Rama Ekadashi Vrat Katha: रमा एकादशी पर करें इस व्रत कथा का पाठ, घर में हो सकती है सुख, शांति, समृद्धि और सौभाग्य की वृद्धि

Published by :Shaurya Punj
Published at :16 Oct 2025 10:02 AM (IST)
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Rama Ekadashi Vrat Katha in Hindi

रमा एकदाशी व्रत कथा

Rama Ekadashi Vrat Katha in Hindi: आज कार्तिक मास की रमा एकादशी का पावन दिन है. इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा तथा रमा एकादशी व्रत कथा का पाठ करने से घर में सुख, शांति, समृद्धि और सौभाग्य का वास होता है. आइए जानें इस पवित्र व्रत कथा का महत्व और फल.

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Rama Ekadashi Vrat Katha in Hindi: श्री ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को “रमा एकादशी” कहा जाता है. यह तिथि बहुत ही शुभ मानी जाती है क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष रूप से पूजा की जाती है. धर्मशास्त्रों में बताया गया है कि रमा एकादशी का व्रत करने से माता लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और उपासक के घर में स्थायी रूप से निवास करती हैं. इससे घर में सुख, शांति, समृद्धि और सौभाग्य की वृद्धि होती है. जो व्यक्ति इस व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करता है, उसे पापों से मुक्ति और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है.

युधिष्ठिर का प्रश्न और श्रीकृष्ण का उत्तर

एक दिन धर्मराज युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा — “हे भगवन्! कृपया मुझे कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी की कथा सुनाइए. इस एकादशी का नाम क्या है और इसे करने से क्या फल प्राप्त होता है?”

श्रीकृष्ण मुस्कराते हुए बोले — “हे राजन! यह एकादशी रमा एकादशी के नाम से जानी जाती है. जो भी भक्त इस व्रत को करता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे अपार पुण्य की प्राप्ति होती है. अब मैं तुम्हें इस एकादशी की पौराणिक कथा सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो.”

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राजा मुचुकुन्द और उनकी पुत्री चन्द्रभागा

बहुत समय पहले मुचुकुन्द नामक एक महान राजा राज्य करते थे. वे सत्यवादी, धर्मपरायण और भगवान विष्णु के परम भक्त थे. उनके मित्रों में इन्द्र, वरुण, कुबेर और विभीषण जैसे देवता शामिल थे. उनकी एक सुंदर और गुणवान पुत्री थी जिसका नाम चन्द्रभागा था. जब वह बड़ी हुई तो राजा ने उसका विवाह राजा चन्द्रसेन के पुत्र शोभन के साथ कर दिया.

एकादशी का आगमन और चिंता

एक बार चन्द्रभागा अपने ससुराल में थी, तभी कार्तिक मास की एकादशी आई. उसे याद आया कि उसके पिता के राज्य में यह नियम था कि एकादशी के दिन कोई भी व्यक्ति भोजन या जल ग्रहण नहीं करता — यहाँ तक कि जानवरों को भी उस दिन भोजन नहीं दिया जाता था. चन्द्रभागा सोचने लगी, “मेरे पति शोभन बहुत दुर्बल हैं, वे यह कठोर व्रत कैसे कर पाएंगे?”

शोभन और चन्द्रभागा की बातचीत

राजा शोभन ने अपनी पत्नी से कहा, “प्रिय चन्द्रभागा, मुझे बताओ, मैं क्या करूँ? मैं बहुत कमजोर हूँ, क्या मैं इस व्रत को निभा पाऊँगा?”

चन्द्रभागा बोली, “हे स्वामी! मेरे पिता के राज्य में कोई भी व्यक्ति एकादशी के दिन भोजन नहीं करता. यदि आप इस नियम का पालन नहीं कर सकते तो किसी दूसरे राज्य में चले जाइए. यदि आप यहाँ रहेंगे तो आपको व्रत करना ही पड़ेगा.”

शोभन ने उत्तर दिया, “तुम्हारी बात सही है, प्रिये. लेकिन मैं इस व्रत को अवश्य करूँगा. मेरे भाग्य में जो लिखा है, वही होगा.”

व्रत का पालन और शोभन की मृत्यु

शोभन ने श्रद्धा से एकादशी का व्रत रखा. जैसे-जैसे दिन बीता, वह और अधिक कमजोर होता गया. जब रात आई और जागरण का समय हुआ, तब उसकी स्थिति और भी खराब हो गई. अंततः भोर होने से पहले ही शोभन की मृत्यु हो गई. उसके शरीर का अंतिम संस्कार विधिपूर्वक कर दिया गया. चन्द्रभागा ने पति के साथ सती न होकर अपने पिता के घर लौटने का निर्णय लिया.

व्रत का चमत्कारी फल

रमा एकादशी के व्रत के प्रभाव से शोभन को मंदराचल पर्वत पर एक दिव्य और सुंदर नगर प्राप्त हुआ. वह नगर सोने-चाँदी से बना हुआ था, जहाँ सब प्रकार के सुख-सुविधाएँ थीं और कोई शत्रु नहीं था. शोभन वहाँ राजा बनकर निवास करने लगा, परंतु उसका राज्य अध्रुव यानी अस्थायी था.

ब्राह्मण सोम शर्मा की यात्रा

कुछ समय बाद, मुचुकुन्द के राज्य का एक ब्राह्मण, सोम शर्मा, तीर्थयात्रा के लिए निकला. घूमते-घूमते वह मंदराचल पर्वत पहुँचा, जहाँ उसने वह अद्भुत नगर देखा. नगर के वैभव को देखकर वह आश्चर्यचकित हो गया. जब उसने वहाँ के राजा को देखा तो पहचान लिया कि यह तो उसके राजा का दामाद शोभन है.

ब्राह्मण और शोभन की भेंट

ब्राह्मण ने शोभन से जाकर कहा, “राजन! मैं आपके ससुर मुचुकुन्द के राज्य से आया हूँ. वहाँ सब कुशल हैं, आपकी पत्नी चन्द्रभागा भी प्रसन्न हैं.” शोभन ने प्रसन्न होकर कहा, “हे ब्राह्मण! बताओ, मेरे ससुर और पत्नी कुशल हैं, यह सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगा. तुम बताओ, तुम्हें यह नगर कैसा लगा?” ब्राह्मण बोला, “राजन, यह नगर अत्यंत सुंदर और अलौकिक है. मुझे आश्चर्य है कि आपको इतना वैभव कैसे प्राप्त हुआ?”

व्रत का प्रभाव बताना

शोभन ने कहा, “हे ब्राह्मण! यह सब रमा एकादशी व्रत के प्रभाव से मिला है. मैंने श्रद्धा से व्रत किया था, जिससे मुझे यह अद्भुत राज्य प्राप्त हुआ, पर यह राज्य स्थायी नहीं है. यदि मेरी पत्नी चन्द्रभागा इस व्रत के पुण्य से इसे स्थायी बना दे, तो यह सदैव बना रहेगा.” ब्राह्मण ने कहा, “हे राजन्! मैं यह बात चन्द्रभागा तक अवश्य पहुँचाऊँगा.”

चन्द्रभागा की दृढ़ निष्ठा

जब ब्राह्मण लौटकर चन्द्रभागा के पास पहुँचा, तो उसने सारा वृतांत सुनाया. चन्द्रभागा ने कहा, “हे ब्राह्मण! मुझे उस नगर में ले चलो. मैं अपने पति को देखना चाहती हूँ और अपने व्रत के प्रभाव से उस नगर को स्थायी बना दूँगी.”

ऋषि वामदेव का आशीर्वाद

ब्राह्मण चन्द्रभागा को लेकर मंदराचल पर्वत के समीप वामदेव ऋषि के आश्रम पहुँचा. वहाँ ऋषि ने उसकी कथा सुनी और मंत्रों से उसका अभिषेक किया. उन मंत्रों और उसके वर्षों के व्रत के प्रभाव से चन्द्रभागा ने दिव्य देह धारण कर ली. वह अत्यंत सुंदर और तेजस्वी बन गई.

पति-पत्नी का पुनर्मिलन

जब शोभन ने अपनी पत्नी को उस दिव्य रूप में देखा, तो वह अत्यंत प्रसन्न हुआ और उसे अपने पास बैठाया. चन्द्रभागा ने कहा, “हे प्राणनाथ! जब मैं आठ वर्ष की थी, तभी से नियमित रूप से एकादशी का व्रत करती आ रही हूँ. उन व्रतों के प्रभाव से आपका यह नगर अब स्थायी हो जाएगा और कभी नष्ट नहीं होगा.” इसके बाद दोनों पति-पत्नी दिव्य स्वरूप में उस नगर में रहने लगे और आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे.

रमा एकादशी का फल और महिमा

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “हे राजन्! यही रमा एकादशी की पवित्र कथा है. जो व्यक्ति इस व्रत को श्रद्धा से करता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं. यहां तक कि ब्रह्महत्या जैसे महापाप भी समाप्त हो जाते हैं. जो भक्त इस व्रत की कथा को सुनता या सुनाता है, वह मृत्यु के बाद विष्णुलोक में स्थान प्राप्त करता है.”

रमा एकादशी केवल व्रत नहीं, बल्कि श्रद्धा, भक्ति और संयम का प्रतीक है. यह व्रत मनुष्य के जीवन में पवित्रता लाता है, मन को शुद्ध करता है और जीवन में सुख-समृद्धि की वृद्धि करता है. माता लक्ष्मी की कृपा से व्यक्ति के घर में धन, शांति और सौभाग्य का वास होता है. इसलिए प्रत्येक भक्त को इस पवित्र तिथि पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना अवश्य करनी चाहिए.

रमा एकादशी का व्रत किस दिन रखा जाएगा?

इस साल रमा एकादशी का व्रत 17 अक्टूबर 2025, शुक्रवार को रखा जाएगा और पारण 18 अक्टूबर की सुबह शुभ मुहूर्त में किया जाएगा.

रमा एकादशी का दूसरा नाम क्या है?

रमा एकादशी को कभी-कभी कार्तिक कृष्ण पक्ष की एकादशी भी कहा जाता है.

सबसे शक्तिशाली एकादशी कौन सी है?

व्रत और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, रमा एकादशी को सबसे शक्तिशाली एकादशी माना जाता है.

रमा एकादशी का क्या महत्व है?

इस व्रत को करने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं, पाप नष्ट होते हैं और घर में सुख, समृद्धि और सौभाग्य आता है.

एकादशी से क्या फल मिलता है?

एकादशी व्रत करने से पाप नष्ट होते हैं, मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है और जीवन में शांति और समृद्धि आती है.

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Shaurya Punj

लेखक के बारे में

By Shaurya Punj

मैंने डिजिटल मीडिया में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव हासिल किया है. पिछले 6 वर्षों से मैं विशेष रूप से धर्म और ज्योतिष विषयों पर सक्रिय रूप से लेखन कर रहा हूं. ये मेरे प्रमुख विषय हैं और इन्हीं पर किया गया काम मेरी पहचान बन चुका है. हस्तरेखा शास्त्र, राशियों के स्वभाव और उनके गुणों से जुड़ी सामग्री तैयार करने में मेरी निरंतर भागीदारी रही है. रांची के सेंट जेवियर्स कॉलेज से मास कम्युनिकेशन में स्नातक की डिग्री प्राप्त करने के बाद. इसके साथ साथ कंटेंट राइटिंग और मीडिया से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में काम करते हुए मेरी मजबूत पकड़ बनी. इसके अलावा, एंटरटेनमेंट, लाइफस्टाइल और शिक्षा जैसे विषयों पर भी मैंने गहराई से लेखन किया है, जिससे मेरी लेखन शैली संतुलित, भरोसेमंद और पाठक-केंद्रित बनी है.

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