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कार्तिक पूर्णिमा: नदियों में आस्था की डुबकी लगा रहें हैं श्रद्धालु, जानें इसका महत्व और पूजा विधि

Updated at : 12 Nov 2019 8:38 AM (IST)
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कार्तिक पूर्णिमा: नदियों में आस्था की डुबकी लगा रहें हैं श्रद्धालु, जानें इसका महत्व और पूजा विधि

आज कार्तिक पूर्णिमा है. आज दान करने का अलग महत्व है. इस अवसर पर विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है. नदियों और तालाबों में श्रद्धालुओं की भीड़ जुट रही है. सभी भगवान की पूजा अर्चना कर रहे हैं….दान-पुण्य कर रहे हैं… परिवार की सुख, शांति और समृद्धि की कामना लोग कर रहे हैं. […]

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आज कार्तिक पूर्णिमा है. आज दान करने का अलग महत्व है. इस अवसर पर विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है. नदियों और तालाबों में श्रद्धालुओं की भीड़ जुट रही है. सभी भगवान की पूजा अर्चना कर रहे हैं….दान-पुण्य कर रहे हैं… परिवार की सुख, शांति और समृद्धि की कामना लोग कर रहे हैं. इस दिन सत्यनारायण स्वामी की कथा सुनने की भी परंपरा है. शास्त्र कहते हैं,जीवन में दान-पुण्य करना कभी भी व्यर्थ नहीं जाता है. धार्मिक कार्यों और दान की महिमा का महत्व हमारे विशेष धार्मिक पर्व पर और भी बढ़ जाता है. खासकर कार्तिक पूर्णिमा पर धार्मिक कार्य करने का आपको दोगुना फल मिलता है. कार्तिक पूर्णिमा के दिन ऐसी मान्यता है कि इस दिन शिव शंकर की पूजा करने से सात जन्म तक व्यक्ति ज्ञानी और धनवान होता है.

कार्तिक पूर्णिमा का महत्व
कार्तिक पूर्णिमा को हिंदू धर्म में विशेष महत्व दिया जाता है. इसी दिन भगवान शिव ने त्रिपुरा नाम से राक्षस का वध किया था. जिसके कारण इस पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा और गंगा स्नान के नाम से भी जाना जाता है. कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा नदी में स्नान करने से जीवन के सभी पाप धूल जाते हैं. इसके अलावा इस दिन दीप दान भी किया जाता है. माना जाता है कि कार्तिक पूर्णिमा का दान स्वर्ग में सुरक्षित रखा जाता है और जब व्यक्ति मृत्युलोक को त्यागता है तो उसे उस दान का फल स्वर्गलोक में प्राप्त होता है.

कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव की विशेष पूजा अर्चना की जाती है. इस दिन भगवान शिव के दर्शन करने से धन और ज्ञान में वृद्धि होती है. इस दिन गाय का बछड़ा भी दान करने को विशेष महत्व दिया जाता है. कार्तिक पूर्णिमा के दिन गाय का बछड़ा दान करने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है. कार्तिक पूर्णिमा एक नाम महाकार्तिकी भी है. क्योंकि इस दिन भगवान शिव की पूजा तो की ही जाती है साथ ही इस दिन कार्तिक मास की पूर्णिमा भी होती है. सभी प्रकार के पुण्यफलों को प्राप्त करने के लिए यह पूर्णिमा अति विशेष मानी जाती है.

कार्तिक पूर्णिमा पूजा विधि-

1. कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान कार्तिकेय की पूजा का विधान है.

2. भगवान कार्तिकेय को दक्षिण दिशा का स्वामी माना गया है.

3. कार्तिक पूर्णिमा के दिन किसी पवित्र नदी,सरोवर या जलाश्य में स्नान करके साफ वस्त्र धारण करने चाहिए.

4.इसके बाद दक्षिण दिशा में भगवान कार्तिकेय की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें.

5. इसके बाद उन्हें पुष्प, घी और दही आदि अर्पित करके उनके मंत्र ‘देव सेनापते स्कंद कार्तिकेय भवोद्भव. कुमार गुह गांगेय शक्तिहस्त नमोस्तु ते॥’ का जाप करें.

6.इसके बाद उन्हें गुड़ से बनी मिठाई का भोग लगाकर उनकी धूप व दीप से आरती उतारें.

7. कार्तिक पूर्णिमा के दिन दान को भी विशेष महत्व दिया जाता है. इसलिए अपने सामर्थ्य के अनुसार किसी निर्धन व्यक्ति या किसी ब्राह्मण को दान अवश्य दें.

8. पूर्णिमा तिथि के दिन दिया गया दान मनुष्य के पितरों को भी लाभ पहुंचाता है.

कार्तिक पूर्णिमा की कथा-

पौराणिक कथा के अनुसार एक राक्षस जिसका नाम त्रिपुर था। उसने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की. त्रिपुर की तपस्या से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया. सभी देवताओं ने त्रिपुर के इस कठोर तप को तोड़ने का निर्णय लिया. जिसके लिए उन्होंने बहुत ही सुंदर अप्सराएं त्रिपुर के पास भेजीं. लेकिन फिर भी त्रिपुर की तपस्या भंग नही हुई. जब त्रिपुर की तपस्या भंग नही हुई तो अंत में ब्रह्मा जी को विवश होकर त्रिपुर के सामने प्रकट होना ही पड़ा. इसके बाद ब्रह्मा जी ने त्रिपुर को वरदान मांगने के लिए कहा. त्रिपुर ने ब्रह्मा जी से वर में मांगा कि उसे न तो कोई देवता मार पाए और न हीं कोई मनुष्य. ब्रह्मा जी ने त्रिपुर को यह वरदान दे दिया. जिसके बाद त्रिपुर ने लोगों पर अत्याचार करना शुरु कर दिया. त्रिपुर के अंदर अहंकार इतना बढ़ गया कि उसने कैलाश पर्वत पर ही आक्रमण कर दिया. जिसके बाद भगवान शिव और त्रिपुर के बीच में बहुत ही भयंकर युद्ध हुआ. यह युद्ध काफी लंबे समय तक चला. जिसके बाद भगवान शिव ने ब्रह्मा जी और श्री हरि नारायण विष्णु की मदद से त्रिपुर का अंत कर दिया.

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