नामी दुकानों के नाम पर फर्जी ई-वेस्ट कलेक्शन सेंटर, कचरा खपाने के नाम पर चल रहा है खेल

Updated at : 29 Sep 2018 3:25 AM (IST)
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नामी दुकानों के नाम पर फर्जी ई-वेस्ट कलेक्शन सेंटर, कचरा खपाने के नाम पर चल रहा है खेल

पटना : राजधानी में ई-वेस्ट खपाने के नाम पर फर्जी खेल चल रहा है. बिहार स्टेट प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से जारी सूची के अनुसार शहर और आसपास के क्षेत्रों में 41 ऐसे सेंटरों को बताया गया, जिनके द्वारा ई-वेस्ट कचरा मसलन खराब कंप्यूटर, फ्रिज, एसी से लेकर तमाम खराब इलेक्ट्राॅनिक कचरों का संग्रह […]

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पटना : राजधानी में ई-वेस्ट खपाने के नाम पर फर्जी खेल चल रहा है. बिहार स्टेट प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से जारी सूची के अनुसार शहर और आसपास के क्षेत्रों में 41 ऐसे सेंटरों को बताया गया, जिनके द्वारा ई-वेस्ट कचरा मसलन खराब कंप्यूटर, फ्रिज, एसी से लेकर तमाम खराब इलेक्ट्राॅनिक कचरों का संग्रह किया जाता है, ताकि इनके बेकार फेंके जाने पर पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं हो.
मगर मजेदार बात यह है कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वेबसाइट पर जिन कलेक्शन सेंटरों के नाम और पते हैं, उनमें से अधिकांश इलेक्ट्रॉनिक या उससे संबंधित अच्छे प्रतिष्ठान हैं और यहां ई-वेस्ट लेने का कोई काम नहीं किया जाता है. अधिकतर प्रतिष्ठानों को इसकी जानकारी तक नहीं है कि उनको ई-वेस्ट लेने जैसा कोई काम प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से दिया गया है.
कबाड़ में खपाने का काम
शहर में मुख्य रूप से सामान्य कबाड़ की दुकानों के माध्यम से ई-वेस्ट कचरा खपाने का काम किया जाता है. पटना जंक्शन, जमाल रोड, इंद्रपुरी, पटना सिटी से लेकर अन्य कई इलाके हैं, जहां कबाड़ वाले ई-वेस्ट कबाड़ लेते हैं. मुख्य रूप से कंप्यूटर, लैपटॉप, वाशिंग मशीन, रेफ्रिजरेटर, एसी, टीवी समेत अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण शामिल होते हैं. जिन्हें जैविक तरीके से नष्ट नहीं किया जा सकता. जानकारी के मुताबिक अकेले पटना में प्रतिमाह 300 मीट्रिक टन केवल कबाड़ की दुकानों में होता है. इसके अलावा लोग सामान्य कचरे में भी इसको फेंक देते हैं.
कमाई के खेल में बढ़ रहा प्रदूषण
ई-वेस्ट में सबसे घातक पारा और सीसा जैसे तत्व हैं, जो भूजल को विषैला बनाते हैं. जानकारी के मुताबिक, 4-8 पाउंड की लेड (लगभग 2-4 किलोग्राम) इलेक्ट्रॉनिक कचरे में टीवी कंप्यूटर मॉनिटर्स और डिस्प्ले ट्यूबों में पायी जाती है और लगभग 40 प्रतिशत पारा और कैडमियम पर्यावरण में ई-अपशिष्ट द्वारा आता है.
कबाड़ी वाले ई-वेस्ट को तोड़कर या जलाकर कॉपर व अन्य धातु निकाल लेते हैं.इस दौरान क्लोरोनेटेड, ब्रोमिनेटेड के अलावा लेड, कैडमियम, मर्करी जैसे खरतनाक तत्व भी खुली हवा में पहुंच रहे हैं. आकलन के मुताबिक समूचे बिहार में हर माह दस मीटरिक टन इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक कचरा खुले में फेंका जा रहा है. सामान्य तरीके से ई-वेस्ट को गला कर उसमें मौजूद कई कीमती धातुओं को निकाला जाता है.
पड़ताल में सच्चाई
प्रभात खबर ने ऐसे कई प्रतिष्ठानों की पड़ताल की, जो प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वेबसाइट पर ई-वेस्ट कलेक्शन सेंटर के नाम पर दिये गये हैं.
जमाल रोड स्थित कॉनो कॉर्प इंटरनेशनल दुकान की पड़ताल की गयी. यह प्रतिष्ठान प्रिंटर व संबंधित अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामनों की दुकान है. दुकान के हरेंद्र सिंह ने बताया कि उनके यहां ई-वेस्ट कलेक्शन सेंटर जैसी कोई सुविधा नहीं दी जाती है. न ही प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से इसके लिए कभी कोई पहल की गयी है. इसमें फर्जी तरीके से मेरे प्रतिष्ठान का नाम दिया गया है.
जमाल रोड पर ही स्थित बालाजी साॅल्यूशन
लिमिटेड के लोगों से भी इसकी जानकारी ली गयी. मुख्य रूप से यह प्रतिष्ठान कंप्यूटर बनाने की एजेंसी है. वेबसाइट पर इसका नाम भी है. यहां भी ऐसी कोई सेवा नहीं दी जाती है.
एग्जिबिशन रोड के आशियाना गैलेक्सी टावर में स्थित मेटोरोला मॉबिलिटी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड की पड़ताल की गयी. यहां के मैनेजर ने बताया कि यहां मोबाइल व संबंधित अन्य सामानों को बनाने का काम किया जाता है. ई-वेस्ट कचरा कलेक्शन जैसी कोई सुविधा नहीं है.
जमाल रोड के जुपिटर इंटरनेशनल लिमिटेड से
जानकारी ली गयी. वहां मौजूद कर्मचारी ने बताया कि यहां भी ई-वेस्ट कलेक्शन जैसी कोई सुविधा नहीं है.
इसके अलावा अन्य कई प्रतिष्ठानों ने भी इस बात से
इन्कार किया कि उनके यहां कोई ई-वेस्ट कलेक्शन का काम होता है. वहीं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वेबसाइट पर कई प्रतिष्ठानों की जानकारी दी गयी है, जिनका पता या तो अधूरा है या गलत है.
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