बिहार चुनाव 2020: महागठबंधन में सीट बंटवारा तय, लालू के लाल के साथ कितनी असरदार होगी कांग्रेस?

सीट बंटवारे की सुगबुगाहट के बीच जिसका इंतजार था वो फैसला आ गया है. शनिवार को महागठबंधन के सीट शेयरिंग फॉर्मूले पर मुहर लग गई. संयुक्त प्रेस वार्ता में सीट बंटवारे का ऐलान किया गया. ऐलान के समय तेजस्वी यादव, तेजप्रताप यादव समेत कांग्रेसी नेता मौजूद रहे. सीट शेयरिंग फॉर्मूले के तहत आरजेडी 144 सीटों और कांग्रेस में 70 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. दूसरी तरफ लेफ्ट पार्टियों के हिस्से में 29 सीटें गई हैं. बड़ा सवाल यह है कि लालू के लाल के साथ कांग्रेस पार्टी कितनी बड़ी सफलता हासिल करेगी?
पटना: सीट बंटवारे की सुगबुगाहट के बीच जिसका इंतजार था वो फैसला आ गया है. शनिवार को महागठबंधन के सीट शेयरिंग फॉर्मूले पर मुहर लग गई. संयुक्त प्रेस वार्ता में सीट बंटवारे का ऐलान किया गया. ऐलान के समय तेजस्वी यादव, तेजप्रताप यादव समेत कांग्रेसी नेता मौजूद रहे. सीट शेयरिंग फॉर्मूले के तहत राजद 144 और कांग्रेस 70 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. दूसरी तरफ लेफ्ट पार्टियों के हिस्से में 29 सीटें गई हैं. बड़ा सवाल यह है लालू के लाल के साथ कांग्रेस पार्टी कितनी बड़ी सफलता हासिल करेगी?
बिहार की राजनीति में कांग्रेस ने अपना उत्थान भी देखा और पतन भी. राम मंदिर आंदोलन और मंडल कमीशन की रिपोर्ट के बाद बिहार में ऐसे हालात बदले कि कभी सत्ता की रिमोट कंट्रोल को हाथों में रखने का दावा करने वाली कांग्रेस हाशिए पर चली गई. गठबंधन के आसरे खुद को सत्ता में लाती रही. इस बार के चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने खुद के वजूद तलाशने में कमोबेश सफलता पाई है. 2015 में 41 सीटों पर लड़कर 27 सीटें जीतने के बाद उसके हौसले बुलंद रहे. अब, 2020 के चुनाव में पार्टी 70 सीटों पर लड़ रही है.
दरअसल, आजादी के पांच दशकों तक कांग्रेस ने बिहार की सत्ता पर शासन किया. 1952 से लेकर 2015 तक बिहार के मुख्यमंत्रियों में अधिकांश कांग्रेस के रहे. यह किसी पार्टी के राजनीतिक साम्राज्य का सबसे बड़ा प्रमाण है. लेकिन, 90 के दशक के बाद बिहार में कांग्रेस की साख घटती गई. बिहार में लालू प्रसाद यादव का उदय हुआ. बिहार में कांग्रेस सिमटती जा रही थी और लालू यादव केंद्र में यूपीए सरकार के संकटमोचक बनते जा रहे थे. यही कारण था कि कांग्रेस आलाकमान लालू यादव को नजरंदाज नहीं करता था. वक्त गुजरा और कभी राजद की राजनीति की आलोचक रही कांग्रेस उसके साथ गठबंधन में आ गई.
खास बात यह है कि 2020 के विधानसभा चुनाव में लालू यादव खुद मौजूद नहीं हैं. उनकी जगह तेजस्वी यादव पार्टी को लीड कर रहे हैं. 2015 के चुनाव परिणामों से कांग्रेस का हौसला बढ़ा है. उम्मीद है कि राजद के साथ उनका गठबंधन जरूर रंग लाएगा. कांग्रेस को भरोसा है कि वो अपना खोया वजूद वापस पा सकेगी. बड़ी बात यह है कि कांग्रेस के पास बिहार में कोई बड़ा चेहरा नहीं है. गिन-चुनकर राहुल गांधी, सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के आसरे कांग्रेस बिहार में बड़ी वापसी का करिश्मा करने के सपने को देख रही है. ध्यान देने वाली बात यह है कि राजनीति में असली करिश्मा जनता करती है नेता नहीं.
Posted : Abhishek.
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