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तुलसी के राम ‘जय श्रीराम’ नहीं, वे ‘जय सियाराम’ हैं

Updated at : 18 Aug 2019 3:55 PM (IST)
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तुलसी के राम ‘जय श्रीराम’ नहीं, वे ‘जय सियाराम’ हैं

डॉ नवीन कुमार तुलसी की भक्ति सर्वग्राह्य और सर्वसुलभ के तर्क के साथ चलती है. तुलसीदास ने भक्ति के लिए दो चीजें जरूरी बतायीं. अभ्यास और वैराग्य. कुरुक्षेत्र में अर्जुन कृष्ण से कहते हैं : यह मन तो बड़ा चंचल है. इसे कैसे आप पर केंद्रित करूं! ईश्वर से मन को जोड़ने के लिए इस […]

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डॉ नवीन कुमार

तुलसी की भक्ति सर्वग्राह्य और सर्वसुलभ के तर्क के साथ चलती है. तुलसीदास ने भक्ति के लिए दो चीजें जरूरी बतायीं. अभ्यास और वैराग्य. कुरुक्षेत्र में अर्जुन कृष्ण से कहते हैं : यह मन तो बड़ा चंचल है. इसे कैसे आप पर केंद्रित करूं! ईश्वर से मन को जोड़ने के लिए इस संसार से मन को तोड़ना जरूरी है. ये दोनों क्रियाएं तोड़ने और जोड़ने के क्रमिक अभ्यास से ही संभव हैं. तुलसीदास ने कहा है कि चीटीं पहले बालू की ओर आकर्षित होती है. मगर चखने के बाद उसे त्याग देती है. वहीं, चीनी मिलते ही उसे खाना शुरू कर देती है.

इसलिए किसी भी भक्त को पहले इस सांसारिक राग का अतिक्रमण करना होता है. तभी ईश्वर के प्रति विशेष राग उत्पन्न होता है. इसलिए तुलसीदास ने कहा है कि ईश्वर की भक्ति करने में बहुत कठिनाई है. बिना अभ्यास और बिना वैराग्य के भक्ति को साधना मुश्किल है. अभ्यास के कारण ही छोटी-सी मछली धारा के विपरीत भी कोसों तैर लेती हैं, जबकि गजराज अभ्यास न होने के कारण ही प्रवाह में बह जाता है.

तुलसी की भक्ति में मोक्ष का स्थान नहीं है. वे कैवल्य की प्राप्ति नहीं चाहते. वे चाहते हैं कि राम की भक्ति हर जन्म में सुलभ हो. यदि तुलसी मोक्ष और निर्वाण की मांग नहीं करते, तो इसका अर्थ है कि वे सिर्फ अपने राम की निकटता चाहते हैं. तुलसीदास को चार पुरुषार्थों में से कोई पुरुषार्थ नहीं चाहिए. चाहिए तो सिर्फ राम भक्ति! दशरथ मरने के समय में राम से मोक्ष की मांग नहीं करते हैं. उनकी तो यही कामना है कि हर जन्म में राम उनके पुत्र बनकर पैदा हों और उनके आंगन में खेलें.

तुलसी के राम पारलौकिक नहीं हैं. वे तो इसी संसार में हर जड़ व चेतन में समाये हुए हैं. इस राम को पाने के लिए न तो मोक्ष की जरूरत है, न ही वन–वन भटकने की. वह तो सबमें समाये हैं. अत: तुलसी की भक्ति व्यक्ति को विश्व बंधुत्व की ओर ले जाती है, क्योंकि तुलसी की भक्ति लोक मांगलिक है. तुलसी के नायक राम का जन्म ही मंगल के लिए हुआ है. यदि राम स्वयं मंगलकारी हैं, तो उनकी कथा स्वत: मंगलकारी हो जाती है.

तुलसी के राम और लक्ष्मण किशोर काल में ही विश्वमित्र के अनुरोध पर उनके आश्रम की रक्षा के लिए जाते हैं. रास्ते में मारीच उनकी राह रोक लेते हैं. राम डराने के लिए उसे बिना फल के बाण से मारते हैं. वह समुद्र पार जाकर गिरता है. इस पर भी राक्षस उत्पात नहीं छोड़ते. ताड़का-सुबाहु फिर रास्ता घेर लेते हैं. इस बार राम बिना मौका दिये उनका वध कर देते हैं. आगे वही राम पत्थर बनी हुई अहिल्या का उद्धार करते हैं.

ऐसा नहीं कि राम हृदय परिर्वतन का मौका नहीं देते, लेकिन जब दुष्ट दुष्टता छोड़ने से बाज नहीं आता, तो उसे दंडित भी करते हैं. तीन दिन तक राम सागर से रास्ता देने की प्रार्थना करते हैं. जब वह नहीं पिघलता है, तो ‘बिन भय होहि न प्रीत’ के सिद्धांत पर अमल करते हैं.

राम सिर्फ अपनी पत्नी की प्राप्ति के लिए रावण का वध नहीं करते. रावण तो विश्व को दुख देने वाला है. दुनिया को राक्षसों से मुक्ति दिलाने के लिए वे राक्षसों समेत रावण का वध करते हैं. वन में घूमते हुए राम को हड्डियों का एक ढेर दिखता है. पूछने पर पता चलता है कि यह उन ऋषि-मुनियों की हड्डियों का ढेर है, जिन्हें रावण ने मारा. तब राम भुजा उठाकर प्रतिज्ञा करते हैं कि मैं रावण का वध करूंगा. इसलिए रावण का वध राम की व्यक्तिगत मजबूरी नहीं थी.

तुलसीदास सर्प को दूध पिलाकर उसके हृदय परिर्वतन की प्रतीक्षा नहीं करते. यह तो एकांत अहिंसावादियों का कर्म है. असहाय दुर्जनों-हत्यारों के हृदय परिवर्तन की प्रतीक्षा करना और सामान्य अपराधियों के लिए दंड और कारागार की व्यवस्था करना तुलसी को मान्य नहीं है. तुलसी का मानना है कि यदि अत्याचारियों का दमन न्यायसंगत उपायों से न हो, तो अनीति का सहारा लेना भी लोकधर्म है.

तुलसीदास मर्यादावाद के घोर समर्थक हैं. उनका मर्यादावाद अनुशासनवाद है. इसका अर्थ रूढ़ियों का शासन नहीं, नियमों का शासन है. तुलसीदास ने अपनी रचना में पति–पत्नी, भाई–भाई, मालिक-नौकर के संबंधों की मर्यादाएं निर्धारित कीं! इन संबंधों में भी स्तर भेद का ध्यान रखा. राम और लक्ष्मण का जो भ्रातृ–संबंध है, वह वही नहीं है, जो राम और भरत संबंध है. राम और सुग्रीव का जो सखा संबंध है, वह बिल्कुल राम और विभीषण के सखा संबंध जैसा नहीं है. और उसी तरह राम और हनुमान में जो शिष्य और सेवक का संबंध है, वह राम और अंगद में नहीं है. सबमें भेद है.

सीता हरण के बाद राम विकल होकर पूछते हैं ‘हे खग मृग हे मुधर श्रेणी क्या तूने देखी सीता मृगनयनी’. राम चूंकि सबसे पहले खग से पूछते हैं, इसलिए खग ही सबसे पहले जवाब देता है. सबसे पहले खग से इसलिए पूछा गया कि खग दूर तक देखता है. मृग से पूछा गया, क्योंकि वह सबसे तेज दौड़ता है. और मधुकर श्रेणी से सबसे अंत में पूछा, क्योंकि ये न बहुत ऊंचा उड़ते हैं, न ही दूर तक देखते हैं. तुलसी के राम और उनके परिवेश और तुलसी की कविता सब में मर्यादा का मनोहर बंधन है.

तुलसी के काव्य में समन्वय की अपार संभावनाएं हैं. इनके काव्य में लोक और शास्त्र का समन्वय है. गृहस्थ और वैराग्य का समन्वय है. ज्ञान और भक्ति का समन्वय है. ब्राह्मण और चांडाल का समन्वय है. भाषा और संस्कृत का समन्वय है. पांडित्य और अपांडित्य का समन्वय है. शुरू से आखिर तक तुलसी का काव्य समन्वय का काव्य है.

विद्वानों ने कहा है कि पृथ्वीराज रासो अगर वीर गाथा है, पद्मावत प्रेम गाथा है, तो रामचरितमानस जीवन गाथा है. तुलसी ने इसमें मानव जीवन का अधिक से अधिक समावेश किया है. कोई भी मानवीय भाव इनकी पकड़ से अछूता नहीं है. तुलसी के राम सामान्य मनुष्य की तरह कष्ट सहते हैं. राक्षसों से जूझते हैं. सीता हरण के बाद पत्नी वियोग में विलाप करते हैं. वानरो और भालुओं की सेना सजाते हैं. सागर पर पुल बांधकर अपने सभी सहयोगियों के साथ राक्षसों पर विजय प्राप्त करते हैं.

तुलसी यदि राम को सिर्फ ब्रह्म रूप में चित्रित करते हैं, तब सीता की मुक्ति के लिए इतनी परेशानी उठाने की जरूरत थी. सीता वियोग में तड़पने वाले या राक्षसों से लड़ने वाले राम सोलह आना मनुष्य हैं. उनकी जीत एक अदद व्यक्ति की जीत नहीं है, समूह की जीत है. तुलसी ने समूह की शक्ति को भी प्रतिष्ठित किया है. तुलसी के राम सभी लोगों पर अपनी समान ममता बरसाते हैं. कोई भेद नहीं करते. राम को कौशल्या उतनी ही प्रिय है, जितनी कैकेयी, मंथरा.

यदि राम नारी मन के सूक्ष्म भावों को पढ़ सकते हैं, उनके सम्मान का इतना ख्याल कर सकते हैं, तो वह नारी विरोधी कैसे हो सकते हैं. अगर तुलसी नारी विरोधी होते, तो अपने नायक राम से नारी मन की सूक्ष्मता को इतनी बारीकी से पढ़ नहीं लेतेे. पत्थर बनी हुई अहिल्या का उन्होंने ही उद्धार किया. यह राम ही हैं, जिन्होंने अपने पिता के समान बहुविवाह का नियम नहीं अपनाया, एक पत्नी व्रत अपनाया.

तुलसी के लिए प्रश्न जात–पांत का भी नहीं है. मानवीय मूल्यों का है. जो भी मानवीय मूल्य के विरुद्ध जाता है, तुलसी उसका संहार चाहते हैं. हां, वह नारी को पूर्ण स्वतंत्रता के पक्षधर नहीं हैं. वे उसे नियंत्रित स्वतंत्रता देने के पक्ष में हैं. सीता के लिए खींची गयी लक्ष्मण रेखा पराधीनता की रेखा नहीं है. वह सुरक्षा कवच है. नियंत्रित स्वतंत्रता का मतलब है, सुरक्षा में स्वतंत्रता. मध्ययुगीन समाज में उसकी संपूर्ण स्वतंत्रता की मांग करना उसके अपहरण को न्योता देने के समान था. तुलसी की बातें आज भी अक्षरश: सही हैं.

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