अक्षय तृतीया: व्यवसाय करें या शादी, नहीं होगा कभी क्षय

Published at :21 Apr 2017 7:57 AM (IST)
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अक्षय तृतीया: व्यवसाय करें या शादी, नहीं होगा कभी क्षय

आसनसोल : वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया कहते हैं. सनातन धर्मावलंबियों का यह प्रधान पर्व है. मान्यता के अनुसार इस दिन किये स्नान, दान, होम, जप आदि जो भी करें, उनका फल अनंत होता है और ये सभी अक्षय हो जाते हैं. इसी प्रकार इस दिन किये हर बुरे […]

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आसनसोल : वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया कहते हैं. सनातन धर्मावलंबियों का यह प्रधान पर्व है. मान्यता के अनुसार इस दिन किये स्नान, दान, होम, जप आदि जो भी करें, उनका फल अनंत होता है और ये सभी अक्षय हो जाते हैं. इसी प्रकार इस दिन किये हर बुरे कर्म का फल भी अक्षय हो जाता है, जिसका कभी क्षय नहीं होता है.
इसी कारण इसे अक्षत तृतीया कहा जाता है. शास्त्रीय मान्यता के अनुसार इसी दिन से त्रेता युग की शुरूआत हुयी थी तथा इसी दिन नरनारायण भगवान परशुराम, हयग्रीव आदि का भी अवतार हुआ था. इस व्रत में मध्यान्ह व्यापिनी तृतीया तिथि ही ली जाती है. वाराणसी पंचांग के अनुसार वैशाख शुक्ल तृतीया तिथि का शुभारंभ 28 अप्रैल (शुक्रवार) को दोपहर एक बज कर आठ मिनट से शुरू होकर 29 अप्रैल (शनिवार) को प्रात: 10 बज कर 39 मिनट तक रहेगी. राष्ट्रीय पंचांग के अनुसार तृतीया तिथि का शुभारंभ शुक्रवार (28 अप्रैल) को 10 बज कर 28 मिनट से शुरू होकर शनिवार (29 अप्रैल) की सुबह छह बज कर 55 बजे तक होगी. इस प्रकार शास्त्रोक्त मध्यान्ह व्यापिनी तृतीया तिथि दोनों ही तरह से 28 अप्रैल को ही प्राप्त हो रही है. जिसके कारण अक्षय तृतीया उसी दिन मनायी जायेगी. हालांकि कहीं-कहीं उदया तिथि लेने के कारण कुछ लोग इसे 29 अप्रैल (शनिवार) को भी मनायेंगे.
अत्यंत शुभ संयोग में मनेगा अक्षय तृतीया
शुक्रवारस रोहिणी नक्षत्र, सौभाग्य योग, मध्यान्ह व्यापिनी अक्ष्य तृतीया 28 अप्रैल को ही प्राप्त हो रही है. जो इस व्रत के लिए उत्तम संयोग माना जायेगा. व्रती इस दिन किसी नदी या पवित्र जल में स्नान करने के पश्चात नियत स्थान पर भगवान विष्णु का यथाविधि शेड़षोपचार विधि से पूजन करें. इसमें भगवान विष्णु को पंचामृत से स्नान कराने के पश्चात उन्हें सुगंधित पुष्प, ऋतुफल आदि अर्पित करते हैं.
इस पूजन में श्रीनारायण के निमित्त गेहूं या जाै का सत्तू, जबकि भगवान परशुराम के लिए कोमल ककड़ी और दयग्रीव के निमित्त फुलाये चने अर्पित करने का विधान हैं. वैसे पूजा में गेहूं-चने के सत्तू के साथ ही दही, चावल, गóो एवं फलों का रस, दुग्ध निर्मित पदार्थ जैसे मावा, मिठाई आदि भी अर्पित किया जाता है. पूजन के उपरांत सामर्थ्यवान जल पूरित धर्मघट, अन्न, शीतल रस तथा ग्रीष्मपयोगी वस्तुओं का दान एवं पितृ तर्पण, ब्राम्हाण भोज आदि अवश्य कराना चाहिए.
गुप्तदान का है महत्व: इस तिथि को गुप्त दान का काफी महत्व है. इसके लिए श्रीहरि का पूजन करने के फस्चात कुष्मांड में भर कर सामथ्र्यानुसार द्रव्य आदि का दान करना श्रेयस्कर माना जाता है.
मान्यता के अनुसार इस दिन प्रयास करने, नये व्यवसाय आदि आरंभ करने, पनशाला की व्यवस्था करने को अति शुभ फलदायी माना जाता है. इस दिन किये किसी शुभ कार्य का फल चूंकि अनंत होता है, इसलिए समाज में इसी दिन विवाहादि शुभ कार्य संपन्न कराने को भी श्रेयस्कर समझा जाता है. विशेष रूप से विवाह संस्कार संपन्न कराने का समाज में काफी चलन है. मान्यता के अनुसार इस दिन विवाह के लिए कोई मुहुर्त्त भी नहीं देखना पड़ता, क्योंकि इसे अबूझ मुहुर्त्त माना गया है.
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