गंडक के विस्थापितों का बसेरा बना पुजहा

Published at :07 Sep 2013 4:19 AM (IST)
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गंडक के विस्थापितों का बसेरा बना पुजहा

पुजहाः बेतिया से लगभग 12 किलोमीटर दूर उत्तरी पटजिरवा पंचायत का पुजहा गांव. गांव जाने के लिए अच्छी सड़क. कुछ दशक पहले इस इलाके को मिनी चंबल कहा जाता था. भांगड़ यादव, हरिहर यादव, लालू यादव व वंशी यादव जैसे दस्यु सरगना थे, लेकिन अब स्थिति बदली हुई है. पुजहा गांव अब विस्थापितों का बसेरा […]

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पुजहाः बेतिया से लगभग 12 किलोमीटर दूर उत्तरी पटजिरवा पंचायत का पुजहा गांव. गांव जाने के लिए अच्छी सड़क. कुछ दशक पहले इस इलाके को मिनी चंबल कहा जाता था. भांगड़ यादव, हरिहर यादव, लालू यादव व वंशी यादव जैसे दस्यु सरगना थे, लेकिन अब स्थिति बदली हुई है. पुजहा गांव अब विस्थापितों का बसेरा बन गया है. यहां चार पंचायतों के विस्थापित रहते हैं, जिनकी संख्या हजारों में है. स्थिति यह है, गांव में अब सार्वजनिक स्थान का अभाव हो गया है.

गंडक पार करना मजबूरी

बांध के किनारे बसे पुजहा गांव में रहनेवाले ज्यादातर लोगों की खेती-बारी गंडक के पार है. लोगों को वहीं जाना पड़ता है. बच्चों से लेकर महिलाएं और बूढ़ों तक को. रोज सुबह गंडक पार. खेतों में काम के बाद शाम को फिर से वापसी. यही यहां के लोगों की नीयति बन गयी है. स्थानीय लोग प्रशासन से नाखुश दिखते हैं. इनका कहना है, एक नाव तक नहीं मुहैय्या करायी गयी है. पिछले सालों में जिन लोगों ने नाव चलायी थी. उन्हें पैसा नहीं मिला. इस वजह से अब कोई नाव चलाने के लिए तैयार नहीं होता, जो सक्षम लोग हैं, उनके पास अपनी नाव है, जबकि अन्य लोगों को किराया देकर नाव से आर-पार आना जाना पड़ता है.

मौखिक बेची जमीन

पुजहा गांव में देवी स्थान है. इसी की सबसे ज्यादा मान्यता है. इसी के आसपास बाजार है. गांव में झोपड़ियों की संख्या ज्यादा है. पक्के घर कम. समाजिक कार्यकर्ता गिरधारी कहते हैं, पहले गांव में सस्ती जमीन थी, लेकिन जब उत्तरी पटजिरवा की पांच वार्ड, श्रीनगर पंचायत, मोतीपुर पंचायत में गंडक का कटाव शुरू हुआ. वहां के लोग यहां आकर बसने लगे तो जमीन की कीमत बढ़ गयी. लोगों ने सरकारी जमीन को अपनी बता कर मौखिक रूप से ही बेच दिया. आपदा के मारे लोग क्या करते. मुंहमागी कीमत पर जमीन खरीद यहां बस गये, लेकिन यहां की भी जिंदगी अच्छी नहीं है. हां, बांध के अंदर बसे लोगों से बेहतर जरूर है.

कम हुई कीमत

कुछ साल पहले जहां पुजहा गांव में जमीन की कीमत हजारों में थी. वहीं 2009 तक एक लाख रुपये कट्ठा पहुंच गयी, लेकिन 2012 में गंडक ने पुजहा गांव की ओर भी कटाव शुरू कर दिया. प्रशासन के सामने बांध को बचाने की चुनौती थी, लाखों खर्च करके कटाव निरोधी काम शुरू हुआ. अभी स्थिति ठीक है. गांव के लोग कहते हैं, खतरा टला नहीं है. नदी की धार कभी भी मुड़ सकती है. उससे गांव के अस्तित्व पर संकट पैदा हो सकता है. इसी वजह से गांव में जमीन की कीमत अब पचास हजार रुपये कट्ठा रह गयी है.

नहीं मिली जमीन

गिरधारी कहते हैं, 573 साथ उत्तरी पटजिरवा पंचायत में एक साथ विस्थापित हुये थे, लेकिन उन्हें अभी तक नहीं बसाया जा सका है. इसमें से दो सौ लोगों को जमीन का परचा मिला, लेकिन किसी को जमीन का कब्जा अभी तक नहीं मिल सका है. ऐसी व्यवस्था है. प्रशासन केवल बांध को बचाने में लगा है, लोगों की चिंता उसको नहीं है.

पछुआ लाती है परेशानी

पुजहा गांव से नदी पार जा रही कुछ महिलाएं कहती हैं, जब-जब पछुआ चलती है. नदी का कटाव और बढ़ जाता है. भले ही बारिश नहीं हो रही है, लेकिन पछुआ का बहना हम लोगों के लिए ठीक नहीं है. अभी वार्ड 13 पर दवाब बना हुआ है. उसके पास बांध को बचाने में प्रशासन लगा हुआ है, लेकिन नदी का रुख. कब बदल जाये.

नहीं होती शादी

विस्थापितों के यहां की लड़कियों की शादी तो हो जाती है, लेकिन लड़कों की शादी होने में कठिनाई होती है. गांव में कोई रिश्ता लेकर भी आता है तो वह यहां की जीवन शैली को देख कर अपनी बेटी की शादी करने का इरादा छोड़ कर वापस लौट जाता है.

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