बिहार गौरव गान की लेखिका पद्मश्री डॉ शांति जैन का निधन, खांसी-बुखार से पीड़ित थीं, लिए थे कोरोना के दोनों ही टीके

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Bihar News: पद्मश्री से विभूषित साहित्यकार डॉ शांति जैन का शनिवार की देर रात पटना के लोहानीपुर स्थित गिरि अपार्टमेंट के अपने फ्लैट में निधन हो गया. 75 वर्षीया डॉ जैन अविवाहिता थीं और अकेले ही रहती थीं. वे विगत कुछ दिनों से खांसी-बुखार से पीड़ित थीं. उन्होंने कोरोना के दोनों ही टीके लगवा लिये थे.

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Posteपद्मश्री से विभूषित साहित्यकार डॉ शांति जैन का शनिवार की देर रात पटना के लोहानीपुर स्थित गिरि अपार्टमेंट के अपने फ्लैट में निधन हो गया. 75 वर्षीया डॉ जैन अविवाहिता थीं और अकेले ही रहती थीं. वे विगत कुछ दिनों से खांसी-बुखार से पीड़ित थीं. उन्होंने कोरोना के दोनों ही टीके लगवा लिये थे. बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष अनिल सुलभ के मुताबिक भोजन पकाने वाली सेविका ने उनको रात नौ बजे विदा कर अगली सुबह आने को कहा था.

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मगर सुबह जब फल देने वाला लड़का पहुंचा तो कई बार फोन लगाया, दरवाजे पर थपकियां भी लगायी. पर कोई उत्तर नहीं मिला. अनहोनी की आशंका पर दरवाजा तोड़ा गया तो वह अपनी शैय्या पर निःशब्द-निःश्वास लेटी मिलीं. सूचना मिलने पर स्व शांति जैन की भतीजी कल्पना और उसके पति मनोज जैन और जयंत वहां पहुंचे.

दोपहर में आरा से उनके भतीजे व अन्य परिजनों के पहुंचने के बाद पटना के गुलबी घाट पर उनका अग्नि-संस्कार हुआ. उनके भतीजे सुनील जैन ने मुखाग्नि दी. डिप्टी सीएम तारकिशोर प्रसाद ने बिहार गौरव गान की लेखिका पद्मश्री डॉ शांति जैन के निधन पर गहरी शोक संवेदना व्यक्त की है.

डॉ जैन चर्चित गायिका और जानी-मानी साहित्यकार भी थी. डिप्टी सीएम ने कहा कि उनके देहावसान की खबर सुनकर काफी दुख हुआ है. उनके जाने से बिहार ने एक अनमोल रत्न खो दिया है. उन्होंने कहा कि ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें और उनके शोकाकुल परिजनों को इस अपार दुख को सहन करने की शक्ति दें.

हिंदी की विशिष्ट कवियत्री थीं शांति

शांति जैन संस्कृत की विदुषी प्राध्यापिका तथा हिन्दी की विशिष्ट कवयित्री थीं. हिन्दी काव्य की गीति-धारा को उनसे स्तुत्य ऊर्जा मिली है. वो एक सफल मंच संचालिका, गायिका, उद्घोषिका, रेडियो वार्ताकार, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन की कार्यसमिति की सदस्य, बिहार की हिन्दी प्रगति समिति की उपाध्यक्ष और सुरांगन की अध्यक्ष भी थीं. उनके निधन से साहित्य जगत मर्माहत है और शोक में डूबा हुआ है.

डाॅ सुलभ ने बताया कि शांति जी ने अविवाहित रह कर साहित्य की एकनिष्ठ साधना की तथा ‘पिया की हवेली, छलकती आंखें समय के स्वर, चंदनबाला, चैती, कजरी, ऋतुगीत लोकगीतों के संदर्भ और आयाम जैसी दर्जनों पुस्तकों का सृजन कर हिन्दी-साहित्य को धनाढ्य किया. वे तत्कालीन भारत की राष्ट्रपति प्रतिभा देवी पाटिल द्वारा ‘राष्ट्रीय देवी अहिलया सम्मान’ से भी विभूषित हुईं.

Posted By; Utpal Kant

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