नालंदा यूनिवर्सिटी में सहकारिता पर विशेष व्याख्यान, समावेशी विकास और किसान सहकारी समितियों पर चर्चा
नालंदा विश्वविद्यालय में आयोजित व्याख्यान | Prabhat Khabar Network
नालंदा विश्वविद्यालय में सहकारिता के महत्व पर एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया, जिसमें सहकार भारती के संस्थापक सदस्य सतीश मराठे ने मुख्य वक्ता के तौर पर शिरकत की. उन्होंने समावेशी विकास के लिए सहकारिता की भूमिका और किसान सहकारी समितियों के माध्यम से कृषि मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने पर जोर दिया.
Nalanda University : नालंदा विश्वविद्यालय में शनिवार को ‘समावेशी विकास के लिए सहकारिता’ विषयक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया. व्याख्यान सहकार भारती के संस्थापक सदस्य, भारतीय रिजर्व बैंक के केंद्रीय निदेशक मंडल के सदस्य तथा राष्ट्रीय आवास बैंक के निदेशक सतीश मराठे ने दिया.
वे भारत सरकार द्वारा गठित तीन-स्तरीय अल्पकालिक सहकारी ऋण संरचना की प्रासंगिकता, उपयोगिता और निरंतरता के अध्ययन के लिए गठित विशेषज्ञ समिति के सदस्य भी हैं. इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी ने समावेशी विकास के लिए सहकारिता के महत्व को रेखांकित किया.
उन्होंने कहा कि आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों से निपटने में जनभागीदारी तथा सामूहिक प्रयासों को बढ़ावा देने के लिए सहकारी संस्थाएं प्रभावी माध्यम बन सकती है. सहकारिता की अवधारणा समाज के विभिन्न वर्गों को साझा आर्थिक हितों के लिए एक मंच उपलब्ध कराती है.
सतीश मराठे द्वारा सहकारिता आंदोलन और अर्थव्यवस्था पर प्रकाश
मुख्य वक्ता सतीश मराठे ने भारत में सहकारिता आंदोलन के विकास और अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में उसकी भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला. उन्होंने सहकारी संस्थाओं को जन-केंद्रित आर्थिक संस्थाओं के रूप में बताया, जो अपने सदस्यों के साथ-साथ स्थानीय समुदायों के सामाजिक और आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है.
उन्होंने सहकारिता आंदोलन को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख व्यक्तित्वों के योगदान का उल्लेख करते हुए इसके लोकतांत्रिक संचालन, नैतिक मूल्यों और सामूहिक हित पर आधारित दृष्टिकोण को रेखांकित किया. मराठे ने भारत सहित विभिन्न देशों के अनुभवों का उल्लेख करते हुए कृषि, बैंकिंग, डेयरी, स्वास्थ्य, आवास और मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों में सहकारिता की उपयोगिता बतायी. उन्होंने कहा कि सहकारी संस्थाएं तभी अधिक प्रभावी और टिकाऊ बन सकती हैं, जब उनके सदस्य संचालन और निर्णय प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लें.
इसके लिए अनुकूल कानूनी, वित्तीय और नीतिगत वातावरण भी जरूरी है, ताकि सहकारी संस्थाएं अपनी मूल भावना को कायम रखते हुए पेशेवर और आर्थिक रूप से सक्षम संस्थाओं के रूप में विकसित हो सकें.
कृषि और मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने पर जोर
उन्होंने विशेष रूप से किसान सहकारी समितियों के माध्यम से कृषि मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने की संभावनाओं पर चर्चा करते हुए कहा कि सहकारिता को केवल ऋण और कृषि इनपुट उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रखना चाहिए. इसे कृषि-प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, विपणन और बड़े बाजारों तक किसानों की पहुंच से जोड़ने की जरूरत है.
इससे किसानों को बेहतर बाजार, उचित मूल्य और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर मिल सकते हैं. मराठे ने कहा कि बैंकिंग, स्वास्थ्य, आवास, सार्वजनिक सेवाओं और कृषि विपणन में सहकारी संस्थाएं स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के साथ आर्थिक एवं सामाजिक संकट के समय समुदायों को सहारा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.
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समापन सत्र और शिक्षकों-विद्यार्थियों की उपस्थिति
व्याख्यान के समापन पर समावेशी विकास, खाद्य सुरक्षा, वित्तीय पहुंच और सतत विकास में सहकारिता की प्रासंगिकता पर चर्चा हुई. इसके बाद शिक्षकों और विद्यार्थियों के साथ संवादात्मक सत्र आयोजित किया गया, जिसमें भारत और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में सहकारिता आंदोलन के व्यावहारिक एवं विकासात्मक पहलुओं पर विचार-विमर्श किया गया.
व्याख्यान में नालंदा विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज, स्कूल ऑफ इंटरनेशनल रिलेशंस एंड पीस स्टडीज, स्कूल ऑफ इकोलॉजी एंड एनवायरनमेंट स्टडीज तथा अर्थशास्त्र विभाग के शिक्षक और विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे.
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