नवरात्र पहला दिन : शैलपुत्री दुर्गा का ध्यान

Updated at :21 Mar 2015 6:30 AM
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नवरात्र पहला दिन : शैलपुत्री दुर्गा का ध्यान

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखराम्। वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्री यशिस्वनीम्।। मैं मनोवांछित लाभ के लिए मस्तक पर अर्धचंद्र धारण करनेवाली,वृष पर आरूढ़ होनेवाली,शूलधारिणी, यशस्विनी शैलपुत्री दुर्गा की वंदना करता हूं. जगत जननी महाशिक्त दुर्गा-1 श्रीदुर्गा उपासना के दो अवसर पुनीत माने गये हैं- शारदीय नवरात्र और वासंतिक नवरात्र. यानी वर्ष में कुल 18 ऐसी दैवीय रात्रियां […]

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वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखराम्।
वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्री यशिस्वनीम्।।
मैं मनोवांछित लाभ के लिए मस्तक पर अर्धचंद्र धारण करनेवाली,वृष पर आरूढ़ होनेवाली,शूलधारिणी, यशस्विनी शैलपुत्री दुर्गा की वंदना करता हूं.
जगत जननी महाशिक्त दुर्गा-1
श्रीदुर्गा उपासना के दो अवसर पुनीत माने गये हैं- शारदीय नवरात्र और वासंतिक नवरात्र. यानी वर्ष में कुल 18 ऐसी दैवीय रात्रियां होती हैं. पहले चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक मनाये जानेवाले नवरात्र को वासंतिक नवरात्र तथा दूसरे अश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक शारदीय नवरात्र कहा जाता है. वासंतिक नवरात्र के साथ हमारे भारतीय नववर्ष यानी नव संवत्सर प्रारंभ हो रहा है. ( प्रस्तुति-डॉ एनके बेरा)
नवरात्र के इन नौ दिनों में जगत जननी महाशक्ति दुर्गा के नौ रूपों शैलपुत्री ,ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनि, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री की विधिवत पूजा-अर्चना, आराधना तथा श्री दुर्गा सप्तशती पाठ का विधान है.
यह नवरात्र : व्रत सार्विवर्णक (सभी वर्णो के लिए)है. नवरात्र व्रत पूरे न हो सके तो सामर्थ के अनुसार सप्तरात्र, पंचरात्र, त्रिरात्र, युग्मरात्र अथवा एकरात्र व्रत ही करना चाहिए. प्रतिपद से सप्तमी र्पयत अनुष्ठान करने से सप्तरात्र-व्रत पूरा होता है. पंचमी को एक भुक्त, षष्ठी को नक्त-व्रत,सप्तमी को अयाचित, अष्टमी को उपवास और नवमी को पारण करने से पंचरात्र व्रत पूरा होता है.
सप्तमी, अष्टमी और नवमी को एक भुक्त रहने से त्रिरात्र व्रत पूरा होता है. प्रारंभ के दिन और अंतिम दिन व्रत रहने से, युग्मरात्र व्रत और आरंभ या समाप्ति के दिन केवल एक दिन व्रत करने से एकरात्रि व्रत पूर्ण होता है. शक्ति के अनुसार मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए इनमें से एक व्रत तो सबको अवश्य ही करना चाहिए. इस व्रत से मनुष्य की निश्चित अभीष्ट-सिद्धि होती है.
प्रसिद्धि है – कलौ चण्डी विनायक-कलियुग में देवी चण्डी और गणोश प्रत्यक्ष फल देते हैं.
सर्व शाक्तमजीजनत : इस वेद-वाक्य के अनुसार समस्त विश्व ही शक्ति से उत्पन्न है. शक्ति के द्वारा ही अनंत ब्रह्माण्डों का पालन,पोषण और संहारादि होता है. ब्रह्मा, विष्णु, शिव, अग्नि,सूर्य,वरूण आदि देव भी उसी शक्ति से संपन्न होकर स्व-स्वकार्य करने में सक्षम होते हैं. प्रत्यक्ष रूप से सब कार्यो की कारणरूपा भगवती दुर्गा ही है.
(क्र मश:) प्रस्तुति-डॉ एनके बेरा
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