राज्यसभा चुनाव में गायब विधायक, कांग्रेस में गहराया संकट,2025 की कलह फिर उभरी
मल्लिकाअर्जुन खड़गे और राहुल गांधी
Bihar Politics
Bihar Politics: बिहार की सियासत में कांग्रेस इस वक्त अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है. हाल ही में संपन्न हुए राज्यसभा चुनाव ने पार्टी के भीतर मचे घमासान को सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया है. पार्टी के तीन विधायकों का वोटिंग से नदारद रहना प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम के नेतृत्व पर सीधे सवालिया निशान लगा रहा है.
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पार्टी के भीतर की यह दरार अब इतनी चौड़ी हो चुकी है कि इसे भरना केंद्रीय नेतृत्व के लिए भी बड़ी चुनौती बन गया है. मनिहारी और वाल्मीकि नगर जैसे क्षेत्रों के दिग्गज विधायकों ने खुलेआम सम्मान की कमी और उपेक्षा का आरोप मढ़ दिया है.
‘गायब’ विधायकों ने बढ़ाई नेतृत्व की मुश्किलें
राज्यसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के तीन विधायकों का वोटिंग से दूर रहना पार्टी के भीतर गहरे असंतोष की ओर इशारा करता है. मनिहारी विधायक मनोहर सिंह और वाल्मीकि नगर के सुरेंद्र प्रसाद ने प्रदेश अध्यक्ष पर सीधा निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि संगठन में उनकी अनदेखी की जा रही है. वहीं फारबिसगंज विधायक मनोज विश्वास का बयान इस संकट को और जटिल बनाता है, जहां वे निर्णय की जिम्मेदारी नेतृत्व पर ही डालते नजर आते हैं.
इस ताजा विवाद की जड़ें 2025 के विधानसभा चुनाव में हुए टिकट बंटवारे तक जाती हैं. उस समय कई पुराने और जमीनी नेताओं को दरकिनार कर नए चेहरों को टिकट देने के फैसले ने पार्टी के भीतर नाराजगी को जन्म दिया था. आरोप यह भी लगे कि टिकट वितरण में पारदर्शिता नहीं बरती गई, जिससे संगठन में भरोसे का संकट गहराता गया.
अनुशासनात्मक कार्रवाई से और बढ़ा असंतोष
जब संवाद के रास्ते बंद हो जाते हैं, तो बगावत का रास्ता खुलता है. बिहार कांग्रेस में भी यही हो रहा है. असंतुष्ट गुट ने पटना में ‘कांग्रेस बचाओ महासम्मेलन’ के जरिए न केवल शक्ति प्रदर्शन किया, बल्कि आलाकमान को यह संदेश भी दे दिया कि प्रदेश नेतृत्व को बदले बिना पार्टी का अस्तित्व बचाना मुश्किल है.
दूसरी तरफ, पार्टी नेतृत्व ने समाधान निकालने के बजाय सात नेताओं के निष्कासन और कारण बताओ नोटिस का सहारा लिया, जिसने आग में घी डालने का काम किया है.
आगे की राह मुश्किल, केंद्रीय नेतृत्व पर नजर
कांग्रेस की इस अंदरूनी कलह का असर सिर्फ पार्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि विपक्षी गठबंधन (INDIA) में भी उसकी साख गिर रही है. सहयोगी दल अब कांग्रेस की एकजुटता और वोट ट्रांसफर करने की क्षमता पर संदेह करने लगे हैं.
यदि केंद्रीय नेतृत्व ने तुरंत हस्तक्षेप कर डैमेज कंट्रोल नहीं किया, तो आगामी चुनावों में कांग्रेस के लिए अपनी पुरानी प्रतिष्ठा और सीटों की संख्या बचाना नामुमकिन हो जाएगा.
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