मौसम की मार, मेंथा की खेती बरबाद

Published at :23 Apr 2015 12:27 AM (IST)
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मौसम की मार, मेंथा की खेती बरबाद

किसान मायूस : फसल के विकास के लिए 25 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान की होती है जरूरत बक्सर : सानों को आर्थिक विकास में आज मेंथा औषधि का उत्पादन महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है. इसकी खेती करनेवाले किसानों में आर्थिक समृद्धि आयी है. वहीं, इस साल प्रकृति ने अचानक करवट बदली है. इससे […]

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किसान मायूस : फसल के विकास के लिए 25 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान की होती है जरूरत

बक्सर : सानों को आर्थिक विकास में आज मेंथा औषधि का उत्पादन महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है. इसकी खेती करनेवाले किसानों में आर्थिक समृद्धि आयी है. वहीं, इस साल प्रकृति ने अचानक करवट बदली है. इससे मेंथा की खेती करनेवाले किसानों की कमर टूट गयी है.

प्रतिकूल मौसम की वजह से जिले के किसानों की एक बड़ी संख्या इस साल मेंथा कृषि से वंचित रह गयी है. मेंथा फसल की खेती किसान धान एवं गेहूं की फसल की कटाई के बाद करते हैं. इस वर्ष फसल को आवश्यक तापमान एवं धूप उपलब्ध नहीं होने से फसल का अपेक्षिक विकास नहीं हो पाया है. बीते साल जिले में अपेक्षित लक्ष्य से ज्यादा उत्पादन जिले में मेंथा की हुई थी.

कब होता है बिचड़े की तैयारी : कृषि वैज्ञानिक डॉ देव करण के अनुसार बिचड़ा खेतों में दिसंबर के अंतिम एवं जनवरी माह के शुरू में डाल दिया जाता है. यह बिचड़ा लगभग 60 दिनों में तैयार हो जाता है. 60 दिनों के बाद बिचड़े की रोपनी खेतों में की जाती है.

कब होती है रोपनी : मेंथा के 60 दिनों के बिचड़े को खेत तैयार कर रोपनी की जाती है. बिचड़े की रोपनी 31 मार्च तक कर दी जाती है.जिले में मेंथा की खेती करनेवाले किसानों की खेतों में फसल लगी है.

कब से शुरू होती है कटिंग : मई माह के प्रथम सप्ताह से मेंथा पौधे की कटिंग शुरू कर दी जाती है. पहली कटिंग के बाद दूसरी कटिंग अगले 15 दिनों में पुन: की जाती है. इस तरह 15 दिनों के अंतराल पर पुन: एक बार कटिंग की जाती है. इस तरह एक बार फसल लगाने के बाद किसान अपने फसल की तीन बार कटाई करते हैं.

कितना होता है उत्पादन : मेंथा का औसत उत्पादन 16 लीटर प्रति हेक्टेयर होता है. जब फसल अच्छी हो, तो यह औसत 19-20 लीटर प्रति हेक्टेयर हो जाती है. मॉनसून आने के समय जब आकाश बादलों से आच्छादित रहता है, उस समय मेंथा फसल से तेल का प्रतिशत बहुत अच्छा हो जाता है.

तापमान का कितना पड़ता है प्रभाव : कृषि वैज्ञानिक डॉ राम केवल ने बताया कि नर्सरी से रोपनी के समय तापमान 18 डिग्री से 25 डिग्री सेल्सियस के बीच आवश्यक है तथा इसके वानस्पतिक वृद्धि एवं विकास के लिए 25 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान आवश्यक होता है.

उद्यान विभाग का लक्ष्य है निर्धारित : जिला उद्यान पदाधिकारी सुरेंद्र प्रसाद ने बताया कि विगत साल 15 सौ हेक्टेयर भूमि में मेंथा फसल उगाने का लक्ष्य रखा गया था. इस साल एक हजार हेक्टेयर भूमि में उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित है. इस तरह दो वित्तीय वर्ष का लक्ष्य अब दो हजार पांच सौ हेक्टेयर भूमि का है. अभी विभाग में इसके सापेक्ष में 14 सौ से कुछ अधिक आवेदन प्राप्त हुए हैं. आवेदनों का सिलसिला समाप्त होने के बाद आवेदनों का सत्यापन किया जायेगा. उसके बाद किसानों को अनुदान दिया जायेगा.

कैसे मिलती है किसानों को कीमत

जिले में अब मेंथा ऑयल के कारोबारी फसल तैयार होने के साथ ही अपनी दुकानें खोल देते हैं. मेंथा की कीमत पिछले साल सात सौ से ऊपर ही प्रति लीटर प्राप्त हुई थी. तेल की कीमत प्रतिदिन शेयर के सूचकांक के साथ ही खुलता है. इस तरह किसानों को धान-चावल के साथ मेंथा ऑयल की ऊंची कीमत प्राप्त हो जाती है.

कहां होता है मेंथा ऑयल का उपयोग : मेंथा फसल से मेंथाल ऑयल निकलता है, जिसका उपयोग टूथ पेस्ट, साबुन, जॉनसन प्रोडक्ट बनाने में, शैंपू, फिनाइल, दर्द नाशक तेल वगैरह के कार्य में किया जाता है.

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