58 साल पुरानी कांवरिया धर्मशाला को मिलेगा नया जीवन, श्रावणी मेले से पहले शुरू हुआ जीर्णोद्धार कार्य

Published by : AMIT KUMAR SINH Updated At : 02 Jun 2026 9:42 AM

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Banka News : सुल्तानगंज से बाबाधाम जाने वाले लाखों कांवरियों की आस्था से जुड़ी एक ऐतिहासिक धर्मशाला फिर से अपने पुराने गौरव को पाने की ओर बढ़ रही है. वर्षों की उपेक्षा से जर्जर हो चुकी प्रसिद्ध कांवरिया धर्मशाला का जीर्णोद्धार अब कांवरिया बाबा के परिजनों ने अपने हाथों में ले लिया है. लक्ष्य है कि आगामी श्रावणी मेले में शिवभक्तों को फिर से नि:शुल्क और बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें.

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कटोरिया (बांका) से दीपक चौधरी की रिपोर्ट

Banka News : कटोरिया के निकट कच्ची कांवरिया पथ पर स्थित ऐतिहासिक कांवरिया धर्मशाला कभी श्रावणी मेले में आने वाले लाखों शिवभक्तों के लिए प्रमुख पड़ाव हुआ करती थी. लेकिन पिछले कई वर्षों से देखरेख, मरम्मत और रंग-रोगन के अभाव में इसकी हालत जर्जर हो गई थी. अब धर्मशाला के निर्माता रहे श्रद्धालु वीरेंद्र प्रसाद चौधरी उर्फ कांवरिया बाबा के परिजनों ने इसके पुनर्निर्माण और जीर्णोद्धार का बीड़ा उठाया है, जिससे एक बार फिर यह स्थान कांवरियों की सेवा का केंद्र बन सके.

श्रावणी मेले में नि:शुल्क सेवा देने का संकल्प

कांवरिया धर्मशाला के जीर्णोद्धार का मुख्य उद्देश्य आगामी श्रावणी मेले में आने वाले शिवभक्तों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना है. धर्मशाला में ठहराव, पेयजल, शौचालय, स्नानागार, बिजली, साफ-सफाई और भोजन बनाने के लिए रसोईघर जैसी बुनियादी सुविधाओं को दुरुस्त किया जा रहा है. परिजनों का कहना है कि बाबा की सेवा और श्रद्धा की परंपरा को फिर से जीवंत करना ही उनका लक्ष्य है.

1966 में रखी गई थी सेवा की नींव

बिहार के सहरसा जिले के राज-सोनवर्षा निवासी श्रद्धालु वीरेंद्र प्रसाद चौधरी, जिन्हें लोग कांवरिया बाबा के नाम से जानते थे, ने वर्ष 1966 में इस धर्मशाला का निर्माण कराया था. उस समय यह कांवरिया पथ पर यात्रियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण विश्राम स्थलों में गिनी जाती थी. धर्मशाला परिसर में 78 कमरे, शौचालय, स्नानागार, रसोईघर, कुआं, भूमिगत गुफा और विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित की गई थीं.

भजन और नृत्य से गूंजता था पूरा परिसर

कांवरिया बाबा केवल धर्मशाला के संस्थापक ही नहीं, बल्कि अपनी अनूठी भक्ति शैली के लिए भी प्रसिद्ध थे. प्रत्येक संध्या आयोजित भजन कार्यक्रम में वे हाथ में आरती की थाल लेकर भक्ति में लीन होकर नृत्य करते थे. उनका यह अंदाज इतना लोकप्रिय था कि दूर-दूर से कांवरियों के साथ स्थानीय लोग भी उन्हें देखने पहुंचते थे. उस दौर में धर्मशाला धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र मानी जाती थी.

श्रावणी मेले में हुई थी कांवरिया बाबा की हत्या

धर्मशाला के इतिहास का सबसे दुखद अध्याय वर्ष 1978 में जुड़ा. 28 जुलाई 1978 को श्रावणी मेले के दौरान कांवरिया वेश में आए अपराधियों ने पहले धर्मशाला की गुफा को लेकर अफवाह फैलाई और फिर जान बचाकर भाग रहे कांवरिया बाबा की लाठी-डंडों से पीटकर हत्या कर दी. इस घटना ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया था. उस भयावह घटना के चश्मदीद रहे परिजन आज भी उस पल को याद कर भावुक हो जाते हैं.

सरकारी समिति के भरोसे रह गई थी धर्मशाला

कांवरिया बाबा की मृत्यु के बाद धर्मशाला की देखरेख एक सरकारी समिति के माध्यम से की जाने लगी. समिति में स्थानीय विधायक अध्यक्ष, अंचलाधिकारी सचिव और अन्य सदस्य शामिल होते थे. समय के साथ समुचित रखरखाव नहीं होने के कारण धर्मशाला की स्थिति लगातार खराब होती चली गई और यह ऐतिहासिक धरोहर उपेक्षा का शिकार हो गई.

अब परिजनों ने संभाली विरासत की जिम्मेदारी

धर्मशाला की जर्जर होती स्थिति को देखते हुए अब कांवरिया बाबा के परिजनों ने इसकी जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली है. युद्धस्तर पर मरम्मत, रंग-रोगन, बिजली वायरिंग और अन्य जरूरी कार्य कराए जा रहे हैं. इस अभियान में कांवरिया बाबा के इकलौते पुत्र भोला चौधरी के साथ पुत्रियां वीणा जायसवाल, रेखा आर्या, रीता जायसवाल, अनिता जायसवाल, शीतल देवी तथा नतिनियां लक्ष्मी जायसवाल और रोमा गुप्ता सक्रिय भूमिका निभा रही हैं.

आस्था की विरासत को बचाने की पहल

करीब छह दशक पुरानी यह धर्मशाला केवल एक भवन नहीं, बल्कि लाखों कांवरियों की आस्था और सेवा की विरासत है. परिजनों की पहल से अब उम्मीद जगी है कि श्रावणी मेले में आने वाले शिवभक्तों को फिर से वही सुविधाएं और आत्मीयता मिलेगी, जिसके लिए यह धर्मशाला कभी पूरे कांवरिया पथ में प्रसिद्ध हुआ करती थी.

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