नाथनगर : स्वतंत्रता सेनानी आभा का निधन, शरीर व अंग कर दिया है दान मिलेगा जीवन जरूरतमंदों को
Updated at : 11 Feb 2019 7:49 AM (IST)
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नमन चौधरी, नाथनगर : तन समर्पित, मन समर्पित और यह जीवन समर्पित, चाहता हूं देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं. इस कविता को असली चरितार्थ कर दिखाया नाथनगर की बेटी आभा चौधरी ने. गत शनिवार 9 फरवरी को उनकी आत्मा ने शरीर तो छोड़ दिया पर देशवासियों के लिए मरने के बाद अपना […]
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नमन चौधरी, नाथनगर : तन समर्पित, मन समर्पित और यह जीवन समर्पित, चाहता हूं देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं. इस कविता को असली चरितार्थ कर दिखाया नाथनगर की बेटी आभा चौधरी ने. गत शनिवार 9 फरवरी को उनकी आत्मा ने शरीर तो छोड़ दिया पर देशवासियों के लिए मरने के बाद अपना शरीर और उसका हिस्सा पीड़ितों, असहायों, गरीबों के ही नाम कर दिया.
मृत्योपरांत आभा चौधरी की आंखें दृष्टिहीनों को रोशनी देगी, चमड़ी तेजाब से जले लोगों का चेहरा निखारेगी और शरीर मेडिकल काॅलेज के छात्रों को शोध करने के काम आयेगी. प्रसिद्ध साहित्यकार व स्वतंत्रता सेनानी आभा चौधरी का मूल मायका नाथनगर के पुरानीसराय है. यहां उनके भाई व अन्य परिवार के लोग रहते हैं.
पिता राजेंद्र प्रसाद तो मां और आभा गांधी जी के थे बेहद करीबी : आभा चौधरी के भाई इंद्र कुमार सिन्हा ने बताया कि आभा चौधरी के पिता राजेश्वर नारायण सिन्हा भारत के प्रथम राष्ट्रपति डाॅ राजेंद्र प्रसाद से प्रभावित होकर 24 वर्ष की आयु में ही नाथनगर छोड़ कर उनके साथ चले गये थे.
तब भारत अंग्रेजों का गुलाम था. राजेश्वर नारायण जयपुर में रहने लगे और राजेंद्र बाबू के साथ आंदोलन में शामिल हो गये. आभा चौधरी की मां प्रकाशवती सिन्हा गांधी की के साथ जुड़ गयी और वर्धा स्थित आश्रम में रहने लगी.
गांधी जी ने ही बेटी का नाम आभा चौधरी रखा था. होश संभालने के बाद आभा चौधरी भी गांधी जी के साथ आंदोलन में कूद गयी और जेल भरो आंदोलन, असहयोग आंदोलन जैसे कई आंदोलनों में भाग ली. उन्हें स्वतंत्रता सेनानी से नवाजा गया और ताम्र पत्र भी दिया गया था. इनके माता-पिता को महान स्वतंत्रता सेनानी थे.
आभा चौधरी की शादी 1964 में जयपुर राजघराने के हमीर चंद्र चौधरी से हुई थी. उन्हें एक पुत्र अमित चौधरी हैं. पति का स्वर्गवास पहले ही हो चुका है. आभा चौधरी महान साहित्यकार थी. उन्होंने लगभग 30 किताबें लिखी है. आभा चौधरी के भाई ने बताया कि जिंदगीभर आभा गरीबों, पीड़ितों, असहायों के लिए ही जीती रही. रतलाम मेडिकल कॉलेज को उन्होंने अपनी जमीन दान में दी थी.
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