औरंगाबाद में आषाढ़ की फुहार में खो गई बारहमासा की धुन, आधुनिकता की मार से विलुप्त हो रही गांवों की लोक परंपरा

धान रोपाई के दौरान गीत गाती महिलाएं
आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव से गांवों की सदियों पुरानी लोक परंपराएं, खासकर आषाढ़ के महीने में गाए जाने वाले बारहमासा गीत, धीरे-धीरे विलुप्त हो रहे हैं. मोबाइल और टीवी ने इनकी जगह ले ली है, जिससे युवा पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक विरासत से दूर हो रही है. लोक संस्कृति को बचाने के लिए दस्तावेजीकरण और प्रशिक्षण की तत्काल आवश्यकता है.
कुटुंबा. लोकसंस्कृति पर आधुनिकता का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है. कभी आषाढ़ की पहली फुहार पड़ते ही गांवों की गलियां, चौपालें और धान के खेत बारहमासा के विरह गीतों से गूंज उठते थे, लेकिन अब यह परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है.
बादलों की गड़गड़ाहट, रिमझिम बारिश और धान की रोपनी के बीच महिलाओं के सामूहिक लोकगीत ग्रामीण जीवन की पहचान हुआ करते थे. इन गीतों में प्रेम, विरह, प्रकृति और बदलती ऋतुओं की भावनाओं का सुंदर चित्रण होता था.
खेतों से गायब हो रही बारहमासा, कजरी और झूमर की आवाज
धान की रोपनी के समय महिलाएं खेतों में बिचड़ा उखाड़ते और रोपनी करते हुए बारहमासा, कजरी और झूमर जैसे लोकगीत गाती थीं. ये गीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं थे, बल्कि ग्रामीण समाज की भावनाओं, रिश्तों और प्रकृति से जुड़ाव के जीवंत दस्तावेज थे.
आषाढ़ में गाए जाने वाले विरह गीतों में परदेस गए प्रियतम की याद और विरहिणी के मन की पीड़ा को बेहद भावपूर्ण तरीके से प्रस्तुत किया जाता था.
बुजुर्गों की यादों में अब भी जिंदा हैं लोकधुनें
ग्रामीण बुजुर्गों की स्मृतियों में आज भी बारहमासा गीतों की मधुर धुनें मौजूद हैं. लोकगीतों में आषाढ़ की बदरिया, प्रियतम की दूरी और मन की व्यथा को सरल शब्दों में व्यक्त किया जाता था.
मैथिली के महान कवि विद्यापति की विरह रचनाएं भी इसी लोक संवेदना को दर्शाती हैं. हिंदी साहित्य में भी बारहमासा परंपरा को कई कवियों ने अपनी रचनाओं में स्थान दिया है.
पाठ्यक्रम से दूर हुईं लोक साहित्य की रचनाएं
शिक्षाविदों का कहना है कि पहले विद्यालयों और महाविद्यालयों में बारहमासा से जुड़ी कई रचनाएं पढ़ाई जाती थीं, लेकिन समय के साथ इनमें से कई साहित्यिक रचनाएं पाठ्यक्रम से बाहर हो गईं.
इसका असर नई पीढ़ी पर पड़ा और युवा वर्ग अपनी लोक परंपराओं से धीरे-धीरे दूर होता गया. ग्रामीणों का कहना है कि पहले रोपनी के दौरान गीत गाने से काम की थकान कम महसूस होती थी, लेकिन अब मोबाइल, टीवी और सोशल मीडिया ने इन परंपराओं की जगह ले ली है.
दस्तावेजीकरण और प्रशिक्षण से बच सकती है लोक विरासत
लोक संस्कृति से जुड़े जानकारों का मानना है कि बारहमासा, कजरी और अन्य पारंपरिक लोकगीतों को बचाने के लिए इनके दस्तावेजीकरण और नई पीढ़ी को प्रशिक्षण देने की जरूरत है.
डॉ. सुरेंद्र प्रसाद मिश्रा, डॉ. कुमार वीरेंद्र, सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. रामाधार सिंह और डॉ. सिद्धेश्वर प्रसाद सिंह जैसे विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते इन लोक परंपराओं को संरक्षित नहीं किया गया तो आने वाले समय में यह धरोहर केवल किताबों और बुजुर्गों की यादों तक सीमित रह जाएगी.
लोक संस्कृति बचाने के लिए पहल की जरूरत
जानकारों का कहना है कि आधुनिकता जरूरी है, लेकिन अपनी लोक संस्कृति को बचाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है. इसके लिए सामाजिक संगठनों, प्रशासन, कला एवं संस्कृति विभाग और शैक्षणिक संस्थानों को मिलकर विशेष कार्यक्रम चलाने की जरूरत है.
लोकगीतों का संरक्षण न केवल पुरानी परंपराओं को बचाएगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक विरासत से भी जोड़कर रखेगा.
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