सुहागिनों ने पति की दीर्घायु के लिए की करवा चौथ
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :09 Oct 2017 9:21 AM (IST)
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निर्जल और निराहार रहकर रात्रि में चंद्रोदय के समय अर्घ देकर व्रत किया समाप्त आरा : करवा चौथ व्रत रविवार को मनाया गया. सूर्योदय 6 बजकर 11 मिनट और तृतीया तिथि शाम सात बजकर 25 मिनट के बाद चतुर्थी तिथि लग गयी. रात्रि में चंद्रोदय के समय अर्घ देकर व्रत को समाप्त किया गया. व्रत […]
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निर्जल और निराहार रहकर रात्रि में चंद्रोदय के समय अर्घ देकर व्रत किया समाप्त
आरा : करवा चौथ व्रत रविवार को मनाया गया. सूर्योदय 6 बजकर 11 मिनट और तृतीया तिथि शाम सात बजकर 25 मिनट के बाद चतुर्थी तिथि लग गयी. रात्रि में चंद्रोदय के समय अर्घ देकर व्रत को समाप्त किया गया. व्रत को लेकर बाजारों में रौनक छायी रही. सौंदर्य प्रसाधन की दुकानों पर बड़ी संख्या में महिलाएं पहुंचीं और सुहाग सामग्री की खरीदारी की.
करवा, मेहंदी, टैटू की दुकानों पर भी महिलाओं की भीड़ देखी गयी. मेहंदी लगानेवालों दुकानों पर महिलाओं की भीड़ लगी रही. मेंहदी लगाने के अलग-अलग रेट दुकानदार ले रहे थे. अरेविक 100, बाम्बे स्टाइल 200, राजस्थानी 300, मारवाड़ी 600 और ब्लैक ब्राउन डिजाइन का शुल्क 800 रुपये दुकानदारों द्वारा लिये जा रहे हैं. सड़कों पर भी बड़ी संख्या में अस्थायी दुकानों पर भीड़ लगी रही. इसके अलावा कपड़ों व आभूषणों की दुकानों पर भी महिलाएं खरीदारी करती रहीं. सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र और समृद्धि के लिए निर्जला करवाचौथ का व्रत करती हैं.
ऐसे हुई व्रत व पूजा : एक पीढ़ा पर जल से भरा एक पात्र रखा गया. उस जल में चंदन और पुष्प छोड़ा गया और मिट्टी का एक करुआ लेकर उसमें गेहूं और उसके ढकनी में चीनी भरकर रखा लिया गया. करुये पर स्वास्तिक बनाकर 13 बिंदी और हाथ में गेहूं के 13 दाने लेकर कथा सुनी गयी. इसके बाद करुये पर हाथ रखकर उसे किसी वृद्ध महिला का चरण स्पर्श कर अर्पित किया गया. चंद्रोदय के समय रखे जल से अर्घ देकर अपना व्रत महिलाओं ने तोड़ा.
कब से मनाया जा रहा करवाचौथ
पुराणों के अनुसार जब पांडवों पर घोर विपत्ति का समय आया तब द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण का आह्वान किया. कृष्ण ने कहा कि यदि तुम भगवान शिव के बताये हुए व्रत करवाचौथ को आस्था व विश्वास के साथ संपन्न करो, तो समस्त कष्टों से मुक्त हो जाओगी और समृद्धि स्वत: ही प्राप्त हो जायेगी, लेकिन ध्यान रखना कि व्रत के दौरान भोजन-पानी वर्जित है. द्रौपदी ने व्रत रखा और पांडवों का कष्ट दूर हुआ तथा उन्हें पुन: राज्य की प्राप्ति हुई.
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