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Pitru Paksha 2020: पितृपक्ष जमीनी जुड़ाव का है उत्सव, आप भी जानिए नरेन की गाथा

By Prabhat khabar Digital
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Pitru Paksha 2020, Pind Daan ki Samagri, Pind Daan Vidhi: आज से पितृपक्ष शुरू हो गया है. आज पितृपक्ष का पहला दिन है. पितृपक्ष के दौरान हर साल मुझे नरेन याद आता है. नरेन यानि ‘अरण्य गाथा’ का नायक. दूरस्थ ग्रामीण इलाके का वामपंथी नायक. पंद्रह दिनों से अपने घर से गायब है. पटना से कॉमरेड घोष उसे ढूंढ़ते हुए गया आये हैं. नाउ हड़ पेटा को ढूंढ़ने घर भेजा, तो पता लगा कि वह तो गया ही गया है. बालू तौलने बालू तौलने का मतलब? स्वर्गारोहण... क्रोधित पत्नी ने यही बताया. हड़ पेटा गया आया , विदौट टिकट. ढूंढ़ लिया एक पंडा जी की मदद से.

नरेन की पेशी हुई काॅमरेड घोष के सामने. घोष बाबू ने आरोप लगाया, ‘तुम जुलूस में पटना जाता है, तो पहली हाजरी हनुमान मंदिर में लगाता है?’ नरेन ने आरोप को सही माना. कारण बताते हुए कहा, ‘हाथ जोड़ कर वहां खड़ा होता हूं, तो लगता है मृत पिता आगे आकर खड़े हो गये हैं.’.. दरअसल, वामपंथी पिता मरते वक्त यहीं आये थे. पटना में टीबी का इलाज कराते हुए, धर्मशाले में टिके प्राणी की अंतिम इच्छा यही थी. घोष बाबू ने अगला आरोप लगाया, ‘तुम यहां दादी का पिंडदान कर रहे हो?’ नरेन ने सपाट लहजे में कहा ,‘हां, कर रहा हूं’ घोष बाबू ने पिनक कर कहा, ‘पिंडदान यानी धरम?’ नरेन ने हाथ जोड़कर विश्लेषण किया, ‘धर्म नहीं,संस्कृति ! कॉमरेड ! दादी ने नौ बरस देवी थान अगोरा, तो मैं पैदा हुआ. क्या मैं पंद्रह दिनों के लिए यह कामना नहीं कर सकता, कि दादी हमारे बीच फिर आ जाओ.’

घोष बाबू ने निर्णय सुनाया, ‘मैं तुम्हें पार्टी से निकालता हूं.’ नरेन ने निःश्वांस भर कर अगले जीवन का पथ निर्धारण किया, ‘ठीक है, मैं अपनी विचारधारा के साथ जमीन के अंदर चींटियों की तरह जी लूंगा. अपने बीच पितरों की उपस्थिति की कामना. उनका स्मरण. उनसे जुड़ने की लालसा. उनके प्रति आभार प्रदर्शित करने का पर्व. मूल में तो यही सोच है. बाकी कालक्रम में जोड़े गये कर्मकांड! लोग देश-विदेश से लौट कर आते हैं, पितरों के इस पक्ष में. सुख और संतोष देता है भारतीयता के मूल विचार से जुड़ने की ललक. लगता है आदमखोर विकास के त्रासद माहौल में अब भी शेष है जोड़ने और जुड़ने की संस्कृति ! संस्कृति के वाहक हैं कुछ पर्व,उत्सव और मेले.

समुदाय के अस्तित्व को अक्षुण्ण बनाये रखने की शक्ति है उनमें. आज के यांत्रिक और उपभोक्तावादी समय में किसी के पास समय नहीं. सिर्फ अकेले जी लेने की आदत है सबमें. कभी कभार बाजार के द्वारा गढ़े गये वैलेंटाइन,मदर्स डे,फादर्स डे को गिफ्ट और संदेश भेजकर निबटा लेने का संस्कार बच गया है. ऐसे वक्त में अगर पितृपक्ष जैसे अवसर जीवित रह गये, तो लगता है,कोरोना काल में जैसे आयुर्वेदिक दवाओं का महत्व युवाओं के द्वारा स्वीकार लिया गया,वैसे ही उनमें पुरखों की बतायी प्राकृतिक जिंदगी से लगाव भी बढ़ेगा,समुदाय बोध भी गहरायेगा.

तब निश्चय ही महसूस होगा, अगली पीढ़ी को भी कि पितृपक्ष जमीनी जुड़ाव का उत्सव है. हां,उत्सव को मनाने का ढंग अलग-अलग हो सकता है. लेकिन, मूल भाव को बरकरार रखना आवश्यक है. वस्तुतः इसीलिए पिछले साल मैंने मां का पिंडदान किया. imotnul. com पर कथा संग्रह डाल कर समर्पण के पृष्ठ पर लिखा -‘मां को लेखकीय पिंडदान स्वरूप समर्पित !’

News Posted by: Radheshyam kushwaha

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