राज्यसभा में उठी दिल्ली यूनिवर्सिटी में मैथिली भाषा पढ़ाये जाने की मांग

By Prabhat Khabar Digital Desk
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नयी दिल्ली : राज्यसभा में मंगलवार को भाजपा के एक सदस्य ने शून्यकाल के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में मैथिली भाषा भी पढ़ाये जाने की मांग की. भाजपा के प्रभात झा ने इसे लोकहित से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बताते हुए कहा कि मैथिली भाषा के ऐतिहासिक और सामाजिक महत्व के मद्देनजर डीयू में भी इसकी पढ़ाई होनी चाहिये.प्रभात झा ने सभापति एम वेंकैया नायडू की अनुमति से मैथिली भाषा में ही सदन में अपनी बात रखी.

उन्होंने कहा कि कोलकाता और बनारस विश्वविद्यालय में भी बहुत पहले से यह भाषा पढ़ाई जा रही है. उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के अलावा नेपाल में भी मैथिली का बहुतायत में प्रयोग देखते हुए इस भाषा की लोकप्रियता का अंदाज लगाया जा सकता है. प्रभात झा ने कहा कि दिल्ली में पूर्वांचल क्षेत्र के लगभग 40 लाख से अधिक लोगों की मौजूदगी को देखते हुए डीयू में मैथिली भाषा की पढ़ाई शुरू की जानी चाहिए.

तृणमूल कांग्रेस की डोला सेन ने देश के संविधान की पहली हस्तलिखित प्रति के शिल्पकार और गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर के शिष्य नंदलाल बोस की तस्वीर संसद के केंद्रीय कक्ष में लगवाने की मांग की. सेन ने कहा कि आज बोस की जयंती है और स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान को देखते हुए संसद में उनकी तस्वीर लगाना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी. इस पर सभापति एम वेंकेया नायडू ने कहा कि एक संबंधित समिति ने संसद भवन में और प्रतिमाएं तथा तस्वीर लगाने पर रोक की सिफारिश की है.

शून्यकाल में ही बीजद के अमर पटनायक ने जिला खनन निधि के संचालन से जुड़़े न्यास को आयकर और जीएसटी के दायरे से बाहर रखने की मांग उठायी. कांग्रेस के विवेक तन्खा ने संचार क्षेत्र की निजी कंपनियों के भारी घाटे और सार्वजनिक क्षेत्र की संचार कंपनी बीएसएनएल और एमटीएनएल की बदहाली को देखते हुए एक ही कंपनी के एकाधिकार को देशहित के लिये घातक बताया और सरकार से बाजार में प्रतिस्पर्धा को बरकरार रखने की मांग की.

भाजपा के सुरेन्द्र सिंह नागर ने फर्जी कॉल सेंटर के माध्यम से ऑनलाइन ठगी के बढ़ते मामलों का मुद्दा शून्यकाल में उठाया और सरकार से इस दिशा में सख्त कानून बनाकर इनके खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की. कांग्रेस के प्रताप सिंह बावजा ने सिख शासक महाराजा रणजीत सिंह और उनके पुत्र महाराजा दिलीप सिंह के ब्रिटिश शासन के खिलाफ सक्रिय योगदान का हवाला देते हुये उनके अस्थि अवशेष ब्रिटेन से भारत वापस लाने की मांग की.

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