अतीत के आईने में चंपारण सत्याग्रह, बापू ने पढ़ाया था स्वच्छता का भी पाठ, आज पीएम मोदी पढ़ायेंगे

By Prabhat Khabar Digital Desk
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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में चंपारण का खास महत्व इस वजह से है कि महात्मा गांधी ने सबसे पहले सत्याग्रह का पहला प्रयोग यहीं किया था. उन्होंने नील किसानों की लड़ाई लड़ी और उन्हें शोषण से मुक्त कराया. लेकिन, चंपारण सत्याग्रह का एक पक्ष स्वच्छता का संदेश भी था. 1917 में गांधी जी ने चंपारण के गांवों में स्वच्छता दूतों के साथ मिलकर साफ-सफाई का संदेश दिया था. मंगलवार (दस अप्रैल) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन स्वच्छाग्रहियों को संबोधित करेंगे, जो पिछले कई दिनों से समाज में स्वच्छता का संदेश दे रहे हैं.
भैरवलाल दास
रात के नौ बजे रहे थे. चंपारण में गांधीजी ने गोरख बाबू का घर छोड़कर जगपति लाल साहू के मकान में जाने का निर्णय लिया था. राजेंद्र बाबू परेशान थे कि इतनी रात में कुली का इंतजाम कैसे हो, ताकि सभी का सामान नये घर में ले जाया जाये. गांधीजी ने भांप लिया.
अपना बिस्तर बांधा और कंधे पर लादकर नये मकान तक पहुंच गये. यहां पर दूसरी परेशानी थी. घर साफ नहीं था. गांधीजी ने झाड़ू मंगवायी और अपने हाथों पूरा मकान साफ कर डाला. बाद में राजेंद्र बाबू ने लिखा कि गांधीजी ने पहली बार चंपारण में रात के दस बजे झाड़ू पकड़ी थी और उसी समय हमलोगों को साफ-सफाई का गहरा संदेश भी दिया था.
15 अप्रैल, 1917 को चंपारण पहुंचने के अगले दिन रामनवमी बाबू आदि के साथ हाथी पर बैठकर जब गांधी जसौलीपट्टी जा रहे थे, तो उस समय महिलाओं में व्याप्त पर्दा प्रथा व इससे होनेवाले नुकसान एवं गांवों की साफ-सफाई की चर्चा गांधीजी कर रहे थे. इस समय गांवों की स्थिति काफी चिंताजनक थी. खासकर छोटे बच्चे बीमारी से जल्दी प्रभावित हो जाते थे.
गांवों में गरीबी थी, इसलिए सार्वजनिक व्यवस्था जैसे कुआं, रास्ता आदि पर लोगों का ध्यान नहीं था. शिक्षा, खासकर स्त्री शिक्षा का घोर अभाव था. महिलाएं न तो अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देती थीं और न साफ-सफाई पर. महिलाएं अपने सिर में तेल डालने की स्थिति तक में नहीं थीं. तीसी को फुलाकर, गोंद जैसा बनाकर उससे अपना बाल बांधती थीं और लगभग 15 दिनों के बाद ही अपना बाल धोती थीं. बच्चों के स्वास्थ्य और साफ-सफाई की ओर किसी का ध्यान नहीं था.
चंपारण के गांवों में घूमकर गांधीजी समझ चुके थे कि यहां की मूल समस्या शिक्षा, स्वास्थ्य और साफ-सफाई है. तिनकठिया प्रथा की समाप्ति ही अब गांधीजी के आंदोलन का मूल बिंदु नहीं रह गया था. वह हर गांव में कम से कम एक कार्यकर्त्ता की नियुक्ति चाहते थे, जो ग्रामीणों को इन सब चीजों के बारे में ठीक से जानकारी दे सके. उनके समक्ष सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी की ओर से किये गये कार्य सबसे सटीक उदाहरण के रूप में थे. यही कारण है कि वहां के हरिकृष्ण देव को चंपारण का अध्ययन करने के लिए गांधीजी उन्हें लेकर आये.
पुणा, बेलगांव एवं गुजरात के महिला व पुरुष स्वयंसेवकगण नवंबर, 1917 में चंपारण पहुंच चुके थे. इन स्वयंसेवकों में कस्तूरबा, बुबन गोपाल गोखले, अवंतिकाबाई गोखले, दुर्गा बेन, मणि बेन, वीणापाणि साहू आदि थीं.
सबसे पहले बरहरवा लखनसेन में आश्रम की स्थापना की गयी और वहां पर गांधी के स्वयंसेवकों ने शिक्षा के साथ साफ-सफाई का अभियान शुरू किया. स्वयंसेवक गांवों में जाकर ग्रामीणों के साथ बैठक कर प्राथमिकता तय करते व कुदाल, फावड़ा, टोकरी एवं अन्य जरूरी सामानों की व्यवस्था करते. सबसे पहले कुआं के आसपास की गंदगी को साफ करते. आसपास की काली एवं गंदी मिट्टी दुर्गंध देती रहती थी. ये लोग काली एवं गंदी मिट्टी को हटाकर दूर फेंक देते और वहां पर साफ व स्वच्छ भर देते. अधिकतर कुओं का मुंडेर नीचा रहता था जिस कारण बरसात में बाहर का गंदा पानी कुएं में चला जाता और यही दूषित जल पीकर ग्रामीण बीमार रहते थे. स्वयंसेवक मुंडेर को ऊंचा कर देते. आसपास दातून की कूचियां फेंकी रहतीं, उसे उठाकर सुखा लेते और बाद में उसे जला देते.
गांव आने-जानेवाले रास्ते पर गंदगी रहती. स्वयंसेवक उसे भी साफ कर देते. बीमार लोगों को अरंडी का तेल, कुनैन की गोली और घाव पर लगाने के लिए मलहम दिया जाता.20 नवंबर, 1917 को भितिहरवा और जनवरी, 1918 में मधुबन में आश्रम सह विद्यालय की स्थापना की गयी.
इन आश्रमों में गांव के बच्चे गंदी अवस्था में आते और यहां पर महिला कार्यकर्ता उन्हें नहला-धुलाकर, बालों में कंघी कर, नाखून आदि साफ कर, गंदे कपड़े धोकर, सूखाकर और उन्हें साफ-सुथरा बनाकर वापस घर भेज देते. इसका असर ग्रामीण महिलाओं पर बहुत अधिक पड़ा और वे गांधी के महिला कार्यकर्ताओं की तरह व्यवहार करना सीखने लगीं. गांधीजी ने 1917 में चंपारण के सुदूर गांवों में महिला कार्यकर्ताओं को साफ-सफाई व अन्य कार्यों में लगाया. इस तरह उनका यह अनूठा प्रयास था. गांधीजी के इस स्वच्छता अभियान का चंपारण में बहुत अधिक असर पड़ा. जिन गांवों में गांधी के कार्यकर्ताओं ने अपना कार्य किया, वहां पर सामूहिक साफ-सफाई में काफी परिवर्तन दिखने लगा.
लेखक गांधीवादी िवचारक हैं.
....ताकि अगले साल बने स्वच्छ भारत
गांधीजी के दो सपनों (भारत छोड़ो और स्वच्छ भारत) में से एक को हकीकत में बदलने में लोगों ने मदद की. हालांकि, स्वच्छ भारत का दूसरा सपना अब भी पूरा होना बाकी है. एक भारतीय नागरिक होने की खातिर यह हमारी सामाजिक जिम्मेदारी है कि हम वर्ष 2019 में महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मनाये जाने तक उनके स्वच्छ भारत के सपने को पूरा करें.
भारत को स्वच्छ बनाने का काम किसी एक व्यक्ति या अकेले सरकार का नहीं है, यह काम तो देश के 125 करोड़ लोगों द्वारा किया जाना है जो भारत माता के पुत्र-पुत्रियां हैं. स्वच्छ भारत अभियान को एक जन आंदोलन में तब्‍दील करना चाहिए. लोगों को ठान लेना चाहिए कि वह न तो गंदगी करेंगे और न ही करने देंगे.
नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री (दो अक्तूबर, 2014 को स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत के मौके पर)
बोले स्वच्छाग्रही : स्वच्छता के प्रति एकजुट हो रहा समाज
स्वच्छता के प्रति समाज में लोगों की सोच बदली है. शौचालय जहां स्वच्छता वहां जैसे नारों ने शौचालय निर्माण के लिए लोगों को प्रेरित किया है. इसकी शुरुआत चंपारण की एेतिहासिक धरती से हुई. निकट भविष्य में इसका व्यापक असर दिखेगा.
मंजेश कुमार, मुंगेर
हमलोग अपने क्षेत्र में स्वच्छता के लिए लोगों को जागरूक कर रहे हैं. इसके प्रति समाज में लोगों की सोच बदल गयी है. हमलोग प्रधानमंत्री का अभिभाषण सुनेंगे और उनके विचारों को आत्मसात कर जो भी कमी होगी, उसे दूर करेंगे.
बसंती कुमारी, झारखंड
पहली बार ऐसा लग रहा है कि स्वच्छता के प्रति लोग एकजुट हो रहे हैं. यह काबिले तारीफ है. निकट भविष्य में हमलोग एक नये भारत से रूबरू होंगे. महात्मा गांधी ने चंपारण की धरती से जो संदेश दिया, उसे चहुंओर ले जायेंगे.
विनायक सत्य, गिरिडीह
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