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जैन धर्म में पर्युषण महापर्व का अपना विशेष महत्व : मुनिश्री विशल्यसागर

Updated at : 27 Aug 2025 6:24 PM (IST)
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जैन धर्म में पर्युषण महापर्व का अपना विशेष महत्व : मुनिश्री विशल्यसागर

श्री दिगंबर जैन चंद्रप्रभु मंदिर में चल रहा चातुर्मास

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आरा.

श्री दिगंबर जैन चंद्रप्रभु मंदिर में चातुर्मास कर रहे मुनि श्री 108 विशल्यसागर महाराज ने धर्मसभा में बताया कि जैन धर्म में पर्युषण महापर्व का अपना विशेष महत्व है. यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा की गहराइयों तक जाने का, आत्मनिरीक्षण करने का और आत्मशुद्धि का अनूठा पर्व है. जैन संस्कृति ने सदियों से इस पर्व को आत्मकल्याण, साधना और तपस्या का महान माध्यम बनाया है. पर्युषण का शाब्दिक अर्थ है अपने भीतर ठहरना, आत्मा में रमना, आत्मा के समीप होना.

इस वर्ष अंत:करण की शुद्धि का यह महापर्व 28 अगस्त से 6 सितंबर को मनाया जाना है. जैन धर्म में पयुर्षण पर्व का सर्वाधिक महत्व है. यह पर्व धार्मिक,आत्मिक व सांस्कृतिक नवचेतना को जागृत करने अपनी पृथक भूमिका प्रदान करता है. इन दिनों में सहज रूप से जन्मजात जैन कहलाने वाले प्रत्येक गृहस्थ के मन में एक धार्मिक संस्कार जागृत होते हैं. जैसे बरसात के मौसम में धरती पर सहज जी घास अंकुरित व पल्लवित होती है ,उसी प्रकार भादो के महीने में सहज ही व्यक्ति के मन में त्याग, तपस्या, दर्शन, पूजन, भजन आदि की भावना उत्पन्न होती है. यह भाद्रपद का महीना ही व्रत पर्व का महीना माना जाता है. जिस प्रकार मनुष्यों में राजा श्रेष्ठ होता है, उसी प्रकार से सब महीनों में यह भाद्रपद का महीना सर्वश्रेष्ठ है. क्योंकि यह माह अनेक व्रतों की खान है. धर्म का प्रधान कारण है. इस महीने में सबसे अधिक व्रत आते हैं. षोडश कारण , श्रुत स्कन्ध , जिनमुखावलोकन, और मेघमाला ये चार व्रत तो पूरे माह किये जाते हैं.दशलक्षण, रत्नत्रय, पुष्पाञ्जलि, आकाश- पंचमी, सुगंध दशमी, अनन्त चतुर्दशी, चन्दनषष्ठी, निर्दोष सप्तमी, तीस चौबीसी, रोहिणीव्रत, निःशल्यअष्टमी, दुग्ध रसी, धनदकलश, शीतल सप्तमी, कांजी बारस, लघु मुक्तावली, त्रिलोक तीज और श्रवण द्वादशी आदि व्रत सम्पन्न किये जाते हैं. वैसे भी यह भारत देश पर्व प्रधान देश है.पर्व भारतीय संस्कृति का प्राण है. भारतीय पर्वां में धर्म चिंतन और संस्कारों की छवि मूर्तिमान होती है.पर्व हमारी संस्कृति के पोषक हैं. उर्वरक है ,जीवन शक्ति हैं. पर्वों में जीना लीन होना ही पर्वों की सार्थकता है. यह पर्व लौकिक व अलौकिक के भेद से दो प्रकार का है. लौकिक पर्व तो त्योहार के रूप में मनाया जाता है, जिसमें प्रारम्भ भी है अन्त भी है.इसमें सांसारिकता झलक सकती है.पर अलौकिक पर्व का न अथ है. न इति है. ये शाश्वत है. मात्र आत्मा के कल्मष को धोने की भावना से ही किये जाते हैं.पर्व शब्द का अर्थ होता है.प का अर्थ होता है पापों को, र का अर्थ होता है रग रग से तथा व का अर्थ होता है विसर्जन करना. पयूर्षण पर्व अर्थात दशलक्षण पर्व अपनी जिन्दगी में अपने पापों को रग रग से विसर्जित कर दो.उसी दिन तुम्हारे भीतर का सारा प्रदूषण समाप्त हो जाएगा.पयूर्षण पर्व की शाश्वत सुंगध से आत्मा सुवासित हो जायेगी. मीडिया प्रभारी निलेश कुमार जैन ने बताया कि पर्यूषण महापर्व जिसे दशलक्षण पर्व के नाम से भी जाना जाता है. इन 10 दिन जैन मंदिरों में श्रावकों के द्वारा विशेष पूजन, अनुष्ठान एवं व्रत इत्यादि किया जाता है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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DEVENDRA DUBEY is a contributor at Prabhat Khabar.

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