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Premanand Ji Maharaj Tips : तीर्थ यात्रा पर प्रेमानंद जी के 5 नियम, मथुरा–वृंदावन दर्शन से पहले ध्यान रखें ये बातें

Updated at : 14 Jul 2025 4:22 PM (IST)
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Premanand Ji Maharaj

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Premanand Ji Maharaj Tips: श्री प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार यदि तीर्थ यात्रा में सत्य, मौन, भक्ति, सेवा और संयम को अपनाया जाए, तो यह यात्रा केवल एक दर्शन नहीं बल्कि जीवन परिवर्तन का माध्यम बन जाती है.

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Premanand Ji Maharaj Tips : श्री प्रेमानंद जी महाराज, जिनके वाणी और विचार आज के युग में भी भक्ति और वैराग्य का अमूल्य स्रोत हैं, वे तीर्थ यात्रा को केवल एक भ्रमण नहीं बल्कि आत्मिक साधना और आत्मशुद्धि का पथ मानते हैं. उनके अनुसार मथुरा-वृंदावन जैसे दिव्य धामों की यात्रा से पहले कुछ नियमों और मर्यादाओं का पालन अति आवश्यक होता है. यहां हम जानेंगे प्रेमानंद जी के बताए तीर्थ यात्रा के प्रमुख सिद्धांत, जिन्हें अपनाकर कोई भी साधक अपनी यात्रा को सफल और पुण्यदायक बना सकता है:-

– तीर्थ को पर्यटन न समझें, इसे साधना का माध्यम बनाएं

महाराज जी कहते हैं कि वृंदावन या मथुरा की यात्रा एक मनोवैज्ञानिक टूर नहीं, बल्कि आत्मा की यात्रा होनी चाहिए. वहां जाकर केवल फोटो खिंचवाना, खरीदारी करना या समय बिताना यात्रा का उद्देश्य नहीं होना चाहिए. हर कदम पर नाम-स्मरण और मन में भगवत चेतना होनी चाहिए.

– भोजन सात्त्विक और सीमित रखें

तीर्थ यात्रा में महाराज जी ने भोग-विलास और स्वादिष्ट भोजन से दूर रहने का निर्देश दिया है. प्रेम भाव से बना सात्त्विक भोजन ग्रहण करें, अधिक न खाएं और व्रत का पालन करें. इससे शरीर हल्का और मन निर्मल रहेगा.

– मौन और जप को यात्रा का आधार बनाएं

वृंदावन जैसी भूमि में मौन का पालन, अधिक से अधिक “राधे-राधे” या “हरे राम” नाम जप करना ही वास्तविक यात्रा है. महाराज जी कहते हैं – “बोलने से पुण्य नहीं बढ़ता, चुप रहकर राधे नाम लो तो ठाकुर खुद सुनते हैं”

– भक्ति से ही दर्शन संभव है, भीड़ में खोकर नहीं

महाराज जी समझाते हैं कि मंदिर में घंटों लाइन में लगना ठीक है, लेकिन जब मन राधे नाम से जुड़ जाए, तो बिना भीड़ के भी ठाकुर दर्शन देते हैं. बाहरी दिखावे से ज़्यादा, भीतर की सच्ची पुकार मायने रखती है.

– हर जीव में राधा-रमण का अंश समझो

तीर्थ यात्रा का सबसे बड़ा नियम है – विनम्रता और सेवा भाव. वृंदावन में हर गाय, हर वृक्ष और हर साधक में राधा रानी का अंश मानो। किसी का अपमान न करो, और सेवा का भाव लेकर हर स्थान पर शीश नवाओ.

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श्री प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार यदि तीर्थ यात्रा में सत्य, मौन, भक्ति, सेवा और संयम को अपनाया जाए, तो यह यात्रा केवल एक दर्शन नहीं बल्कि जीवन परिवर्तन का माध्यम बन जाती है. मथुरा-वृंदावन के दर्शन तभी सार्थक होते हैं जब हृदय में राधे नाम गूंजे और व्यवहार में प्रेम छलके.

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Ashi Goyal

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By Ashi Goyal

Ashi Goyal is a contributor at Prabhat Khabar.

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