ध्यान के बाद की दृष्टि

Published at :15 Oct 2015 6:23 AM (IST)
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ध्यान के बाद की दृष्टि

अनेक वैज्ञानिक परीक्षणों से प्रमाणित हो चुका है कि औषधियों द्वारा जो उत्तेजना कम नहीं हुई, तनाव समाप्त नहीं हुआ, वह ध्यान के द्वारा समाप्त हो गया. ध्यान में व्यक्ति बहुत बदल जाता है. ध्यान की मानसिकता अनाग्रह की स्थिति में निर्मित हो सकती है. ध्यान अपने आप में विनम्रता का प्रयोग है, अनाग्रह का […]

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अनेक वैज्ञानिक परीक्षणों से प्रमाणित हो चुका है कि औषधियों द्वारा जो उत्तेजना कम नहीं हुई, तनाव समाप्त नहीं हुआ, वह ध्यान के द्वारा समाप्त हो गया. ध्यान में व्यक्ति बहुत बदल जाता है. ध्यान की मानसिकता अनाग्रह की स्थिति में निर्मित हो सकती है. ध्यान अपने आप में विनम्रता का प्रयोग है, अनाग्रह का प्रयोग है.
ध्यानकाल में अहं टूटता है, आग्रह छूटता है, विनम्रता बढ़ती है और अनाग्रह विकसित होता है. इसका कारण स्पष्ट है- ध्यान करनेवाला सत्य का साक्षात्कार करने की दिशा में आगे बढ़ता है. जहां सत्य साक्षात हो जाता है, वहां पर किसी भी बात का आग्रह हो ही नहीं सकता. आग्रह जितना भी होता है, परोक्षज्ञानी में ही होता है.
प्रत्यक्षज्ञानी सत्य के प्रति समर्पित होता है, सत्य उसे प्राप्त हो जाता है. ऐसी स्थिति में आग्रह को टिकने का स्थान ही नहीं मिलता. अनाग्रही व्यक्ति में परिवर्तन करना नहीं पड़ता, स्वयं घटित होता है. ध्यान के द्वारा तनाव का ताना-बाना छिन्न-भिन्न होता है.
उसके बाद दृष्टि स्पष्ट होती है. उससे आग्रह समाप्त होता है और अनाग्रही चित्त किसी भी गलत आदत से सहजता से मुक्त हो सकता है. ध्यान से ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है.
– आचार्य तुलसी
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