दशा माता व्रत कथा पढ़ने से बदलती है किस्मत और दूर होती दरिद्रता

Updated at : 13 Mar 2026 8:56 AM (IST)
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Dasha Mata Vrat Katha

दशा माता व्रत कथा

Dasha Mata Vrat Katha: दशा माता व्रत के दिन कथा पाठ करना बेहद शुभ माना जाता है. इस कथा में राजा नल और दमयंती की कहानी के माध्यम से दशा माता की कृपा और व्रत के महत्व को बताया गया है.

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Dasha Mata Vrat Katha: हिंदू धर्म में कई ऐसे व्रत और पूजा-पर्व हैं जो परिवार की सुख-समृद्धि और जीवन की कठिनाइयों को दूर करने के लिए किए जाते हैं. इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण व्रत दशा माता व्रत है. यह व्रत विशेष रूप से सुहागिन महिलाएं अपने परिवार की खुशहाली और घर की आर्थिक स्थिति बेहतर करने के लिए रखती हैं. मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से दशा माता की पूजा करने से जीवन की विपरीत परिस्थितियां दूर होती हैं और घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है. इस दिन पीपल के पेड़ की पूजा की जाती है और डोरा बांधकर माता से आशीर्वाद मांगा जाता है.

कब रखा जाएगा दशा माता व्रत 2026

पंचांग के अनुसार चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को दशा माता का व्रत रखा जाता है. साल 2026 में यह व्रत 13 मार्च, शुक्रवार को रखा जा रहा है. दशमी तिथि की शुरुआत 13 मार्च 2026 को सुबह 6 बजकर 28 मिनट से होगी और इसका समापन 14 मार्च 2026 को सुबह 8 बजकर 10 मिनट पर होगा. इस दिन महिलाएं सुबह स्नान कर साफ-सुथरे वस्त्र पहनकर पीपल के पेड़ की पूजा करती हैं और दशा माता की कथा का पाठ करती हैं.

दशा माता व्रत का धार्मिक महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दशा माता का व्रत घर की बिगड़ी दशा को सुधारने वाला माना जाता है.

इस व्रत को करने से

  • इस व्रत को करने से
  • घर में सुख-समृद्धि आती है
  • आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं
  • परिवार में शांति बनी रहती है
  • नकारात्मक परिस्थितियों से राहत मिलती है

इसी कारण से कई क्षेत्रों में इसे “घर की दशा सुधारने वाला व्रत” भी कहा जाता है.

दशा माता व्रत कथा: राजा नल और दमयंती की कहानी

पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में राजा नल नाम के एक राजा थे और उनकी पत्नी का नाम दमयंती था. उनके राज्य में सभी लोग सुख-शांति से रहते थे और राज्य समृद्ध था. एक दिन एक ब्राह्मणी रानी के पास आई. उसके गले में पीले रंग का एक डोरा बंधा हुआ था. रानी ने उससे उस डोरे के बारे में पूछा तो ब्राह्मणी ने बताया कि यह दशा माता का पवित्र डोरा है. उसने कहा कि इसे धारण करने से घर में सुख-संपत्ति और अन्न-धन की कभी कमी नहीं होती. यह सुनकर रानी ने भी वह डोरा अपने गले में पहन लिया.

राजा की भूल और देवी का प्रकोप

जब राजा नल ने रानी के गले में वह डोरा देखा तो उन्होंने पूछा कि यह क्या है. रानी ने उन्हें सारी बात बता दी. राजा ने कहा कि हमारे पास सब कुछ है, इसलिए इस डोरे की जरूरत नहीं है. उन्होंने रानी से उसे तोड़ने के लिए कहा, लेकिन रानी ने मना कर दिया. इसके बाद राजा ने क्रोधित होकर वह डोरा तोड़कर फेंक दिया. उसी रात राजा को स्वप्न में एक वृद्धा दिखाई दी, जो वास्तव में दशा माता थीं. उन्होंने राजा से कहा कि तुमने मेरा अपमान किया है, इसलिए अब तुम्हारे अच्छे दिन खत्म हो जाएंगे और बुरे दिन शुरू हो जाएंगे.

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कठिन समय की शुरुआत

इसके बाद धीरे-धीरे राजा का सारा धन और वैभव नष्ट होने लगा. राज्य में संकट आने लगे और राजा की स्थिति इतनी खराब हो गई कि उन्हें अपना राज्य छोड़ना पड़ा. राजा नल और रानी दमयंती अपने दोनों बच्चों के साथ दूसरे देश की ओर निकल पड़े. रास्ते में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. एक जगह उन्होंने अपने बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए एक भील राजा के पास छोड़ दिया और आगे बढ़ गए.

रास्ते में आई कई परीक्षाएं

आगे चलकर वे राजा के एक मित्र के घर पहुंचे. वहां उनका आदर-सत्कार हुआ. रात को जब वे सो रहे थे तो कमरे में टंगी एक खूंटी ने मित्र की पत्नी का कीमती हार निगल लिया. रानी ने यह दृश्य देख लिया, लेकिन सुबह लोगों को गलतफहमी न हो इसलिए वे रात में ही वहां से निकल गए. आगे चलकर राजा की बहन का गांव आया. बहन उनसे मिलने आई और खाने के लिए कांदा-रोटी लाई. राजा ने खाना खा लिया, लेकिन रानी ने अपनी रोटी जमीन में गाड़ दी.

भाग्य की कठिन परीक्षा

रास्ते में राजा ने नदी से मछलियां पकड़कर रानी से कहा कि उन्हें भूनकर खाना तैयार करे, जबकि वह पास के गांव से भोजन लाने गए. लेकिन दुर्भाग्य से चील ने राजा के हाथ से भोजन गिरा दिया. वहीं दूसरी ओर रानी द्वारा भुनी जा रही मछलियां भी जीवित होकर नदी में वापस चली गईं. दोनों ने एक-दूसरे को कुछ नहीं कहा, लेकिन मन ही मन दुखी हो गए.

अलग-अलग जीवन बिताने की मजबूरी

आखिरकार वे रानी के मायके के गांव पहुंचे. वहां राजा ने कहा कि रानी महल में दासी का काम कर ले और वह कहीं मजदूरी कर लेंगे. रानी ने महल में दासी का काम शुरू कर दिया और राजा ने तेली के यहां काम करना शुरू कर दिया.

पहचान का खुलासा

एक दिन जब सभी रानियां स्नान के बाद अपने बाल संवार रही थीं, तब राजमाता ने दासी यानी दमयंती के सिर में पद्म का निशान देखा. यह देखकर उन्हें अपनी बेटी की याद आ गई. तब दमयंती ने बताया कि वही उनकी बेटी है और दशा माता के प्रकोप के कारण उनकी यह स्थिति हुई है.

दशा माता की पूजा से बदली किस्मत

इसके बाद दमयंती ने श्रद्धा से दशा माता का व्रत और पूजा की. उन्होंने अपनी गलती के लिए देवी से क्षमा मांगी. माता की कृपा से धीरे-धीरे उनके जीवन की परिस्थितियां बदलने लगीं. राजा नल को फिर से सम्मान और सुख मिलने लगा. कुछ समय बाद दमयंती के पिता ने उन्हें धन-संपत्ति देकर विदा किया और वे दोनों अपने राज्य लौटने लगे.

खोया वैभव फिर से मिला

रास्ते में कई पुराने स्थानों से गुजरते हुए उन्हें एहसास हुआ कि उनके साथ जो भी घटनाएं हुई थीं, वे सब दशा माता के प्रकोप का परिणाम थीं. जब वे अपने राज्य पहुंचे तो लोगों ने उनका भव्य स्वागत किया. देवी की कृपा से उनका राज्य, वैभव और सम्मान सब कुछ फिर से वापस मिल गया.

दशा माता व्रत से मिलता है यह संदेश

  • दशा माता की यह कथा हमें यह सिखाती है कि
  • देवी-देवताओं का अपमान नहीं करना चाहिए
  • श्रद्धा और विश्वास से किया गया व्रत जीवन बदल सकता है
  • कठिन समय में धैर्य और विश्वास बनाए रखना जरूरी है
  • इसी कारण दशा माता के दिन पूजा के साथ इस कथा का पाठ करना बेहद शुभ माना जाता है.
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Shaurya Punj

लेखक के बारे में

By Shaurya Punj

मैंने डिजिटल मीडिया में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव हासिल किया है. पिछले 6 वर्षों से मैं विशेष रूप से धर्म और ज्योतिष विषयों पर सक्रिय रूप से लेखन कर रहा हूं. ये मेरे प्रमुख विषय हैं और इन्हीं पर किया गया काम मेरी पहचान बन चुका है. हस्तरेखा शास्त्र, राशियों के स्वभाव और उनके गुणों से जुड़ी सामग्री तैयार करने में मेरी निरंतर भागीदारी रही है. रांची के सेंट जेवियर्स कॉलेज से मास कम्युनिकेशन में स्नातक की डिग्री प्राप्त करने के बाद. इसके साथ साथ कंटेंट राइटिंग और मीडिया से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में काम करते हुए मेरी मजबूत पकड़ बनी. इसके अलावा, एंटरटेनमेंट, लाइफस्टाइल और शिक्षा जैसे विषयों पर भी मैंने गहराई से लेखन किया है, जिससे मेरी लेखन शैली संतुलित, भरोसेमंद और पाठक-केंद्रित बनी है.

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