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शारदीय नवरात्र सातवां दिन : ऐसे करें मां कालरात्रि की पूजा, जपे ये ध्यान मंत्र

Updated at : 05 Oct 2019 5:08 AM (IST)
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शारदीय नवरात्र सातवां दिन : ऐसे करें मां कालरात्रि की पूजा, जपे ये ध्यान मंत्र

जिनका रूप विकराल है, जिनकी आकृति और विग्रह कृष्ण कमल सदृश है तथा जो भयानक अट्टहास करनेवाली हैं, वे कालरात्रि देवी दुर्गा मंगल प्रदान करें. त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारःस्वरात्मिका सगुण उपासना के ब्रह्मपद से संबंधित चिद् भाव का आश्रय लेकर विष्णु, सद् भाव से शिव, तेजोभावप्रधान सूर्य, बुद्धिप्रधान गणपति तथा भगवत्-शक्ति का […]

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जिनका रूप विकराल है, जिनकी आकृति और विग्रह कृष्ण कमल सदृश है तथा जो भयानक अट्टहास करनेवाली हैं, वे कालरात्रि देवी दुर्गा मंगल प्रदान करें.
त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारःस्वरात्मिका
सगुण उपासना के ब्रह्मपद से संबंधित चिद् भाव का आश्रय लेकर विष्णु, सद् भाव से शिव, तेजोभावप्रधान सूर्य, बुद्धिप्रधान गणपति तथा भगवत्-शक्ति का आश्रय ग्रहण कर शक्ति की उपासना का क्रम उदभूत हुआ. चिदंश से जगत् का दर्शन, सदंश से जगत् के अस्तित्व का अनुभव, तेज-अंश से ब्रह्म की ओर आकर्षण, बुद्धि से सद्-ब्रह्म और असत् जगत् के भेद का ज्ञान होता है.
कालरात्रि दुर्गा ध्यान मंत्र
करालरूपा कालाब्जसमानाकृति विग्रहा।
कालरात्रिःशुभं दद्दाद् देवी चण्डाटटहासिनी।।
शक्ति सृष्टि, स्थिति और लय करती हुई जीव को बद्ध भी करती तथा मुक्ति भी प्रदान कराती है. इन उपासनाओं से ब्रह्म सांनिध्य तथा अंत में ब्रह्मसायुज्य प्राप्त होता है. इनकी पांच पृथक गीताएं हैं. इनके प्रधान देवों का ब्रह्मरूप में निर्देश है. शक्ति उपासना में मातृभाव से उपास्य की करुणा उपासक को सर्वदा सुलभ रहती है. उपासना की शक्ति-प्रधान में मधुरता विशेष है.
आद्दाशक्ति मंगलमयी मां की उपासना में काली, तारा, त्रिपुरसुंदरी या षोड़शी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला या कमलात्मिका- इन दस महाविद्या ओं का अत्यंत महत्व है. इनमें प्रथम दो महाविद्या, पांच विद्या तथा अंत की तीन सिद्धविद्या के नाम से प्रसिद्ध हैं. षोड़शी को श्रीविद्या माना जाता है, उनके ललित, राजराजेश्वरी, महात्रिपुरसुंदरी, बालापंचदशी आदि अनेक नाम है. इन्हें आद्याशक्ति माना जाता है. वे भुक्ति-मुक्तिदात्री हैं.अन्य विद्याएं भोग या मोक्ष में से एक ही देती है. इनके स्थूल, सूक्ष्म, पर तथा तुरीय चार रूप हैं. सांसारिक रागी पुरूष सगुण तथा विरागी निर्गुण के उपासक हैं-
सगुणा निर्गुणा चेति द्विधा प्रोक्ता मनीषिभिः ।
सगुणा रागिभिः प्रोक्ता निर्गुणा तु विरागिभिः ।।
( क्रमशः)
प्रस्तुति : डॉ एनके बेरा
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