विदेशी पक्षियों से चहक रहा गोकुल जलाशय

Published at :13 Dec 2015 6:29 PM (IST)
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विदेशी पक्षियों से चहक रहा गोकुल जलाशय

विदेशी पक्षियों से चहक रहा गोकुल जलाशय फोटो संख्या-03 गोकुल जलाशयब्रह्मपुर. प्रखंड के प्रसिद्ध गोकुल जलाशय में प्रवासी पक्षियों का आना दिसंबर माह से आरंभ हो जाता है़ साइवेरिया, मलेशिया, जाकार्ता आदि से लाखों मील की उड़ान भर कर ये पक्षी हिंदुस्तान के जलाशयों में प्रवास करते हैं. उन्हीं में से एक जलाशय ब्रह्मपुर प्रखंड […]

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विदेशी पक्षियों से चहक रहा गोकुल जलाशय फोटो संख्या-03 गोकुल जलाशयब्रह्मपुर. प्रखंड के प्रसिद्ध गोकुल जलाशय में प्रवासी पक्षियों का आना दिसंबर माह से आरंभ हो जाता है़ साइवेरिया, मलेशिया, जाकार्ता आदि से लाखों मील की उड़ान भर कर ये पक्षी हिंदुस्तान के जलाशयों में प्रवास करते हैं. उन्हीं में से एक जलाशय ब्रह्मपुर प्रखंड का गोकुल जलाशय भी है, जहां ये पक्षी लगभग चार महीने का प्रवास करते हैं. इन दिनों इन पक्षियों से गोकुल जलाशय की छटा देखते ही बन रही है. झुंड के झुंड कलरव करते ये पक्षी बरबस ही मुसाफिरों को अपनी तरफ आकृष्ट कर रहे हैं. साथ ही इस जलाशय के नजदीक हिरण एवं बारहसिंहे के झुंड को भी देखते बन रहा है, जिसमें दुर्लभ कृष्ण मृग भी देखे जाते हैं. इस क्षेत्र के जानकार हरेंद्र तिवारी, जितेंद्र तिवारी आदि बताते हैं कि इन पक्षियों एवं हिरणों का शिकार यहां के नागरिक नहीं करते हैं एवं देखने भर में कोई इन पक्षियों का शिकार भी नहीं कर सकता है. लेकिन, कुछ मांस प्रेमी चोरी छिपे इनका शिकार कर लेते हैं. वन विभाग कर्मी देवकुमार मिश्रा, संजय कुमार ओझा ने बताया कि अवैद्य रूप से शिकार करनेवालों पर कड़ी नजर रखी जाती है़ अगर कोई इनका शिकार करता है और पकड़ा जाता है, तो उस पर कार्रवाई की जाती है. मलई बराज निर्माण से ही किसानों के चेहरे पर आयेगी मुस्कानडुमरांव़ जागो किसान के संयोजक सह जिला पार्षद अरविंद प्रताप उर्फ बंटी शाही ने एक बयान जारी करते हुए कहा कि हमारे बीच आज किसानों के लिए सबसे बड़ी समस्या कृषि को बचाने की है और इसको बचाने के लिए पानी की जरूरत और पानी मलई बराज के निर्माण से ही संभव है़ मलई बराज के निर्माण नहीं होने से किसानों के चेहरे पर मायूसी है़ किसानों के लिए समय से नहरों में पानी ना आना सबसे बड़ी समस्या है, जो काफी परेशानी का विषय है़ उन्होंने कहा कि अगर मलई बराज का निर्माण हो जाता है, तो यहां के किसानों की तंगहाली दूर हो जायेगी.वहीं, किसान अपने धान को बेचने के लिए टकटकी लगाये बैठे हैं. हाइस्कूलों में नहीं है प्रयोगशाला की व्यवस्थावैज्ञानिक अभिरुचि से अंजान हैं छात्रफरवरी व मार्च में परीक्षाओं का दौर शुरूनहीं मिली रासायनिक पदार्थों की जानकारीफोटो संख्या-04 महारानी उषारानी हाइस्कूल.डुमरांव़ बिहार विद्यालय परीक्षा समिति द्वारा इंटर व मैट्रिक की परीक्षा फरवरी व मार्च माह में घोषित की गयी है़ ऐसे में विज्ञान की पढ़ाई करनेवाले छात्र-छात्राओं को अब भी वैज्ञानिक अभिरुचि से अंजान रहना पड़ रहा है. हाइस्कूलों में प्रयोगशाला की व्यवस्था नहीं रहने से मैट्रिक के बाद साइंस की पढ़ाई करनेवाले छात्रों के समक्ष मुश्किलें खड़ी हो गयीं हैं. विभाग द्वारा मिलती है राशि हाइस्कूलों को विज्ञान से संबंधित उपकरणों व रासायनिक पदार्थों की खरीद के लिए राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के तहत 25 हजार की राशि हर वर्ष मुहैया करायी जाती है, लेकिन इस राशि का उपयोग केवल भाउचर बनने तक ही सीमित रहता है़ विद्यालय द्वारा इस राशि का दुरुपयोग कर छात्र-छात्राओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जाता है और गुणवत्ता शिक्षा के नाम पर धोखा दिया जाता है़पैसे पर दिये जाते हैं नंबरप्रैक्टिकल के नाम पर स्कूलों में छात्र-छात्राओं से पैसा लेकर नंबर देने की परिपाटी चलती है़ जबकि इसकी जानकारी शिक्षा विभाग को भी है़ इस कारनामे का बिहार विद्यालय परीक्षा समिति द्वारा समय पर मॉनिटरिंग भी नहीं की जाती है़ छात्र आसानी से पैसे देकर प्रैक्टिकल में नंबर पाते है़ं क्या कहते हैं छात्र-छात्राएंमैट्रिक की परीक्षा में शामिल होनेवाले महारानी उषा रानी हाइस्कूल की छात्रा शोभा व शुभम ने बताया कि स्कूल में प्रायोगिक कक्षा का कभी मुंह तक नहीं देखा. सीपीएसएस हाइस्कूल के छात्र मनोहर व विशाल कहते हैं कि विज्ञान की केवल किताबी ज्ञान तक ही सीमित है़ वहीं, राज हाइस्कूल के छात्र अभिषेक व कन्हैया की मानें, तो किसी उपकरण के ना जानकारी है और ना ही रंगों की केमिकल.क्या कहते हैं प्रधानाध्यापक हाइस्कूलों के प्रधानाध्यापकों की माने, तो स्कूलों में कमरों की कमी व उपकरणों के रख-रखाव के अभाव में प्रैक्टिकल की सुविधा नहीं दी जाती है़

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