विकृति है परतंत्रता

Updated at :14 Aug 2015 4:46 AM
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विकृति है परतंत्रता

इस संसार में मनुष्य को जीने के लिए श्वास की जितनी अपेक्षा है, उससे भी अधिक आवश्यक है एक राष्ट्र की स्वतंत्र चेतना का विकास. परतंत्रता एक प्रकार की विकृति है. विकृत वातावरण में व्यक्ति की सांसें घुटने लगती हैं. स्वतंत्रता की स्वीकृति का एक स्वतंत्र मूल्य है. इससे अनियामकता नामक तत्व परतंत्र हो जाता […]

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इस संसार में मनुष्य को जीने के लिए श्वास की जितनी अपेक्षा है, उससे भी अधिक आवश्यक है एक राष्ट्र की स्वतंत्र चेतना का विकास. परतंत्रता एक प्रकार की विकृति है. विकृत वातावरण में व्यक्ति की सांसें घुटने लगती हैं. स्वतंत्रता की स्वीकृति का एक स्वतंत्र मूल्य है.
इससे अनियामकता नामक तत्व परतंत्र हो जाता है और आंतरिक चेतना या विवेक का परिस्फुरण होता है. स्वतंत्रता से प्रत्येक नागरिक को समान अवसर उपलब्ध होते हैं. देश की राज्यसत्ता का दायित्व ओढ़ने के लिए प्रत्येक नागरिक को समान अवसर उपलब्ध रहता है.
अपनी योग्यता और क्षमता द्वारा वह जनता का विश्वास प्राप्त करता है. जनमत उसे संसद में जाने का अवसर देता है. वहां उसके मस्तिष्क पर सत्ता की नुकीली कीलों वाला मुकुट रखा जाता है. जब तक उस मुकुट के लिए प्रतिद्वंद्विता का भाव जागृत नहीं होता, व्यक्ति जैसे-तैसे अपना काम चला लेता है. जिस समय अनेक व्यक्ति अपनी योग्यता प्रमाणित करते हैं, उनमें प्रतिस्पर्धा बढ़ती है.
स्वतंत्रता-प्राप्ति का आनंद कम हो जाता है और व्यक्तिगत पद, प्रतिष्ठा, स्वार्थ आदि का भ्रमजाल व्यक्ति को उलझा लेता है. स्वतंत्रता को उपलब्ध करने का सबसे बड़ा लाभ है अवसर का सदुपयोग करना. व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से पनपनेवाले दोषों का अपहार किये बिना स्वतंत्रता में सुख की अनुभूति नहीं हो सकती.
आचार्य तुलसी
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