही है जो भारतीय दर्शन को एक नयी दिशा प्रदान कर सकती है. इस सत्र में 10 शोध पत्र पढ़े गये तथा उनपर गहन विमर्श किया गया. इसमें डॉ अरूणधती, धीरेश कांत झा, रघु कुमार झा, मणिशंकर झा आदि ने शोध पत्र पढ़े. इस सत्र की अध्यक्षता करते हुए दर्शन विभग के डॉ अमरनाथ झा ने कहा कि इस सेमिनार में शोधार्थियों तथा छात्रों ने अत्यंत ही विलक्षण शोध पत्र प्रस्तुत किये जो इस बात का संकेत है कि वर्तमान काल में भी नवीन दार्शनिक उदभावनाओं का सृजन हो रहा है. वहीं दूसरे तकनीकी सत्र की अध्यक्षता विभागाध्यक्ष डॉ रामनाथ सिंह तथा संचालन डॉ शिखरवासिनी ने किया.

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