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Bihar: भागलपुर के अधिकतर किसान इस बार नहीं ले सकेंगे डीजल अनुदान का लाभ, आसमान निहारने को विवश अन्नदाता

Updated at : 22 Jul 2022 3:49 PM (IST)
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Bihar: भागलपुर के अधिकतर किसान इस बार नहीं ले सकेंगे डीजल अनुदान का लाभ, आसमान निहारने को विवश अन्नदाता

भागलपुर के अधिकतर किसानों को इस बार डीजल अनुदान का लाभ नहीं मिल पाएगा. 80 फीसदी खेती बारिश पर निर्भर है और जब आहर-नहर-तालाब व नदियां सूखी है तो किसानों को पानी की दिक्कत हो रही है.

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दीपक राव,भागलपुर: खरीफ मौसम में बारिश नहीं होने से प्रदेश सरकार ने सिंचाई के लिए किसानों को डीजल अनुदान देने की घोषणा की है. जिले में अधिकतर खेती बारिश की सिंचाई पर निर्भर है. खरीफ मौसम में धान की खेती के लिए सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है. बरसाती नदी, तालाब, आहर व नहर सूख गये हैं. जलस्तर भी बेहतर नहीं है कि अधिक से अधिक पानी निकाला जा सके और रोपनी किया जा सके.

आसमान निहार रहे किसान, रोपा को लेकर परेशान

बारिश की चाह में किसान हमेशा आसमान निहारने को विवश हैं. अब तक 60 से 70 फीसदी रोपनी हो जानी थी, लेकिन सात फीसदी ही हो सकी है. समय से पहले अधिक बारिश होने से बिचड़ा बोने में देरी हुई. अब खेतों में दरार पड़ने लगी है.

धान की रोपनी घटी

जिला कृषि पदाधिकारी अनिल यादव ने बताया कि अब तक पूरे जिले में 52 हजार हेक्टेयर भूमि में केवल सात प्रतिशत तक ही धान की रोपनी हो सकी है. जुलाई में 15.26 एमएम बारिश हुई है, जबकि कम से कम 182 एमएम बारिश की जरूरत है.

कृषि विशेषज्ञों की राय

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार मानसून समय पर पहुंच गया. प्री-मानसून व मानसून की शुरुआत में ही सामान्य से अधिक बारिश हो गयी, इससे बिचड़ा में भी देरी हो गयी. जिले के जिन इलाके में किसान समृद्ध हैं वह पंपिंग सेट व नदी-नाले से पानी जुगाड़ करके खेत तक ले जा रहे हैं. रोपा के समय पर्याप्त बारिश होती, तो जिले के किसान 60-70 प्रतिशत रोपा कर लेते.

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30 फीसदी बढ़ जायेगी बॉग व जीरो टिलेज विधि से खेती

सुखाड़ की स्थिति में किसानों को पारंपरिक खेती अर्थात रोपनी करना मुश्किल हो रहा है. अब उनके पास धान की खेती में देरी होने से बॉग व जीरो टिलेज विधि से खेती करने का विकल्प है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार जिले में 30 फीसदी बॉग विधि से खेती बढ़ जायेगी.

30 से 40 फीसदी कम पानी की जरूरत

डीएओ ने बताया कि बॉग व जीरो टिलेज विधि से किसानों को कई प्रकार के लाभ हैं. सिंचाई के लिए 30 से 40 फीसदी कम पानी की जरूरत पड़ती है. रोपा की अपेक्षा मजदूर खर्च, जुताई खर्च आदि 50 प्रतिशत कम पड़ता है. खर पतवार नियंत्रित करने में दिक्कत नहीं होती है.

डीएओ ने बताया

डीएओ ने बताया कि जिले में 80 फीसदी से अधिक भूमि की खेती बारिश पर ही निर्भर है. पूरे साल जितनी बारिश होती है, उसमें औसतन 70 फीसदी पानी केवल मानसून में बरसता है. ऐसे में यदि किसान जीरो टिलेज व बॉग विधि से खेती का विकल्प नहीं चुनेंगे, तो धान का उत्पादन घट जायेगा.

इन क्षेत्रों में सिंचाई की वैकल्पिक व्यवस्था नहीं

बिचड़ा बुआई नहीं करने का मूल कारण जिले के अधिकतर धान उत्पादक क्षेत्रों में सिंचाई का साधन नहीं होना है. जिले के नौ प्रखंडों कहलगांव, सन्हौला, गोराडीह, सुलतानगंज, शाहकुंड, नाथनगर, सबौर, जगदीशपुर व पीरपैंती में धान उत्पादन अधिक होता है. इन क्षेत्रों में सिंचाई की वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है.

जिला कृषि पदाधिकारी बोले

किसानों को सरकार से डीजल अनुदान का लाभ दिया जायेगा. जीरो टिलेज विधि में कम पानी की आवश्यकता है. किसान सरकार की योजना का लाभ लें और अपने खेतों में धान व अन्य खरीफ फसल लगायें.

अनिल यादव, जिला कृषि पदाधिकारी.

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