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Bihar Diwas 2025: बिहार जहां इतिहास ने सभ्यता को आकार दिया, ज्ञान ने दुनिया को रोशन किया

Updated at : 20 Mar 2025 11:28 AM (IST)
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Bihar diwas 2025| Bihar is not only the centre of past but also the future, the youth shine from UPSC to ISRO

सांकेतिक तस्वीर

Bihar Diwas 2025: बिहार सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि एक सभ्यता, संस्कृति और क्रांति की भूमि है. यह वह धरती है जहां दुनिया का पहला गणराज्य अस्तित्व में आया, जहां बुद्ध को ज्ञान मिला और जहां गांधी के सत्याग्रह ने आकार लिया. नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों से लेकर चंपारण सत्याग्रह तक, बिहार ने हमेशा भारत के इतिहास को दिशा दी है. आज भी यह राज्य अपनी विरासत, संघर्ष और नवाचार की कहानी कहता है, जो न सिर्फ अतीत से जुड़ी है, बल्कि भविष्य को भी रोशन कर रही है.

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Bihar Diwas 2025: यह भूमि केवल एक भौगोलिक प्रदेश नहीं, बल्कि एक जीवंत गाथा है. एक ऐसी कथा, जिसने भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के इतिहास को आकार दिया. यहां गंगा की कलकल धारा ने सभ्यता को सिंचित किया, यहां बुद्ध को ज्ञान मिला, महावीर को मोक्ष का मार्ग मिला और महात्मा गांधी को अपने सत्याग्रह की शक्ति. यह वही बिहार है, जहां दुनिया का पहला गणराज्य वैशाली में फला-फूला, जहां नालंदा और विक्रमशिला ने पूरे विश्व को शिक्षा का प्रकाश दिया, और जहां विदेशी यात्री मेगस्थनीज, फ़ा-हिएन और ह्वेनसांग ने आकर इसकी समृद्धि का बखान किया.

बिहार केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि वर्तमान की प्रेरणा और भविष्य की संभावना भी है. यह राज्य संघर्षों से सीखने, टूटकर भी जुड़ने और अपनी अस्मिता को पुनर्परिभाषित करने का प्रतीक है. आइए, इस गौरवशाली इतिहास की यात्रा करें और जानें कि कैसे बिहार ने भारत ही नहीं, पूरे विश्व को रोशन किया.

सभ्यता की नींव: चिरांद से मगध तक

इतिहासकारों के अनुसार, बिहार में मानव जीवन के प्रमाण नवपाषाण युग (Neolithic Age) से मिलते हैं. सारण जिले में स्थित चिरांद भारत की सबसे प्राचीन बस्तियों में से एक है. जहां 2500 ईसा पूर्व से मानव सभ्यता फल-फूल रही थी. यहां के पुरातात्विक अवशेष बताते हैं कि यह क्षेत्र कृषि, पशुपालन और बर्तन निर्माण में भी विकसित था.

इसके बाद बिहार ने महाजनपद काल (600 ईसा पूर्व) में मगध साम्राज्य के रूप में भारतीय उपमहाद्वीप को एक नई दिशा दी. राजगृह (वर्तमान राजगीर) उस समय का प्रमुख नगर था. जहां से मगध की शक्ति धीरे-धीरे पूरे भारत पर अपना प्रभाव छोड़ने लगी.

विदेशी यात्रियों की नजर में बिहार

बिहार की भव्यता और वैभव का प्रमाण न केवल भारतीय ग्रंथों में मिलता है, बल्कि इसे विदेशी यात्रियों ने भी अपनी आंखों से देखा और सराहा है. ग्रीक इतिहासकार मेगस्थनीज, जो चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में राजदूत बनकर आया था, उसने अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में मगध की संपन्नता और प्रशासनिक दक्षता का विस्तार से वर्णन किया है.

चीन के प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु फ़ा-हिएन और ह्वेनसांग ने भी बिहार की यात्रा की थी. फ़ा-हिएन ने अपनी यात्रा के दौरान नालंदा विश्वविद्यालय और गया के बौद्ध स्थलों की महिमा का बखान किया, जबकि ह्वेनसांग ने नालंदा को विश्व का सबसे बड़ा शिक्षा केंद्र बताया.

ज्ञान और आध्यात्मिकता का केंद्र

बिहार केवल सत्ता का केंद्र नहीं था, बल्कि आध्यात्मिकता की पवित्र भूमि भी रहा है. बुद्ध और महावीर जैसे महान संतों ने इसी भूमि पर जन्म लिया और अहिंसा, शांति और ज्ञान के संदेश को पूरी दुनिया में फैलाया. बोधगया, जहां गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ, आज भी बौद्ध धर्म का सबसे बड़ा तीर्थ स्थल माना जाता है. वहीं, वैशाली में भगवान महावीर का जन्म हुआ था, जिसने जैन धर्म की आधारशिला रखी.

नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों ने बिहार को ज्ञान की राजधानी बना दिया. नालंदा, जिसे गुप्त साम्राज्य के दौरान स्थापित किया गया था, पूरी दुनिया से छात्रों को आकर्षित करता था.

बिहार ने बनाया गांधी को ‘महात्मा’

महात्मा गांधी के जीवन में बिहार की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. 1917 में जब गांधीजी पहली बार बिहार आए, तो उन्होंने चंपारण सत्याग्रह का नेतृत्व किया. यहां के किसानों पर हो रहे अन्याय के खिलाफ उन्होंने अहिंसक आंदोलन चलाया, जो उनके जीवन का पहला बड़ा आंदोलन था. यहीं से उनके सत्याग्रह की शक्ति का वास्तविक परीक्षण हुआ और यह आंदोलन पूरे देश में आजादी की लड़ाई का आधार बना. यही कारण है कि कहा जाता है- “गांधी को महात्मा बिहार ने बनाया.”

इसी भूमि से उठा था जय प्रकाश नारायण का संपूर्ण क्रांति आंदोलन

वैशाली को विश्व का सबसे प्राचीन गणराज्य माना जाता है. जब दुनिया के अन्य हिस्से अभी भी राजतंत्र के अधीन थे, तब वैशाली में लोकतांत्रिक व्यवस्था चल रही थी. भारत की आजादी की लड़ाई में भी बिहार अग्रणी रहा है. 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में बाबू कुंवर सिंह ने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा दिए. वहीं, 20वीं सदी में महात्मा गांधी ने चंपारण सत्याग्रह की शुरुआत यहीं से की, जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी. जय प्रकाश नारायण का संपूर्ण क्रांति आंदोलन भी इसी भूमि से उठा था, जिसने भारत की राजनीति को हिला कर रख दिया.

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विरासत को सहेजने की जरूरत

इतिहास हमें केवल गर्व महसूस कराने के लिए नहीं, बल्कि सीखने के लिए होता है. बिहार की यह ऐतिहासिक विरासत हमें प्रेरणा देती है कि हम अपनी संस्कृति, धरोहर और ज्ञान को संजोकर आगे बढ़ें. बिहार में कई पुरातात्विक स्थलों की दुर्दशा चिंता का विषय बनी हुई है. आवश्यकता है कि हम अपनी जड़ों को सहेजें और इस ऐतिहासिक धरोहर को दुनिया के सामने गर्व से प्रस्तुत करें. बिहार केवल एक भूगोल नहीं, बल्कि एक विचारधारा है. यह वह भूमि है जहां सभ्यता पली-बढ़ी, जहां से ज्ञान की ज्योति पूरे विश्व में फैली, और जहां स्वतंत्रता की पहली चिंगारी जली. यह धरोहर हमारी पहचान है, और इसे संजोना हमारा कर्तव्य.

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Abhinandan Pandey

लेखक के बारे में

By Abhinandan Pandey

भोपाल से शुरू हुई पत्रकारिता की यात्रा ने बंसल न्यूज (MP/CG) और दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अनुभव लेते हुए अब प्रभात खबर डिजिटल तक का मुकाम तय किया है. वर्तमान में पटना में कार्यरत हूं और बिहार की सामाजिक-राजनीतिक नब्ज को करीब से समझने का प्रयास कर रहा हूं. गौतम बुद्ध, चाणक्य और आर्यभट की धरती से होने का गर्व है. देश-विदेश की घटनाओं, बिहार की राजनीति, और किस्से-कहानियों में विशेष रुचि रखता हूं. डिजिटल मीडिया के नए ट्रेंड्स, टूल्स और नैरेटिव स्टाइल्स के साथ प्रयोग करना पसंद है.

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