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आज भी है प्रचलित है राधा-कृष्ण की होली खेलने की प्रथा

By Kaushal Kishor
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होली का त्योहार हो और राधा रानी के गांव बरसाना धाम की लट्ठमार होली का जिक्र ना हो, यह कैसे हो सकता है. होली के नजदीक आते ही वृंदावन और बरसाना धाम अपने प्रेम रंग में पूरी तरह रंग जाता है. देश-विदेश से लोग यहां की होली का आनंद लेने के लिए आते हैं. लड्डू होली के दो दिन बाद यहां लट्ठमार होली खेली जाती है. लट्ठमार होली की कहानी काफी दिलचस्प है.

पौराणिक कथाओं के अनुसार, लट्ठमार होली खेलने की शुरुआत भगवान कृष्ण और राधा के समय हुई. माना जाता है कि भगवान कृष्ण अपने सखाओं के साथ होली खेलने बरसाने पहुंच जाया करते थे. कृष्ण यहां अपने सखाओं के साथ मिलकर राधा और उनकी सखियों से ठिठोली करते. हंसी-ठिठोली का जवाब राधा और उनकी सखियां ग्वालों पर डंडे बरसा कर देती. इससे बचने के लिए कृष्ण और उनके सखा ढाल का प्रयोग करते थे. यह प्रेमपूर्वक खेला जाता था और धीरे-धीरे यह परंपरा बन गयी.

लट्ठमार में कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाता है, जिसका खास ख्याल रखा जाता है. मथुरा में फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन नंदगांव के लोग सज-धज कर बरसाना जाकर वहां की महिलाओं के साथ लट्ठमार होली खेलते हैं. वहीं, अगले दिन दशमी के दिन बरसाना के पुरुष नंदगांव जाते हैं और वहां की महिलाओं के साथ लट्ठमार होली खेलते हैं.

लट्ठमार होली में खास बात यह रहती है कि दोनों जगह की महिलाएं अपने गांव के पुरुषों पर लाठियां नहीं बरसाती हैं. रंगों से जरूर आपस में वो खेलते हैं. इस लट्ठमार होली को देखने के लिए कई दिनों पहले से देश-विदेशों से लोग आकर मथुरा वृंदावन में जमा होते हैं.

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