13 जून मेहदी हसन की पुण्यतिथि : आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ !

-ध्रुव गुप्त- भारतीय उपमहाद्वीप के महानतम गायकों में एक ‘शहंशाह-ए-ग़ज़ल’ मेहदी हसन ने अपनी भारी, गंभीर और रूहानी आवाज़ में मोहब्बत और दर्द को जो गहराई दी थी, वह ग़ज़ल गायिकी के इतिहास की सबसे दुर्लभ घटना थी. वे ग़ज़ल गायिकी के वह शिखर रहे हैं जिसे उनके बाद का कोई भी गायक अब तक […]
-ध्रुव गुप्त-
पाकिस्तान सरकार ने उन्हें ‘तमगा-ए-इम्तियाज़’ और भारत सरकार ने ‘के.एल. सहगल संगीत शहंशाह सम्मान’ से नवाज़ा. मेहदी हसन के गाए कुछ कालजयी गीत, ग़ज़लें और नज़्में हैं – ज़िंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं, बहुत खूबसूरत है मेरा सनम, नवाजिश करम शुक्रिया मेहरबानी, ख़ुदा करे कि मोहब्बत में वो मक़ाम आए, किया है प्यार जिसे हमने ज़िंदगी की तरह, अबके हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें, रंज़िश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ, पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है, बात करनी मुझे मुश्क़िल कभी ऐसी तो न थी, भूली बिसरी चंद उम्मीदें, यारों किसी क़ातिल से कभी प्यार न मांगो, मोहब्बत करने वाले कम न होंगे, मैं ख़्याल हूं किसी और का, हमें कोई ग़म नहीं था गमे आशिक़ी से पहले, एक बस तू ही नहीं मुझसे खफ़ा हो बैठा, एक बार चले आओ, ये धुआं सा कहां से उठता है, दिल में अब यूं तेरे भूले हुए ग़म आते हैं, आए कुछ अब्र कुछ शराब आए आदि.
13 जून, 1912 को कैंसर की वज़ह से ही मेहंदी हसन का इंतकाल हुआ. उनके जाने के बाद सुप्रसिद्ध सूफ़ी गायिका आबिदा परवीन ने उनकी गाई मीर की एक ग़ज़ल ‘देख तो दिल की जां से उठता है’ सुनाते हुए कहा था – इस ग़ज़ल का हर शेर और इसके तमाम अहसास जैसे मेहदी हसन साहब का ही है. हमारे ज़हन से, दिल से यहां तक कि हमारी रूह से वे कभी निकल ही नहीं सकते. मैं तो कहूंगी कि जाते-जाते वे सब जगह बस धुआं ही धुआं कर गए हैं.
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