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बुद्धिनाथ मिश्र की प्रथम गद्यकृति '' निरख सखी ये खंजन आयें '' का लोकार्पण

Updated at : 06 Mar 2018 11:05 AM (IST)
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बुद्धिनाथ मिश्र की प्रथम गद्यकृति '' निरख सखी ये खंजन आयें '' का लोकार्पण

बुद्धिनाथजी सिर से पांव तक गीतकार हैं . यह अनुभव इनके मधुर गीतों को पिछली आधी सदी से सुनते हुए हमें होता ही रहा है. आज इनकी प्रथम गद्यकृति ‘ निरख सखी ये खंजन आयें ‘ को पढ़कर यह अनुभूति और गहरी हो गयी है कि बुद्धिनाथजी महाकवि विद्यापति के खांटी वारिस हैं . इस […]

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बुद्धिनाथजी सिर से पांव तक गीतकार हैं . यह अनुभव इनके मधुर गीतों को पिछली आधी सदी से सुनते हुए हमें होता ही रहा है. आज इनकी प्रथम गद्यकृति ‘ निरख सखी ये खंजन आयें ‘ को पढ़कर यह अनुभूति और गहरी हो गयी है कि बुद्धिनाथजी महाकवि विद्यापति के खांटी वारिस हैं . इस संग्रह के लेखों का गद्य भी गीत की तरह सुरीला है. यह उद्गार बंगाल के राज्यपाल और साहित्यकार केशरी नाथ त्रिपाठी ने कल विष्णुपुर (कलकत्ता) में आयोजित पुस्तक लोकार्पण के भव्य समारोह में व्यक्त किया.

राज्यपाल त्रिपाठी ने कहा कि एक गीत-कवि के रूप में बुद्धिनाथजी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हैं. इनके गीतों के प्रेमी सीमा के पार भी कम नहीं है. इनका एक गीत ‘जाल फ़ेंक रे मछेरे ‘ तो पिछली दो पीढ़ियों का सर्वप्रिय गीत रहा है. लेकिन एक स्तंभकार के रूप में विभिन्न दैनिक पत्रों में छपे इनके लेख अपनी साहित्यिक सुरभि के कारण पाठकों को विशेष आकृष्ट करते रहे हैं . ‘निरख सखी ये खंजन आये ‘ के आलेख उन्हीं स्तम्भों से चुने गए आलेख हैं, जिनमें विषय की विविधता के साथ-साथ प्रस्तुति की रोचकता अद्भुत है. मेरे लिए यह ख़ुशी और गौरव की बात है कि विद्वान लेखक ने यह पुस्तक मुझे समर्पित की है.

डॉ बुद्धिनाथ मिश्र ने राज्यपाल महोदय के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि मेरा स्तम्भ लेखन 1971 में ‘दैनिक आज ‘ के संपादन काल में ही प्रारम्भ हो गया था. कुछ वर्ष पूर्व ‘प्रभात खबर ‘ के संपादक हरिवंश के आग्रह पर मैं साहित्य-संस्कृति-कला से जुड़े सामायिक विषयों पर लिखने लगा, जिसे उन्होंने सम्मान के साथ हर शनिवार को संपादकीय पृष्ठ पर स्थान दिया. प्रतिदिन आनेवाली सैकड़ों पाठकों की प्रतिक्रिया ने मुझे वह आनंद दिया, जो कवि सम्मेलनों की तालियों में अनुपलब्ध था. इससे उत्साहित होकर मैं ‘सन्मार्ग’ ‘ हिंदुस्तान’ ‘जागरण ‘ ‘दैनिक पूर्वोदय ‘ में भी लिखने लगा.

किसी भी पार्टी पॉलिटिक्स से ऊपर उठकर लिखनेवाले साहित्यकार को भौतिक लाभ भले न हो. मगर आध्यात्मिक सुख जरूर मिलता है. सामान्यतः दैनिक पत्रों के संपादकीय पृष्ठ पर राजनीति , अर्थनीति आदि से सबंधित आलेख होते हैं. यह पहला उदहारण है जिसमें दैनिक पत्र ने साहित्यिक विषयों को नियमित स्तंभ का स्थान दिया.इस अवसर पर टाटा समूह के वाइस प्रसिडेंट पीयूष गुप्ता और माउंट लिटरा स्कूल समूह के क्षेत्रीय समन्वयक मुखोपध्याय ने भी शिक्षा-संस्कृति के संबंध में अपने विचार रखे.

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