कभी गरमी की छुट्टी का रहता था इंतजार
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :20 May 2016 9:18 AM (IST)
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औरंगाबाद (सदर) : एक समय था जब गरमी की छुट्टियों का अलग मजा होता था. पहले गरमी की छुट्टी का इंतजार पूरे एक वर्ष तक किया जाता था. क्योंकि ठंड की छुट्टियां यदा-कदा ही होती थी. छुट्टी बिताने का तरीका भी कुछ अलग होता था. न होम वर्क का बोझ और न मॉडल बनाने का […]
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औरंगाबाद (सदर) : एक समय था जब गरमी की छुट्टियों का अलग मजा होता था. पहले गरमी की छुट्टी का इंतजार पूरे एक वर्ष तक किया जाता था. क्योंकि ठंड की छुट्टियां यदा-कदा ही होती थी.
छुट्टी बिताने का तरीका भी कुछ अलग होता था. न होम वर्क का बोझ और न मॉडल बनाने का टेंशन होता था. आज गरमी के मौसम में आये बदलाव ने बहुत से चीजों को बदल कर रख दिया है. दूसरी ओर आधुनिकता ने भी रहन-सहन के साथ बच्चों की गरमी छुट्टी को भी प्रभावित किया है. एक समय था जब गरमी की छुट्टियां होते ही लोग गांव की ओर रूख कर लेते थे और लोगों का हर संभव प्रयास होता था कि वे अपनी गरमी की छुट्टियां बच्चों के साथ रिश्तेदारों के बीच बिताये.
पड़ोसी के बागीचे से आम तोड़ने का मजा ही कुछ और था
जब भी गरमी की छुट्टी का वक्त आता था, दोस्तों के साथ मिल कर तरह-तरह की योजनाएं बननी शुरू हो जाती थी. गांव में समय बिताना और पड़ोसी के बागीचे से आम तोड़ने का मजा ही कुछ और था. इस छुट्टी के दौरान अपने स्कूल के रूटीन को भुला कर सिर्फ मौज मस्ती ही सुझती थी.
घर में जब तक पिता जी नहीं आ-जाते थे,तब तक बाहर ही खेलकूद में समय बीतता था. कभी-कभी धूप में खेलने निकल जाने पर पिता जी की डांट भी सुननी पड़ती थी. लेकिन, इस डांट डपट के बाद भी दोस्तों का साथ नहीं छूटता था. सैर सपाटे का शौकीन था. इस लिए रिश्ते नातेदारों के अलावा बहुत से जगह पर घुमने का मौका मिला. छुट्टी के समय किताबें पढ़ना अच्छा लगता था. खेल में क्रिकेट, बॉलीबाल, फुटबाल और बैडमिंटन खेलना पसंद था.
आनंद शंकर, विधायक, औरंगाबाद
बड़ी पारंपरिक थी तब की गरमी छुट्टी
70 से 80 के दशक के स्कूल के बच्चों की गरमी छुट्टी बड़ी अलग थी. तब न तो सूचना तंत्र इतना मजबूत था और न ही मनोरंजन के लिए टीवी उपलब्ध थे. मिट्टी के घरों में रहने का आनंद और रिश्तेदारों के यहां घूमने का मौका खूब मिलता था.
छुट्टी शुरू होते ही रिश्तेदारों की लिस्ट बन जाती थी. किस किस के यहां कितना वक्त बिताना है और किनसे-किनसे मिलना है ये तय कर लिया जाता था. फिर पूरी गरमी छुट्टी या तो गांव में या फिर रिश्तेदारों के यहां बीतती थी. तब पुराने घरों में तहखाने होते थे जो ठंड हुआ करते थे. यह वह समय था जब घरों में न तो एयर कंडिशनर था और न ही पानी वाले कूलर. लेकिन, अब यह परंपरा देखने को नहीं मिलती है.
अजीत सिंह, समाजसेवी
छुट्टी में जाना पड़ता है पोते से मिलने
आज लोग इतने व्यस्त हो गये हैं कि वे बच्चों की गरमी छुट्टी अपने हिसाब से तय करते हैं. गांवों में छुट्टी बिताना पसंद न कर किसी हील स्टेशन या ठंडे प्रदेश की सैर करना अच्छा समझते हैं.
पहले लोग रिश्तेदारों के यहां गरमी छुट्टी होते ही पहुंच जाया करते थे. छुट्टी का हर दिन तय होता था कि फुआ के यहां कितने दिन रहना है और नाना के घर कब जाना है. आज ये परंपरा बदली है. जिसका परिणाम है कि अब गरमी छुट्टी में मुझे अपने पोते से मिलने खुद दूर जाना पड़ता है.
रसिक बिहारी सिंह, वरीय अधिवक्ता
दोस्तों के साथ सैर करना लगता था अच्छा
गरमी की छुट्टी आते ही मौज-मस्ती का दौर शुरू हो जाता था. सबके डांट-डपट से दूर नाना-नानी के गांव और वहां के दोस्तों के साथ सैर करना बड़ा अच्छा लगता था. पहले से तय होता था कि इस बार की गरमी छुट्टी मामा के घर बितानी है. इसके बाद ही किसी दूसरे जगह पर घूमने का प्लान किया जाता था. गांव में लू के थपेड़ों के बीच साइकिल की सवारी में वक्त कब बीत जाता था पता ही नहीं चलता था. इसके अलावा गांव की शादियां भी छुट्टी के वक्त बहुत रास आती थी. आज वो बचपन देखने को नहीं मिलता.
डाॅ अमित, दंत चिकित्सक
गरमी छुट्टी होते ही याद आता था ममहर
गरमी की छुट्टी होते ही सबसे पहले ममहर का याद आता था. उस वक्त गांव में गरमी की छुट्टी बिताने का एक अलग मजा होता था. गांव में पड़ोसी की दीवार पर चढ़ कर चुपके से आम और अमरूद तोड़ना भी बड़ा अच्छा लगता था. तूत तोड़ना और बगानों में खेले जानेवाले खेल काफी प्रिय होते थे.
इसके अलावा शारीरिक व्यायाम और विभिन्न तरह के खेल पसंद थे. गांव में उस वक्त ठंडे के जगह घर लौटने पर सतू और अमझोर पीने को मिलता था. छुट्टी के वक्त मां बाहर निकलने पर पॉकेट में प्याज के टुकड़े रख देती थी, ताकि लू का असर न हो. बहुत सुहाने थे वो दिन.
नागेंद्र दूबे, चिकित्साकर्मी
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