Premanand Ji Maharaj: शादी और पार्टियों के खाने को लेकर प्रेमानंद महाराज ने कही ये बात, जूठा खाने से तो…
Published by : Neha Kumari Updated At : 06 Jan 2026 11:49 AM
प्रेमानंद जी महाराज
Premanand Ji Maharaj: शादियों और पार्टियों में आज के समय में कतार में लगकर स्वयं प्लेट में परोसकर खाना खाने का चलन बढ़ गया है. आइए जानते हैं नए जमाने के साथ आई इस परंपरा पर प्रेमानंद जी महाराज का क्या कहना है.
Premanand Ji Maharaj: आज के समय में शादियों या पार्टियों में ज्यादातर जगहों पर आप देखेंगे कि भोजन के लिए कतार में अलग-अलग व्यंजन रखे जाते हैं. मेहमान खुद अपनी प्लेट उठाते हैं और स्वयं खाना परोसकर खाते हैं. जब खाना खत्म हो जाता है, तो वे दोबारा उसी तरह जाकर खाना ले लेते हैं. यह भारत की प्राचीन मेहमाननवाजी की परंपरा से बिल्कुल अलग है.पहले के समय में जब कोई अनुष्ठान, पार्टी या शादी होती थी, तो मेहमानों के हाथ धुलवाकर उन्हें स्वच्छ स्थान पर बैठाया जाता था. इसके बाद उन्हें आदरपूर्वक खाना परोसा जाता था. धीरे-धीरे यह परंपरा अब कम होती जा रही है. प्रेमानंद जी महाराज ने इसी विषय पर अपने विचार प्रकट किए हैं.
स्वयं भोजन परोसने की परंपरा
प्रेमानंद जी महाराज का कहना है कि आज के समय में स्वयं खाना परोसकर खाने की जो परंपरा चलन में आई है, वह गलत है. उनके अनुसार शादियों और पार्टियों में लोग शराब और मांस का सेवन करते हैं और फिर बार-बार जूठे हाथों से खाने के व्यंजनों को छूते हैं, जिससे पूरा भोजन जूठा हो जाता है. इससे भोजन की पवित्रता समाप्त हो जाती है. उन्होंने इसे कलियुग का प्रभाव बताया है.
पत्तल में भोजन
प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार भारत की प्राचीन परंपरा, जिसमें मेहमानों के हाथ-पैर धुलवाकर उन्हें आदरपूर्वक बैठाया जाता था और पत्तल में भोजन कराया जाता था, वह सबसे उत्तम थी. पत्तल का उपयोग केवल एक बार किया जाता था, जिससे स्वच्छता बनी रहती थी और सेहत के लिए भी यह लाभकारी था.
उन्होंने बताया कि मेहमानों को तिलक लगाकर भोजन परोसा जाता था, जिससे घर में पवित्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता था. ऐसी परंपराएं न केवल संस्कृति को दर्शाती थीं, बल्कि आपसी सम्मान और शुद्धता का भी प्रतीक थीं.
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