गढ़पुरा के ‘कैप्टन साहब’ ने अंग्रेजी हुकूमत को दी थी चुनौती, 21 अप्रैल 1930 को बना था नमक
पदयात्रा का फाइल फोटो
Begusarai News : बिहार के गढ़पुरा में 1930 के नमक सत्याग्रह और बाबू बिंदेश्वरी प्रसाद सिंह के साहसिक योगदान की ऐतिहासिक कहानी, जो आज भी उपेक्षा का दंश झेल रही है.
Begusarai News : आजादी की लड़ाई का इतिहास केवल बड़े शहरों और चर्चित आंदोलनों तक सीमित नहीं है. बिहार के गांव-कस्बों की मिट्टी में भी स्वतंत्रता संघर्ष की ऐसी गाथाएं दफन हैं, जिन्हें इतिहास के पन्नों पर वह स्थान नहीं मिल सका, जिसकी वे हकदार थीं. गढ़पुरा की धरती भी ऐसी ही एक ऐतिहासिक गाथा की साक्षी है. यहां 21 अप्रैल 1930 को हुआ नमक सत्याग्रह अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ स्थानीय जनशक्ति और साहस का एक बड़ा उदाहरण बना. इस आंदोलन की अगुवाई करने वालों में गढ़पुरा के बाबू बिंदेश्वरी प्रसाद सिंह का नाम प्रमुखता से लिया जाता है.
पुलिस और मुखबिरों से बचने के लिए ‘कैप्टन साहब’ नाम से थी पहचान
स्थानीय इतिहासकारों और उपलब्ध स्मृतियों के अनुसार, आंदोलन के दौरान अंग्रेजी पुलिस और उसके मुखबिरों से अपनी पहचान छिपाने के लिए बिंदेश्वरी प्रसाद सिंह को ‘कैप्टन साहब’ के नाम से पुकारा जाता था. उनका उद्देश्य अंग्रेजी हुकूमत की नजरों से बचते हुए आंदोलन को मजबूत करना और अधिक से अधिक लोगों को स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ना था. उनका साहस और नेतृत्व गढ़पुरा के नमक सत्याग्रह की एक महत्वपूर्ण पहचान बना.
मुंगेर की सभा में उठी गढ़पुरा में नमक सत्याग्रह की आवाज
गढ़पुरा में नमक सत्याग्रह की नींव पड़ने की कहानी भी काफी महत्वपूर्ण है. उस समय बिहार में स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व कर रहे डॉ. श्रीकृष्ण सिंह ने अखंड मुंगेर जिले के कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं की एक बैठक बुलायी थी. इस बैठक में गढ़पुरा से बाबू बिंदेश्वरी प्रसाद सिंह, बाबू दामोदर प्रसाद सिंह, दुनही के मथुरा प्रसाद सिंह, कनौसी के कारी सिंह और सुजानपुर के नूनू चौधरी समेत कई कार्यकर्ता शामिल हुए थे. बताया जाता है कि बैठक में जब नमक सत्याग्रह के लिए कार्यकर्ताओं को आगे आने का आह्वान किया गया, तब अखंड मुंगेर जिले से कोई भी कार्यकर्ता गढ़पुरा में आंदोलन करने के लिए तैयार नहीं हुआ. ऐसे समय में बाबू बिंदेश्वरी प्रसाद सिंह ने भरी सभा में खड़े होकर गढ़पुरा में नमक सत्याग्रह करने का प्रस्ताव रखा और डॉ. श्रीकृष्ण सिंह से इसका नेतृत्व करने का आग्रह किया. उनका यह साहसिक निर्णय आगे चलकर गढ़पुरा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय बन गया.
कष्टहरणी घाट से गढ़पुरा के लिए निकला था आजादी का जत्था
इसके बाद 17 अप्रैल 1930 को डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में मुंगेर के कष्टहरणी घाट से गढ़पुरा के लिए आंदोलनकारियों का जत्था रवाना हुआ. गंगा को नाव से पार करने के बाद स्वतंत्रता सेनानियों ने पैदल यात्रा शुरू की. लंबी यात्रा करते हुए यह जत्था 20 अप्रैल की संध्या गढ़पुरा पहुंचा. आंदोलनकारियों के ठहरने की व्यवस्था राम-जानकी ठाकुरबाड़ी में की गयी. जत्थे में गोगरी-जमालपुर के सुरेश मिश्र और मुरलीधर मिश्र, सिकरहुला के ब्रह्मदेव शर्मा और कमलेश्वरी सिंह, मंझौल के रामकिशोर सिंह तथा गढ़पुरा के बिंदेश्वरी प्रसाद सिंह, बनारसी प्रसाद सिंह, महावीर प्रसाद सिंह और दामोदर प्रसाद सिंह सहित दुनही, कनौसी और सुजानपुर के कई स्वतंत्रता सेनानी शामिल थे. इनके साथ बड़ी संख्या में स्थानीय लोग भी आंदोलन का हिस्सा बने.
अंग्रेजी हुकूमत ने गढ़पुरा को पुलिस छावनी में बदल दिया था
गढ़पुरा में नमक सत्याग्रह की भनक लगते ही अंग्रेजी हुकूमत ने आंदोलन को कुचलने के लिए पूरी ताकत झोंक दी. गढ़पुरा को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया. जगह-जगह पुलिस बल की तैनाती की गयी और आंदोलनकारियों पर नजर रखी जाने लगी. हालांकि, अंग्रेजी हुकूमत का भय स्वतंत्रता सेनानियों के हौसले को नहीं डिगा सका.
21 अप्रैल 1930 को अंग्रेजी कानून को चुनौती देकर बनाया गया नमक
21 अप्रैल 1930 को गढ़पुरा की धरती पर अंग्रेजी कानून को चुनौती देते हुए नमक बनाया गया. यह महज नमक बनाने की प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि ब्रिटिश शासन के उस कानून को खुली चुनौती थी, जिसके तहत भारतीयों के रोजमर्रा के जीवन से जुड़े नमक पर भी अंग्रेजों ने अपना अधिकार जमा रखा था. गढ़पुरा में नमक बनाकर आंदोलनकारियों ने यह साबित कर दिया कि आजादी की लड़ाई केवल शहरों तक सीमित नहीं थी, बल्कि गांवों की चौपालों और खेत-खलिहानों तक पहुंच चुकी थी.
गिरफ्तारी के बाद जेल में मिली यातनाएं, 1931 में हुआ निधन
नमक सत्याग्रह सफल होने के बाद अंग्रेजी पुलिस ने आंदोलन के प्रमुख कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी शुरू कर दी. बाबू बिंदेश्वरी प्रसाद सिंह को भी गिरफ्तार कर भागलपुर जेल भेज दिया गया. जेल में उन्हें कथित तौर पर तरह-तरह की यातनाएं दी गयीं. बताया जाता है कि जेल की यातनाओं ने उनके शरीर को इतना कमजोर कर दिया था कि वे फिर पूरी तरह स्वस्थ नहीं हो सके. कुछ ही समय बाद वर्ष 1931 में बाबू बिंदेश्वरी प्रसाद सिंह का निधन हो गया. इस तरह गढ़पुरा के ‘कैप्टन साहब’ ने देश की आजादी की लड़ाई में अपना जीवन समर्पित कर दिया.
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इतिहास में दर्ज है गाथा, लेकिन जमीन पर स्मृतियां आज भी उपेक्षित
गढ़पुरा के नमक सत्याग्रह की कहानी आज भी स्थानीय लोगों के लिए गौरव का विषय है. लोगों का कहना है कि बाबू बिंदेश्वरी प्रसाद सिंह जैसे स्वतंत्रता सेनानी की स्मृति को जीवित रखने के लिए नमक सत्याग्रह स्थल का समुचित विकास किया जाना चाहिए. स्थानीय लोगों के मन में आज भी यह सवाल है कि जिस ‘कैप्टन साहब’ ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष करते हुए अपना जीवन देश के लिए समर्पित कर दिया, उनकी स्मृति को सम्मान देने के लिए आखिर अब तक ठोस पहल क्यों नहीं हो सकी.
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‘कैप्टन साहब’ की प्रतिमा का आज भी इंतजार
गढ़पुरा के लोग चाहते हैं कि नमक सत्याग्रह के इतिहास को संरक्षित किया जाए और बाबू बिंदेश्वरी प्रसाद सिंह की स्मृति में उनकी प्रतिमा स्थापित की जाए. लोगों का मानना है कि इससे नई पीढ़ी को स्थानीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास और उन गुमनाम नायकों के योगदान से परिचित होने का अवसर मिलेगा.
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