बासी भात-रोटी खाकर मेडल लानेवाले झारखंड-बिहार के ये बच्चे
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 25 Aug 2019 11:42 AM
झारखंड का सिमडेगा जिला हॉकी खिलाडि़यों का जनक रहा है. यहां की धरती ने कई उर्जावान खिलाड़ी देश को दिये हैं. हॉकी इंडिया की महिला टीम में झारखंड की खिलाडि़यों का दबदबा है. झारखंड के सिमडेगा जिले की आदिवासी बच्चियां लगातार टीम के सदस्य के रूप में अपना बेहतरीन प्रदर्शन कर रही हैं. संगीता कुमारी […]
झारखंड का सिमडेगा जिला हॉकी खिलाडि़यों का जनक रहा है. यहां की धरती ने कई उर्जावान खिलाड़ी देश को दिये हैं. हॉकी इंडिया की महिला टीम में झारखंड की खिलाडि़यों का दबदबा है. झारखंड के सिमडेगा जिले की आदिवासी बच्चियां लगातार टीम के सदस्य के रूप में अपना बेहतरीन प्रदर्शन कर रही हैं.
संगीता कुमारी भी उनमें से एक हैं. वह झारखंड के पिछले 50 वर्षों के हॉकी इतिहास में पहली स्ट्राइकर हैं. 2016 में हुए उन्होंने अंडर एशिया कप में भारत की ओर से सर्वाधिक गोल (कुल 14 में से 8 गोल) किया था. उनके परिवार की आर्थिक स्थिति का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि संगीता के मजदूर पिता व गृहिणी मां के पास इतने पैसे नहीं है कि वे अपनी पांचों बेटियों को एक साथ पढ़ा सकें. इस वजह से एक साल संगीता की एक बहन पढ़ती है, तो अगले साल दूसरी. इसी तरह से उनके कपड़े भी खरीदे जाते हैं और संगीता के खेल के लिए जरूरी चीजें भी.
बीकॉम पार्ट1 में पढ़ रही पटना की कराटे चैंपियन सुष्मिता कुमारी के पापा मैकेनिक हैं और मम्मी एक प्राइवेट नर्सिंग होम में नर्स. तीन भाई-बहनों में दूसरे नंबर की सुष्मिता को उनकी मां ने एडमिशन तो पेंटिंग और डांस में करवाया था, क्योंकि ये ‘लड़कियों वाले काम’ हैं, पर संस्थान में अन्य बच्चों को कराटे करते देख सुष्मिता भी इससे जुड़ गयीं. पिछले सात वर्षों में राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर पर वह कुल 26 मेडल जीत चुकी हैं. अब पैरेंट्स सपोर्ट करते हैं. पर्सनल किट खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं, इसलिए इंटरनेशनल लेवल की प्रैक्टिस नहीं कर पाती. पटना के ही चितकोहरा बाजार निवासी मुस्कान कुमारी के पिता मजदूर और मां गृहिणी हैं. पांच वर्ष पहले अपने पहले ताइक्वांडो प्रतियोगिता में ही गोल्ड जीत गयी थीं. अब तक कुल 30 मेडल जीत चुकी हैं.
बीकॉम पार्ट 1 में पढनेवाली मुस्कान बताती हैं कि- ”संस्थान के ज्यादातर बच्चे पर्सनल स्पोर्ट्स किट अफोर्ड नहीं कर सकते. वह हमें संस्थान से ही मिल जाती है. पहले सप्ताह में दो ही दिन हमारी प्रैक्टिस होती थी, पर हमारी मांग पर अब रोज होती है. इसी वजह से इस बार हुए नेशनल चैंपियनशिप में हमारी टीम कुछ छह मेडल जीतने में सफल रही.
सुष्मिता कुमारी, खजांची रोड, पटना
खेल : कराटे
शिक्षा : बीकॉम पार्ट1
पिता मैकेनिक हैं और मां प्राइवेट नर्स हैं
दो बहन और एक भाई में दूसरे नंबर पर हैं.
कुल 26 पदक जीत चुकी हैं.
गोल्ड : 18 सिल्वर : 04 कांस्य : 04
कन्हैया सिंह (सुष्मिता के कोच)
निवास : बाजार समिति, पटना
05 वर्षों से सुष्मिता को कर रहे हैं प्रशिक्षित
कन्हैया कहते हैं- ”खेलों के प्रति पहले की तुलना में लोगों की मानसिकता थोड़ी बदली जरूर है, लेकिन बिहार में आज भी जो बच्चे मेडल जीत जाते हैं, उन्हें तो पैरेंट्स का सपोर्ट मिलता है, लेकिन जो नहीं ला पाते, उन्हें ताने और फटकार दिये जाते हैं.”
दीप्ति कुमारी
तीरंदाजी
गोल्ड : 18
सिल्वर : 10
कांस्य : 08
पिता : काशीनाथ महतो
गांव : अंगारा, जोन्हा, रांची
तीरंदाजी में कुल 36 राष्ट्रीय पदक प्राप्त
रोहित कोयरी
दीप्ति के कोच
6 साल से दे रहे तीरंदाजी का प्रशिक्षण. राज्य को अब तक 15 नेशनल प्लेयर और 5 नेशनल चैंपियनशिप दे चुके हैं.
सलोनी तिग्गा
खेल : फुटबॉल
निवास : ब्राहबे गांव, मांडर, रांची
शिक्षा : बीए पार्ट 3, एसएस मेमोरियल कॉलेज, कांके, रांची
पिता रिक्शाचलक और मां रेजा (मजदूर) हैं. अपने पांच भाई-बहनों सबसे बड़ी हैं सलोनी राष्ट्रीय स्तर के फुटबॉल प्रतियोगिता में 02 कांस्य पदक जीत चुकी हैं. उन्हें फैमिली का तो पूरा सपोर्ट है, लेकिन घर की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण पिछले चार वर्षों से मोराबादी स्थित साई (SAI) सेंटर में रह रही हैं, ताकि नियमित प्रैक्टिस कर सकें.
स्पोर्ट्स इंडिया करता है खेलों को प्रोत्साहित
हर साल 29 अगस्त को भारत में ‘हॉकी के जादूगर’ के नाम से प्रसिद्ध खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद की जयंती के रूप में राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जाता है. भारत में खेलों को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से 1 मई, 1987 को भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) का गठन किया गया था, जिसे पूर्व में राष्ट्रीय शारीरिक शिक्षा और खेलकूद सोसाइटी (SNIPES) के नाम से जाना जाता था. इस साल फरवरी में खेल मंत्रालय ने पुन: इसका नाम बदल कर ‘स्पोर्ट्स इंडिया’ कर दिया है. इस संस्था के तहत देश की राजधानी दिल्ली और विश्व भर में प्रदान की जा रही खेल संबंधी सुविधाओं के समुचित उपयोग के लिए ‘आएं और खेलें योजना’ संचालित की जाती है, जिसका मुख्य उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों में कार्यान्वित स्पोर्ट्स इंडिया सेंटर्स के माध्यम से स्थानीय खिलाडियों को बढ़ावा देना है.
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