Jivitputrika Vrat 2020 Date: आज है जिवितपुत्रिका व्रत, जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत नियम और इस पर्व का महत्व...

Updated at : 10 Sep 2020 6:30 AM (IST)
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Jivitputrika Vrat 2020 Date: आज है जिवितपुत्रिका व्रत, जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत नियम और इस पर्व का महत्व...

Jivitputrika Vrat 2020 Date, Jitiya Puja 2020, Jivitputrika Vrat Katha: जिवितपुत्रिका व्रत इस बार 10 सितंबर 2020 को पड़ रहा है. यह जिवितपुत्र बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में मनाए जाने वाला एक लोकप्रिय पर्व है. वहीं, नेपाल में जीवित्पुत्रिका व्रत, जितिया उपवास के रूप में लोकप्रिय है. सनातन धर्मावलंबियों में इस व्रत का खास महत्व है. वंश वृद्धि व संतान की लंबी आयु के लिए महिलाएं जिउतिया का निर्जला व्रत रखती हैं.

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Jivitputrika Vrat 2020 Date, Jitiya Puja 2020, Jivitputrika Vrat Katha: जिवितपुत्रिका व्रत इस बार 10 सितंबर 2020 यानि आज है. यह जिवितपुत्र बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में मनाए जाने वाला एक लोकप्रिय पर्व है. वहीं, नेपाल में जीवित्पुत्रिका व्रत, जितिया उपवास के रूप में लोकप्रिय है. सनातन धर्मावलंबियों में इस व्रत का खास महत्व है. वंश वृद्धि व संतान की लंबी आयु के लिए महिलाएं जिउतिया का निर्जला व्रत रखती हैं. इस दिन माताएं अपनी सन्तानों की सुरक्षा व स्वास्थ्य के लिये पूरे दिन तथा पूरी रात 24 घंटे तक निर्जला उपवास करती हैं. हिन्दु चन्द्र कैलेण्डर के अनुसार, आश्विन माह की कृष्ण पक्ष सप्तमी से नवमी तक जीवित्पुत्रिका व्रत किया जाता है. आइए जानते है तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत नियम और इस पर्व का महत्व…

तिथि और शुभ मुहूर्त

इस बार आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि 9 सितंबर की रात में 9 बजकर 46 मिनट पर प्रारंभ होगा और 10 सितंबर की रात 10 बजकर 47 मिनट तक रहेगा. 10 सितंबर को अष्टमी में चंद्रोदय का अभाव है, इसी दिन जिउतिया पर्व मनाया जाएगा. व्रत से एक दिन पहले सप्तमी 9 सितंबर की रात महिलाएं नहाय-खाए करेंगी. गंगा सहित अन्य पवित्र नदियों में स्नान करने के बाद मड़ुआ रोटी, नोनी का साग, कंदा, झिमनी आदि का सेवन करेंगी. व्रती स्नान- भोजन के बाद पितरों की पूजा भी करेंगी. नहाय-खाय की सभी प्रक्रिया 9 सितंबर की रात 9 बजकर 47 मिनट से पहले ही करना होगा. क्योंकि 9 बजकर 47 मिनट के बाद अष्टमी तिथि शुरू हो जाएगी. जिउतिया व्रत का पारण करने का शुभ समय 11 सितम्बर की सुबह सूर्योदय से लेकर दोपहर 12 बजे तक रहेगा. व्रती महिलाओं को जिउतिया व्रत के अगले दिन 11 सितंबर को 12 बजे से पहले पारण करना होगा.

जीवित्पुत्रिका व्रत पूजा विधि

नहाय खाय (Nahai-khai)

इस दिन जीवित्पुत्रिका व्रत का पहला दिन कहलाता है, इस दिन से व्रत शुरू होता हैं. इस दिन महिलायें नहाने के बाद एक बार भोजन करती हैं. इस व्रत को करते समय केवल सूर्योदय से पहले ही खाया-पिया जाता है. सूर्योदय के बाद आपको कुछ भी खाने-पीने की सख्त मनाही होती है. इस व्रत से पहले केवल मीठा भोजन ही किया जाता है तीखा भोजन करना अच्छा नहीं होता. इस दिन कई लोग बहुत सी चीजे खाते हैं, लेकिन खासतौर पर इस दिन झोर भात, नोनी का साग एवम मडुआ की रोटी अथवा मडुआ की रोटी दिन के पहले भोजन में ली जाती हैं. फिर दिन भर कुछ नहीं खाती.

खर जितिया

यह जीवित्पुत्रिका व्रत का दूसरा दिन होता हैं, इस दिन महिलायें निर्जला व्रत करती हैं. यह दिन विशेष होता हैं.

पारण विधि

यह जीवित्पुत्रिका व्रत का अंतिम दिन होता हैं. जिउतिया व्रत में कुछ भी खाया या पिया नहीं जाता, इसलिए यह निर्जला व्रत होता है. व्रत का पारण अगले दिन प्रातः काल किया जाता है, जिसके बाद आप कैसा भी भोजन कर सकते है.

जीवित्पुत्रिका व्रत महत्व

एक समय की बात है, एक जंगल में चील और लोमड़ी घूम रहे थे, तभी उन्होंने मनुष्य जाति को इस व्रत को विधि पूर्वक करते देखा एवम कथा सुनी. उस समय चील ने इस व्रत को बहुत ही श्रद्धा के साथ ध्यानपूर्वक देखा, वही लोमड़ी का ध्यान इस ओर बहुत कम था. चील के संतानों एवम उनकी संतानों को कभी कोई हानि नहीं पहुंची, लेकिन लोमड़ी की संतान जीवित नहीं बची. इस प्रकार इस व्रत का महत्व बहुत अधिक बताया जाता हैं.

जीवित्पुत्रिका व्रत कथा

जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा महाभारत काल से जुड़ी हुई हैं. महा भारत युद्ध के बाद अपने पिता की मृत्यु के बाद अश्व्थामा बहुत ही नाराज था और उसके अन्दर बदले की आग तीव्र थी, जिस कारण उसने पांडवो के शिविर में घुस कर सोते हुए पांच लोगो को पांडव समझकर मार डाला था, लेकिन वे सभी द्रोपदी की पांच संताने थी. उसके इस अपराध के कारण उसे अर्जुन ने बंदी बना लिया और उसकी दिव्य मणि छीन ली, जिसके फलस्वरूप अश्व्थामा ने उत्तरा की अजन्मी संतान को गर्भ में मारने के लिए ब्रह्मास्त्र का उपयोग किया, जिसे निष्फल करना नामुमकिन था. उत्तरा की संतान का जन्म लेना आवश्यक थी, जिस कारण भगवान श्री कृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को देकर उसको गर्भ में ही पुनः जीवित किया. गर्भ में मरकर जीवित होने के कारण उसका नाम जीवित्पुत्रिका पड़ा और आगे जाकर यही राजा परीक्षित बना. तब ही से इस व्रत को किया जाता हैं.

News posted by : Radheshyam kushwaha

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