अमावस्या के दिन क्यों किया जाता है पितरों का तर्पण? जानें पौराणिक कथा

Published by :Neha Kumari
Published at :16 Apr 2026 11:59 AM (IST)
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Amavasya 2026

पितरों का तर्पण करते हुए सांकेतिक तस्वीर (एआई)

Vaishakh Amavasya 2026: अमावस्या के दिन पितरों का तर्पण करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पितरों की आत्मा की शांति के लिए इस दिन को इतना अधिक महत्व क्यों दिया गया है? अगर नहीं, तो आइए कथा के माध्यम से जानते हैं इस सवाल का जवाब.

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Vaishakh Amavasya 2026: सनातन परंपरा में अमावस्या की तिथि को पितरों (पूर्वजों) के लिए समर्पित किया गया है. माना जाता है कि इस दिन किया गया दान और तर्पण पूर्वजों की आत्मा को शांति प्रदान करता है और जीवन में सुख-समृद्धि लाता है. आइए जानते हैं अमावस्या पर पितरों के तर्पण के महत्व के बारे में विस्तार से.

पौराणिक कथा

मत्स्य पुराण के अनुसार, प्राचीन काल में पितरों का एक अत्यंत श्रेष्ठ समूह था, जिन्हें ‘अग्निष्वात्त’ कहा जाता था. उनकी ‘अच्छोदा’ नाम की एक मानस पुत्री थी. मानस पुत्री का अर्थ है—वह जो शरीर से नहीं, बल्कि मन के संकल्प से उत्पन्न हुई हो. अच्छोदा बहुत ही रूपवती, गुणवान और तपस्विनी थी. उसने हजारों वर्षों तक कठोर तपस्या की.

अच्छोदा की तपस्या से प्रसन्न होकर एक दिन सभी पितर उसे वरदान देने के लिए प्रकट हुए. उन दिव्य पितरों के समूह में ‘अमावसु’ नाम के एक पितर भी थे, जो अत्यंत शांत, तेजस्वी और उच्च कोटि के योगी थे. वरदान मांगते समय अच्छोदा की दृष्टि जैसे ही अमावसु पर पड़ी, वह उनके अलौकिक सौंदर्य और तेज पर मोहित हो गई. उसने पितरों से वरदान में अमावसु को अपने पति के रूप में मांग लिया.

अच्छोदा की यह मांग सुनकर सभी पितर हैरान रह गए, क्योंकि वह उनकी मानस पुत्री थी और इस नाते अमावसु उसके पिता के समान थे. पितरों ने उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ी रही. तब अमावसु ने धैर्य और मर्यादा का परिचय दिया. उन्होंने विनम्रता लेकिन दृढ़ता के साथ अच्छोदा के प्रस्ताव को ठुकरा दिया और कहा, “मैं अपने पितृ धर्म और ब्रह्मचर्य की मर्यादा को कभी नहीं तोड़ सकता.” उन्होंने अच्छोदा को समझाया कि वासना के वश में होकर वह अपने पुण्य नष्ट कर रही है.

कैसे पड़ा ‘अमावस्या’ नाम?

अमावसु के इस महान आत्म-संयम और चरित्र की पवित्रता को देखकर सभी देवता और पितर अत्यंत प्रसन्न हुए. अमावसु ने न केवल अपनी मर्यादा की रक्षा की, बल्कि अच्छोदा को भी पतन से बचा लिया. उनकी इस दृढ़ता को अमर बनाने के लिए पितरों ने उस विशेष दिन को अमावसु के नाम पर ‘अमावस्या’ नाम दिया. उन्होंने घोषणा की, “आज से यह तिथि अमावसु के नाम से जानी जाएगी, और जो भी व्यक्ति इस दिन अपने पितरों की तृप्ति के लिए श्रद्धा से तर्पण करेगा, उसे पूरे महीने की पूजा का फल प्राप्त होगा.”

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Neha Kumari

लेखक के बारे में

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प्रभात खबर डिजिटल के जरिए मैंने पत्रकारिता की दुनिया में अपना पहला कदम रखा है. यहां मैं धर्म और राशिफल बीट पर बतौर जूनियर कंटेंट राइटर के तौर पर काम कर रही हूं. इसके अलावा मुझे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से जुड़े विषयों पर लिखने में रुचि है.

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