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buxar news : सदर अस्पताल में सामान्य मरीजों को नहीं दी जाती है अल्ट्रासाउंड की सुविधा

buxar news : सुदूर क्षेत्रों से इलाज के लिए प्रतिदिन आते हैं 900 से 1000 मरीजगरीब मरीजों को 1000 रुपये देकर निजी केंद्रों में कराना पड़ रहा अल्ट्रासाउंडतकनीशियन के सहारे संचालित किये जा रहे निजी अल्ट्रासाउंड केंद्रअस्पताल की एकमात्र रेडियोलॉजिस्ट महिला डॉक्टर दिसंबर में योगदान के साथ चली गयीं एजुकेशन लीव पर

buxar news : बक्सर. सदर अस्पताल में इलाज कराने के लिए आने वाले मरीजों को अल्ट्रासाउंड जांच की सुविधा नहीं मिल पा रही है, जिसके कारण अल्ट्रासाउंड जांच के नाम पर पर मरीजों का आर्थिक शोषण हो रहा है.

जिले के सदर अस्पताल में पिछले 2012 से अबतक अल्ट्रासाउंड केंद्र सामान्य मरीजों के लिए संचालित नहीं हो सका है, जिसके कारण जिले के सुदूर क्षेत्रों से गरीब तबके के इलाज कराने के लिए पहुंचने वाले लोगों को जांच की सुविधा नहीं मिल पा रही है. इस कारण अल्ट्रासाउंड जांच मरीजों को अस्पताल से बाहर बाजार में कराना मजबूरी बन गयी है, जिससे उनका काफी अधिक आर्थिक दोहन होता है. इस बीच दिसंबर 2025 में एक महिला रेडियोलॉजिस्ट डॉ किरण कुमारी का पदस्थापना हुआ है. लेकिन, पदस्थापना के साथ ही एजुकेशन लीव पर कोर्स पूरा करने के लिए चली गयीं.

जिले के सदर अस्पताल में केवल गर्भवती महिलाओं का सरकार की महत्वाकांक्षी योजना प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान का लाभ भी पहुंचाने के लिए अल्ट्रासाउंड जांच की सुविधा 2021 में ओपीडी के तहत शुरू हुई है. सदर अस्पताल में प्रतिदिन करीब 30 गर्भवती महिलाओं को सुविधा मिल रही है. सदर अस्पताल में प्रतिदिन जिले के विभिन्न प्रखंडों से 800 से 900 मरीज प्रतिदिन इलाज कराने के लिए पहुंचते हैं. इसमें एक आंकड़़ा के अनुसार प्रतिदिन 10 प्रतिशत मरीजों को अल्ट्रासाउंड जांच की आवश्यकता होती है, जिन्हें बाजार में जांच के लिए प्रति जांच 900 से 1000 रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं. सरकार द्वारा जिले के अस्पतालों में डायलिसिस एवं सीटी स्कैन जैसी सुविधा पीपीपी मोड में मिल रही है, जबकि अल्ट्रासाउंड की सुविधा के लिए मरीजों को भटकना पड़ता है. वहीं अल्ट्रासाउंड की जांच को लेकर गरीब मरीजों का आर्थिक दोहन हो रहा है. वहीं ज्ञात हो कि 2012 में सदर अस्पताल में अल्ट्रासाउंड जांच की सुविधा मानक पर डॉक्टर नहीं होने के कारण तत्कालीन सीएस ने बंद कर दिया था.

अस्पताल में मरीजों के लिए 2012 से सेवा है बंद

जिले में पिछले 13 साल से अल्ट्रासाउंड जैसी महंगी जांच की सुविधा जिले के मरीजों को नहीं मिल रही है. जबकि, सदर अस्पताल में आइसीयू की सुविधा तक की सरकार ने व्यवस्था कर दी है. मानक के अनुसार डॉक्टर के नहीं होने का हवाला देते हुए केंद्र को बंद कर दिया गया. अल्ट्रासाउंड की सुविधा भी जिला के स्वास्थ्य विभाग के लचर प्रबंधन व्यवस्था के कारण मरीजों को नहीं मिल रही है. वहीं पिछले 13 साल में जिले के मुहल्ले में अल्ट्रासाउंड केंद्र हर गली-मुहल्ले में खुल गये हैं, जिन्हें स्वास्थ्य विभाग ने ही रजिस्ट्रेशन दिया है, जिसके संचालन में भी नीम हकीम खतरे जान की कहानी चरितार्थ हो रही है. विभागीय लापरवाही के कारण निजी अल्ट्रासाउंड तकनीशियन के सहारे ही संचालित हो रहे हैं, जो विभाग की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है. वहीं सदर अस्पताल में चिकित्सक की कमी का हवाला देकर 2012 से ही ओपीडी में सामान्य मरीजों के लिए अल्ट्रासाउंड जांच बंद कर दिया गया है. इसके साथ ही सदर अस्पताल में अत्याधुनिक व महंगी इलाज की सुविधा काफी सस्ते दर में पीपीपी मोड में मिलना शुरू हो गया है. लेकिन अल्ट्रासाउंड जांच के लिए मरीजों को अपनी जेब ढीली करनी पड़ रही है, जिसके कारण दूरदराज से आने वाले गरीब मरीजों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है.

सामान्य दिनों में प्रतिदिन 1000 तक पहुंचते हैं मरीज

सदर अस्पताल में प्रतिदिन दूरदराज के साथ ही सुदूरवर्ती इलाकों से 900 से 1000 की संख्या में मरीज पहुंचते हैं, जिसमें 400 से 500 की संख्या में केवल महिलाएं इलाज के लिए पहुंचती हैं. उन्हें सदर अस्पताल में मिल रही अल्ट्रासाउंड जांच की सुविधा फिलहाल नहीं मिल पा रही है, जिसके कारण गरीब मरीजों का प्रतिदिन आर्थिक दोहन अल्ट्रासाउंड जांच के नाम पर हो रहा है. उन्हें अल्ट्रासाउंड के लिए सदर अस्पताल के बाहर नीम हकीमों द्वारा संचालित केंद्रों पर निर्भर होना पड़ता है.

अस्पताल में न रेडियोलॉजिस्ट डॉक्टर और न ही टेक्निशियन उपलब्ध

सिविल सर्जन शिव कुमार प्रसाद चक्रवर्ती ने कहा कि सदर अस्पताल में कोई रेडियोलॉजिस्ट डॉक्टर नहीं है और न ही टेक्निशियन है. एक महिला डॉक्टर के माध्यम से गर्भवती महिलाओं की अल्ट्रासाउंड जांच की सुविधा मिल रही है. दिसंबर 2025 में एक रेडियोलॉजिस्ट डॉक्टर ने सदर अस्पताल में योगदान दिया है. पत्र के साथ ही एजुकेशन लीव का भी पत्र जारी था, जिन्होंने योगदान के बाद फिर से अपना एजुकेशन पूरा करने के लिए चली गयीं. एजुकेशन पूरा होने के बाद जिले में योगदान करेंगी.

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