रेलवे गेट में खराबी आने से कॉसन पर चलीं गाड़ियां

Published at :27 Dec 2015 6:30 PM (IST)
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रेलवे गेट में खराबी आने से कॉसन पर चलीं गाड़ियां

रेलवे गेट में खराबी आने से कॉसन पर चलीं गाड़ियांअप व डाउन दोनों लाइनों पर ट्रेनें रहीं बाधित चौसा. बक्सर-मुगलसराय रेलखंड के चौसा स्टेशन के पास बक्सर-कोचस मुख्य मार्ग पर अवस्थित 78(बी) रेलवे गेट में तकनीकी खराबी आने से शनिवार की शाम अप व डाउन में काॅसन के सहारे ट्रेनों को चलाया गया. जानकारी के […]

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रेलवे गेट में खराबी आने से कॉसन पर चलीं गाड़ियांअप व डाउन दोनों लाइनों पर ट्रेनें रहीं बाधित चौसा. बक्सर-मुगलसराय रेलखंड के चौसा स्टेशन के पास बक्सर-कोचस मुख्य मार्ग पर अवस्थित 78(बी) रेलवे गेट में तकनीकी खराबी आने से शनिवार की शाम अप व डाउन में काॅसन के सहारे ट्रेनों को चलाया गया. जानकारी के अनुसार शनिवार की शाम करीब पांच बजे उक्त रेलवे फाटक का चकरी का गुल्ला टूट गया और फाटक बंद हो गया, जिससे उक्त मार्ग पर दोनों तरफ वाहनों की कतार लग गयी. स्थानीय ग्रामीणों व रेल कर्मियों के द्वारा इमरजेंसी के तौर पर स्लाइडिंग गेट के जरिये फाटक खोल कर वाहनों को पास कराया जाता रहा.वहीं, ट्रेनों को काॅसन के सहारे पास कराया गया. शाम करीब सात बजे मैकेनिक द्वारा उक्त फाटक को ठीक किया गया, तब जाकर स्थित सामान्य हुई.तिलकुट की सोंधी खुशबू से महका बाजारमहंगाई के बावजूद मांग में नहीं है कमी फोटो संख्या-01 तिलकुट बनाते कारीगर.डुमरांव़ वैसे तो मकर संक्रांति आने में करीब बीस दिन शेष हैं, लेकिन तिलकुट का बाजार अभी से ही सज गया है. दर्जनों दुकानों पर कारीगरों द्वारा तिल, गफड़ एवं चीनी से निर्मित तिलकुट की कुटाई शुरू कर दी गयी है. तिलकुट की सोंधी खुशबू से पूरा डुमरांव बाजार महक रहा है. तिलकुट के कारोबारी बाहरी कारीगरों को बुला कर तिलकुट बनाने का काम करा रहे हैं. कई दुकानों पर दिन-रात गया, पटना सीटी व बिहारशरीफ के कारीगर अपने हुनर से तिलकुट बनाने में जुटे हैं. दर में हुई बढ़ोतरीमहंगाई की मार तिलकुट व्यवसाय पर भी पड़ा है़ बावजूद खपत में कोई कटौती नहीं है़ तिल, गुड़, चीनी महंगा होने से पिछले वर्ष की तुलना में इस साल तिलकुट के भाव में काफी उछाल आया है़ दुकानदार रामप्रसाद महेश व बद्री बताते हैं कि कारीगरों की मजदूरी भी बढ़ी है़ इन्हें एक माह की मजदूरी अग्रिम देकर बुलाना पड़ता है़मकर संक्रांति में अधिक खपतसूर्य जब मकर रेखा में प्रवेश करते हैं, तो मकर संक्रांति का पर्व मनता है. मान्यता के अनुसार इस दिन तिल, गुड़ खाने की विशेष परंपरा है़ मकर संक्रांति की विशेष तैयारी को लेकर नवंबर माह से ही कारीगरों का आना शुरू हो जाता है़ स्थानीय कारोबारी जगह-जगह दुकान खोल कर तिलकुट के निर्माण में लग जाते हैं. इन दुकानों पर बाहरी कारीगर तिलकुट बनाने का काम करते हैं.यहां भी हैं अच्छे कारीगरपुराना थाना रोड में दर्जनों ऐसे परिवार हैं, जिनके घरों में सालों भर तिलकुट बनता है़ स्थानीय कारीगर गुप्तेश्वर, सुरेश, कन्हैया आदि बताते हैं कि बाहरी कारीगरों के आने से ग्रामीण ग्राहक कम हुए हैं, लेकिन शहर के लोग हमलोगों के द्वारा बनाये गये तिलकुट स्वाद नहीं छोड़ते हैं. इन परिवारों द्वारा हर दिन तीन से चार क्विंटल तिलकुट की खपत होती है़तिलकुट का बाजार भाव 2014-2015गुड़ तिलकुट 160 200चीनी के तिलकुट 150 180खोआ तिलकुट 250 300खेती बारी विशेषफुलों की खेती कर चला रहे परिवार फोटो संख्या-02 फुल के खेत में किसान दिनेश माली.ब्रह्मपुर. प्रखंड के दर्जनों गांव के किसान लीक से हट कर पारंपरिक खेती को छोड़ फुलों की खेती कर समृद्धि की राह पर हैं. अवसर पूजा का हो या फिर शादी-विवाह का. फूलों की मांग तेजी से बढ़ी है और इसके साकारात्मक परिणाम भी देखने को मिल रहे हैं. एक दशक पूर्व ब्रह्मपुर में फूलों की खेती शुरू करनेवाले दिनेश माली बताते हैं कि शुरू-शुरू में तो लोगों ने मजाक उड़ाया और इसके साथ ही मुझे भी कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, पर हार नहीं माना. फूलों की मांग को देखते हुए मेरे लिए यह लाभ का सौदा साबित हुआ़ फिर हमारे व्यवसाय को देख दर्जनों लोग श्री भगवान माली, सुनील माली, बैजनाथ सिंह, अजय पाल, संतोष पाल आदि इस खेती को अपना कर इसका लाभ ले रहे है़ंसैकड़ों लोगों का होता है भरण-पोषणप्रखंड के बाबा बरमेश्वर नाथ मंदिर, बैजु बाबा मंदिर, रहमतुल्ल मजार, श्री राम मंदिर उधुरा, सहित कई गांवों के माली यहां से फुल खरीद कर ले जाते हैं और फुल बेच कर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं. अमूमन तीस रुपये किलो तक फूल बिकते हैं. लग्न के साथ-साथ अन्य अवरों पर फूल का बिक्री खूब होती है. दो बार होती है इसकी खेतीसाल में दो बार फूलों की बुआई कर इसकी खेती की जाती है और दो से तीन बार फूलों की सिंचाई की जाती है. जनवरी और अगस्त माह में दो महीने बाद फूलों का निकलना शुरू हो जाता है, जो तीन से चार महीने तक निकलते रहते हैं. एक एकड़ में इसकी खेती में 40 किलो यूरिया, पांच किलो पोटास, दो किलो जिंक एवं एक किलो उर्वरक फासफेट दिया जाता है़क्या कहते हैं किसानकिसान दिनेश माली का कहना है कि सरकारी स्तर पर अगर मदद मिले, तो इस खेती को और बढ़ाया जा सकता है, जिससे और भी लोगों को रोजगार उपलब्ध करा कर उनको भी रोजगार से फायदा मिल सकेगा. क्योंकि यहां बाजार नहीं है और क्षेत्रिय स्तर पर इसके व्यवसाय से ज्यादा लाभ नहीं मिल पाता.क्या कहते हैं कृषि पदाधिकारी कृषि पदाधिकारी गोपाल सिंह का कहना है कि पारंपरिक खेती से हटकर इस प्रकार की खेती को बढ़ावा देने के लिए समय-समय पर कार्यशाला आयोजित की जाती है, जो किसान अपना रजिस्ट्रेशन करा लेते हैं, उन्हें इस प्रकार की खेती पर पचास प्रतिशत तक का अनुदान सरकार से प्राप्त है़कितने का आता है खर्च एक एकड़ खेती करने में पांच से सात हजार रुपये का खर्च आता है, जो खाद, बीज, पटवन आदि पर खर्च किया जाता है़ जबकि इसके व्यवसाय से बीस से 25 हजार रुपये आमदनी होती है, वहीं, लग्न के दिनों में यह आमदनी दोगुनी हो जाती है़इन फूलों की होती हैं खेती कलकतिया गेंदागुलहाजराचेरा चिन्नीचमेलीदेशी गुलाबगुलदाउदी

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