झारखंड के कथाकार जयनंदन को 2022 का श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको साहित्य सम्मान, कहा-पुरस्कार पाकर खुश हूं

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झारखंड के कथाकार जयनंदन को 2022 का श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको साहित्य सम्मान, कहा-पुरस्कार पाकर खुश हूं

जयनंदन ने कहा कि चूंकि यह पुरस्कार खेती-किसानी और इससे जुड़े मुद्दों पर लिखी गयी रचनाओं को ही मिलता है और मेरी कई रचनाएं इस पृष्ठभूमि की हैं, इसलिए यह मेरे लिए प्रतीक्षित था, घोषणा होने पर खुशी होना स्वाभाविक है.

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श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको साहित्य सम्मान देश के प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से एक है. यह पुरस्कार मिलना गौरव की बात है, इससे देश में आपको मान्यता मिलती है और लोग आपकी रचनाओं के बारे में जानते हैं, तो निश्चय ही खुशी हो रही है. उक्त बातें देश के जाने-माने कथाकार जयनंदन ने श्रीलाल शुक्ल स्मृति पुरस्कार की घोषणा होने के बाद प्रभात खबर के साथ बातचीत में कही.

जयनंदन ने कहा-सम्मान पाकर खुश हूं 

जयनंदन ने कहा कि चूंकि यह पुरस्कार खेती-किसानी और इससे जुड़े मुद्दों पर लिखी गयी रचनाओं को ही मिलता है और मेरी कई रचनाएं इस पृष्ठभूमि की हैं, इसलिए यह मेरे लिए प्रतीक्षित था, घोषणा होने पर खुशी होना स्वाभाविक है. पुरस्कार की घोषणा होने पर लेखक को मान्यता मिलती है.

पुरस्कार में मिलेंगे ग्यारह लाख रुपये

गौरतलब है कि उर्वरक क्षेत्र की अग्रणी सहकारी संस्था इंडियन फारमर्स फर्टिलाइजर कोआपरेटिव लिमिटेड (इफको) ने वर्ष 2022 के ‘श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको साहित्य’ सम्मान के लिए कथाकार जयनंदन के नाम की घोषणा की गयी है. जयनंदन का चयन चित्रा मुद्गल की अध्यक्���ता वाली छह सदस्यीय चयन समिति ने किया है. जयनंदन को पुरस्कार स्वरूप एक प्रतीक चिह्न, प्रशस्ति पत्र तथा ग्यारह लाख रुपये की राशि का चेक प्रदान किया जायेगा. 31 जनवरी, 2023 को पुरस्कार प्रदान किया जायेगा.

बिहार के नवादा में जन्मे हैं जयनंदन

जयनंदन का जन्म 26 फरवरी 1956 में बिहार के नवादा जिले के मिलकी गांव में हुआ था. इनकी शिक्षा रांची में हुई थी और ये जमशेदपुर में रहते हैं. जयनंदन की दो दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें ‘श्रम एव जयते’, ‘ऐसी नगरिया में केहि विधि रहना’, ‘सल्तनत को सुनो गांववालो’, ‘विघटन’, ‘चौधराहट’, ‘मिल्कियत की बागडोर’, ‘रहमतों की बारिश’ जैसे उपन्यास तथा ‘सन्नाटा भंग’, ‘विश्व बाजार का ऊंट’, ‘एक अकेले गान्ही जी’, ‘कस्तूरी पहचानो वत्स’, ‘दाल नहीं गलेगी अब’, ‘घर फूंक तमाशा’, ‘सूखते स्रोत’, ‘गुहार’, ‘गांव की सिसकियां’, ‘भितरघात’, ‘मेरी प्रिय कथायें’, ‘मेरी प्रिय कहानियां’, ‘सेराज बैंड बाजा’, ‘संकलित कहानियां’, चुनी हुई कहानियां’, ‘गोड़पोछना’, ‘चुनिंदा कहानियां’ आदि कहानी संग्रह प्रमुख हैं. इसके अलावा उन्होंने नाटक और निबंध भी लिखे हैं. बिहार सरकार राजभाषा विभाग सहित अनेक साहित्यिक, सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया है.

मूर्धन्य कथाशिल्पी श्रीलाल शुक्ल की स्मृति में दिया जाता है सम्मान

गौरतलब है कि मूर्धन्य कथाशिल्पी श्रीलाल शुक्ल की स्मृति में वर्ष 2011 में इस पुरस्कार की शुरुआत हुई थी. यह पुरस्कार प्रत्येक वर्ष ऐसे हिंदी लेखक को दिया जाता है जिसकी रचनाओं में मुख्यतः ग्रामीण व कृषि जीवन का चित्रण किया गया हो. इससे पहले यह सम्मान विद्यासागर नौटियाल, शेखर जोशी, संजीव, मिथिलेश्वर, अष्टभुजा शुक्ल, कमलाकांत त्रिपाठी, रामदेव धुरंधर, रामधारी सिंह दिवाकर, महेश कटारे, रणेंद्र और शिवमूर्ति को दिया जा चुका है.

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रजनीश आनंद

लेखक के बारे में

By रजनीश आनंद

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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