आरा : देवराहा धाम में संकीर्तन और महाभंडारा, शिवनाथ महाराज बोले- ईश्वर कृपा के लिए सतोगुणी बनें

शिष्यों को आशीर्वचन देते संत शिवनाथ दास जी महाराज | Prabhat Khabar Network
Arrah News : परमपूज्य त्रिकालदर्शी विदेह संत श्री देवराहा शिवनाथ दासजी महाराज की 36वीं पुण्यतिथि पर श्रीदेवराहा धाम सिअरुआ में संकीर्तन और विशाल भंडारे का आयोजन हुआ. संतश्री ने अच्छे कर्मों से सद्गति प्राप्त करने और ईश्वर की शरण में रहने का महत्व बताया.
Arrah News : परमपूज्य त्रिकालदर्शी परमसिद्ध विदेह संत श्री देवराहा शिवनाथ दासजी महाराज के सान्निध्य में आज जगदीशपुर स्थित श्रीदेवराहा धाम सिअरुआ में श्री देवराहा बाबाजी महाराज की 36वीं पुण्यतिथि के पावन अवसर पर संकीर्तन और विशाल भंडारे का आयोजन किया गया.
वहीं, संकीर्तन की पूर्णाहुति के पश्चात श्रद्धालु भक्तों को संबोधित करते हुए संत श्री देवराहा शिवनाथ दासजी महाराज ने कहा कि आया है सो जाएगा, राजा रंक फकीर. कोई सवारी चढ़ चले, कोई बंधे जंजीर. संतश्री ने आगे कहा कि इस संसार में जिसने भी जन्म लिया है, उसकी मृत्यु निश्चित है, चाहे वह कोई बहुत बड़ा राजा हो, गरीब (रंक) हो या कोई फकीर हो.
अच्छे कर्मों से मिलती है सद्गति
मृत्यु के बाद सबको जाना ही है, लेकिन जीवन के कर्मों के अनुसार गति अलग-अलग होती है. अच्छे कर्म करने वाले को सम्मान (सिंहासन) मिलता है, जबकि बुरे कर्म करने वाले को कर्मों के बंधनों (जंजीरों) और सजा का सामना करना पड़ता है. संतश्री ने आगे कहा कि हमें अहंकार को त्यागकर ईश्वर की शरण में रहकर अच्छे कर्म करने चाहिए.
लोग इस नश्वर संसार के पीछे पागल हुए जा रहे हैं. सबमें यह होड़ लगी है कि हम बड़े हैं तो हम बड़े हैं. लोग दिखावे और बड़ेपन का स्वांग रच रहे हैं. इसके चक्कर में लोग एक-दूसरे की हिंसा कर रहे हैं और भगवद्भजन से दूर होते जा रहे हैं.
प्रभु सुमिरन से दूर होंगे अवगुण
लोग यह समझ रहे हैं कि हम अमर हैं, परंतु यह सत्य नहीं है. मृत्यु अटल सत्य है. इसलिए जीव को सभी कपट, दंभ आदि का त्याग कर सच्चे हृदय से भगवान का भजन करना चाहिए. ऐसा करने से जीव को भगवान धीरे-धीरे सभी अवगुणों से मुक्त कर सदाचारी बना देते हैं और कृपा की ऐसी बरसात कर देते हैं कि जीव ईश्वर कृपा लेते-लेते थक जाता है, परन्तु भगवान कृपा की बरसात करते नहीं थकते हैं.
रामायण में भी लिखा है कि 'मोहि संवारही हो सब भांति, जासु कृपा नहीं कृपा अघाती'. इसलिए जीव को सतोगुणी बनना चाहिए, जिससे ईश्वरीय कृपा का लाभ प्राप्त हो सके. इस दौरान हजारों श्रद्धालु भक्तों ने महाभंडारे का प्रसाद ग्रहण किया.
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