Easter Sunday 2024 : 31 मार्च को मनाया जाएगा ईस्टर का त्योहार, जानें कैसे तय होती है ईस्टर की तिथि और क्या है इतिहास

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easter sunday 2024

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गुड फ्राइडे के बाद ईस्टर का त्योहार मनाया जाता है. यह मृत्यु पर जीवन के विजय का त्योहार है. इस त्योहार की तिथि वसंत पूर्णिमा के बाद निर्धारित की जाती है.

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Easter Sunday 2024 : ईस्टर संडे इस वर्ष 31 मार्च को मनाया जाएगा. यह त्योहार ईसा मसीह के पुनर्जीवित होने की खुशी में मनाया जाता है. गुड फ्राइडे को प्रभु यीशु मसीह क्रूस पर टांग दिए गए थे, जिससे उनकी मृत्यु हो गई थी, लेकिन ईस्टर संडे को वे पुनर्जीवित हुए. ईस्टर की कोई तय तिथि नहीं है, तो यहां हम आपको बताएंगे कि ईस्टर पर्व का इतिहास क्या है और इस त्योहार को मनाने की तिथि कैसे निर्धारित की जाती है.

क्या है ईस्टर का त्योहार

संत अलबर्ट काॅलेज के फादर प्रफुल्ल बाडा ने बताया कि ईस्टर का त्योहार ईसा मसीह से पहले यहूदी समाज के लोग मनाते थे. वे इसे ‘सन ऑफ गॉड’ की आराधना के दिवस के रूप में मनाते थे. मिस्र में यहूदियों पर काफी अत्याचार होता था, जिससे बचने के लिए वे वहां से भागे तो रास्ते में लालसागर पड़ गया, तब उन्होंने अपने ‘सन ऑफ गॉड’ को याद दिया, तो उन्होंने लालसागर पर डंडा मारने को कहा, जिससे वहां जमीन दिखने लगी और वे वहां से बचकर भाग निकले. इसे वे पार लगना कहते हैं, यानी गुलामी से स्वतंत्रता की ओर जाना. ईसा मसीह भी यहूदियों के इन रिवाजों को मानते थे. लेकिन जब ईसा मसीह को गुड फ्राइडे के दिन क्रूस पर चढ़ाया गया और उनकी मौत हुई, उसके बाद वे रविवार के दिन पुनर्जीवित हो गए. उनके मृत्यु से जीवन की ओर जाने की खुशी में ईस्टर का त्योहार ईसाई मनाते हैं. ईसाई धर्मावलंबी मौत में विश्वास नहीं करते. उनका मानना है कि यह शरीर तो मिट्टी से बना है और एक दिन नष्ट होगा, किंतु आत्मा अजर-अमर है. ईसा मसीह ने मौत को गले लगाकर जीवन का रास्ता तय किया. यह मृत्यु पर विजय पाने का त्योहार है, जिसे ईस्टर के रूप में मनाया जाता है.

कब मनाया जाएगा ईस्टर, यह कैसे तय होता है?

यीशु मसीह के पुनर्जीवित होने के त्योहार ईस्टर की तिथि वैज्ञानिक तरीके से निर्धारित की जाती है. वसंत ऋतु के इक्वीनॉक्स यानी 21 मार्च, जिस दिन रात और दिन बराबर होते हैं, उसके बाद जो पूर्णिमा तिथि आती है, उसके बाद आने वाले रविवार को ईस्टर मनाया जाता है. हालांकि 8वीं शताब्दी तक ईस्टर को निर्धारित करने के लिए कोई नियम नहीं थे, लेकिन बाद में यही विधि सर्वमान्य हो गई.

क्या पास्का और ईस्टर का त्योहार एक ही है?

पास्का या ईस्टर एक ही त्योहार को कहा जाता है. पास्का ग्रीक भाषा का शब्द है. ईस्टर को मृत्यु पर जीवन की विजय का पर्व माना जाता है. पास्का शब्द का प्रयोग ईस्टर ब्रेड या केक में इस्तेमाल होने वाले अंडे के लिए भी किया जाता है. पास्का यानी पार लगना, यह मृत्यु से जीवन की ओर जाने का त्योहार है.

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रजनीश आनंद

लेखक के बारे में

By रजनीश आनंद

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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संत अलबर्ट काॅलेज के फादर प्रफुल्ल बाडा ने बताया कि ईस्टर का त्योहार ईसा मसीह से पहले यहूदी समाज के लोग मनाते थे. वे इसे ‘सन ऑफ गॉड’ की आराधना के दिवस के रूप में मनाते थे. मिस्र में यहूदियों पर काफी अत्याचार होता था, जिससे बचने के लिए वे वहां से भागे तो रास्ते में लालसागर पड़ गया, तब उन्होंने अपने ‘सन ऑफ गॉड’ को याद दिया, तो उन्होंने लालसागर पर डंडा मारने को कहा, जिससे वहां जमीन दिखने लगी और वे वहां से बचकर भाग निकले. इसे वे पार लगना कहते हैं, यानी गुलामी से स्वतंत्रता की ओर जाना. ईसा मसीह भी यहूदियों के इन रिवाजों को मानते थे. लेकिन जब ईसा मसीह को गुड फ्राइडे के दिन क्रूस पर चढ़ाया गया और उनकी मौत हुई, उसके बाद वे रविवार के दिन पुनर्जीवित हो गए. उनके मृत्यु से जीवन की ओर जाने की खुशी में ईस्टर का त्योहार ईसाई मनाते हैं. ईसाई धर्मावलंबी मौत में विश्वास नहीं करते. उनका मानना है कि यह शरीर तो मिट्टी से बना है और एक दिन नष्ट होगा, किंतु आत्मा अजर-अमर है. ईसा मसीह ने मौत को गले लगाकर जीवन का रास्ता तय किया. यह मृत्यु पर विजय पाने का त्योहार है, जिसे ईस्टर के रूप में मनाया जाता है.