दर्शन का अर्थ है देखना

हमारा देश भारत केवल भूगोल या इतिहास का ही अंग नहीं है. यह केवल एक देश, एक राष्ट्र, एक जमीन का टुकड़ा मात्र नहीं है. यह एक प्रतीक, एक काव्य, कुछ अदृश्य सा है, फिर भी जिसे छुआ जा सके! कुछ विशेष ऊर्जा-तरंगों से स्पंदित है यह जगह, जिसका दावा कोई और देश नहीं कर […]
हमारा देश भारत केवल भूगोल या इतिहास का ही अंग नहीं है. यह केवल एक देश, एक राष्ट्र, एक जमीन का टुकड़ा मात्र नहीं है. यह एक प्रतीक, एक काव्य, कुछ अदृश्य सा है, फिर भी जिसे छुआ जा सके! कुछ विशेष ऊर्जा-तरंगों से स्पंदित है यह जगह, जिसका दावा कोई और देश नहीं कर सकता. इधर दस हजार वर्षो में सहस्त्रों लोग चेतना की चरम विस्फोट की स्थिति तक पहुंचे हैं. उनकी तरंगें अब भी जीवंत हैं.
उनका असर अब भी हवाओं में मौजूद है. तुम्हें केवल एक विशेष तरह की ग्राहकता की, संवेदनशीलता की, उस अदृश्य को ग्रहण करने की क्षमता की जरूरत है, जो इस अद्भुत भूमि को घेरे हुए है. अद्भुत इसलिए, क्योंकि इसने केवल एक ही खोज- सत्य की खोज के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया. निश्चित ही उनकी खोज, अन्य देशों में की जा रही खोज से सर्वथा भिन्न थी. तुम्हें जान कर आश्चर्य होगा कि भारत ने एक भी दार्शनिक को जन्म नहीं दिया, क्योंकि वह सत्य की खोज में संलग्न था! दूसरे देशों में लोग सत्य के संबंध में चिंतन कर रहे थे. भारत में वे सत्य के बारे में विचार नहीं कर रहे थे. प्रकाश देखा जा सकता है पर सोचा नहीं जा सकता. सत्य भी देखा जा सकता है, किंतु विचारा नहीं जा सकता. इसीलिए भारत में हमारे पास ‘फिलॉसफी’ का समानार्थी शब्द ही नहीं है. सत्य की खोज को हम दर्शन कहते हैं और दर्शन का मतलब होता है- देखना. जबकि फिलॉसफी का अर्थ है सोचना-विचारना.
आचार्य रजनीश ‘ओशो’
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