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कैसे हुई होलिका दहन की शुरुआत? जानें पौराणिक कथाओं में छिपा रहस्य

Updated at : 01 Mar 2026 1:50 PM (IST)
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Holika Dahan Mythological Story

होलिका दहन

Holika Dahan 2026: क्या आपने कभी सोचा है कि होलिका दहन की परंपरा की शुरुआत कैसे हुई और हर साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को ही यह पर्व क्यों मनाया जाता है? अगर हां, तो यह आर्टिकल आपके लिए है. आइए, एक पौराणिक कथा के माध्यम से आसान भाषा में इस पर्व के पीछे छिपे रहस्यों के बारे में जानते हैं.

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Holika Dahan 2026: होलिका दहन हर साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को किया जाता है. यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है. साल 2026 में होलिका दहन 2 मार्च को किया जाएगा. इस दिन शाम के समय लोग लकड़ियों और गोबर से बने ढेर को जलाते हैं और उसकी परिक्रमा करते हैं. परिक्रमा के दौरान श्रद्धालु अग्नि में नई फसल और पकवान अर्पित करते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं. आइए जानते हैं इस पर्व की शुरुआत से जुड़ी एक प्रचलित कथा.

क्यों किया जाता है होलिका दहन?

ब्रह्मा जी का वरदान और हिरण्यकश्यप का अहंकार

पौराणिक कथाओं के अनुसार, सतयुग में हिरण्यकश्यप नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली असुर राजा था. उसने वर्षों तक ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की. तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी उसके सामने प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा. तब हिरण्यकश्यप ने अमर होने का वरदान मांगा, लेकिन ब्रह्मा जी ने बताया कि यह संभव नहीं है.

इसके बाद हिरण्यकश्यप ने चतुराई से ऐसा वरदान मांगा कि उसे न कोई मनुष्य मार सके, न पशु; न दिन में, न रात में; न घर के अंदर, न बाहर. ब्रह्मा जी ने उसे यह वरदान दे दिया. वरदान प्राप्त करने के बाद हिरण्यकश्यप का अहंकार बढ़ गया. वह स्वयं को भगवान मानने लगा और अपने राज्य के लोगों को आदेश दिया कि वे किसी देवता की पूजा न करें, केवल उसकी ही पूजा करें. जो उसकी बात नहीं मानता, उसे कठोर दंड दिया जाता था.

प्रह्लाद की अटूट भक्ति

हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था. उसने अपने पिता को भगवान मानने से इनकार कर दिया और भगवान विष्णु की भक्ति जारी रखी. इससे क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को मारने के कई प्रयास किए, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से वह हर बार सुरक्षित बच गया.

होलिका का अंत और परंपरा की शुरुआत

अंत में हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका की सहायता ली. होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी. वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई. लेकिन चमत्कार हुआ — प्रह्लाद भगवान विष्णु का नाम जपते रहे और सुरक्षित बच गए, जबकि बुरे इरादे के कारण होलिका का वरदान निष्फल हो गया और वह जलकर राख हो गई. मान्यता है कि यह घटना फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को हुई थी. तभी से इस दिन को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है.

क्या करें होलिका दहन के दिन?

अग्नि में अर्पित करें ये चीजें: अग्नि में गाय के गोबर के उपले, गेहूं की बालियां, नारियल और अक्षत अर्पित करना शुभ माना जाता है.

परिक्रमा: अग्नि की 3 या 7 बार परिक्रमा करने से घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है.

राख का तिलक: अगले दिन सुबह होलिका की राख माथे पर लगाने से स्वास्थ्य और समृद्धि प्राप्त होने की मान्यता है.

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Neha Kumari

लेखक के बारे में

By Neha Kumari

प्रभात खबर डिजिटल के जरिए मैंने पत्रकारिता की दुनिया में अपना पहला कदम रखा है. यहां मैं धर्म और राशिफल बीट पर बतौर जूनियर कंटेंट राइटर के तौर पर काम कर रही हूं. इसके अलावा मुझे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से जुड़े विषयों पर लिखने में रुचि है.

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