साहित्य संध्या में आज पढ़ें, एक औरत के संघर्ष की कहानी ‘ बड़ी दी’

By Prabhat Khabar Digital Desk
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-निभा सिन्हा-



ऑफिस के केबिन में पहुंचकर अपना बैग टेबल पर रखते हुए मैंने मोहन को आवाज लगाई थी. एक स्ट्रांग कॉफी और दो गरम समोसे लेकर आने को कहा और अपने लैपटॉप में मेल खोलकर देखने लगी थी . ऑफिस के कई मेल के बीच एक मेल बड़ी दी का देखकर मेरी आंखें चमकने लगी थी. आखिर बड़ी दी ने सीख ही लिया मेल लिखना. लिखना कहूं तो गलत होगा. उन्होंने मेल भेजना सीख लिया है. चिट्टियां लिखने में तो वो बहुत ही रेग्यूलर थी. हॉस्टल में हमदोनों बहनों को बड़ी दी की साप्ताहिक चिट्ठी तो मिल ही जाती थी. और घर पर तो मां के पास उनके अनगिनत खत आते रहते थे. इंटरमीडिएट तक पहुंचते पहुंचते दोस्त जैसी हो गई थी माँ के लिए. घर के ज्यादातर फैसले. चाहे घरमें चादर ही बदलना हो या हमारे कपड़े बनवाने हो. मां उन्हीं की सलाह से करती. मां किसी शादी में कौन सी साड़ी पहनेंगी. यह निर्णय भी उन्हीं का होता. इंटरमीडिएट पास करते करते पापा ने उनकी शादी के लिए लड़के देखने शुरू कर दिए थे.

1981 की बात रही होगी. तब लड़कियों की शादी की सही उम्र भी यही समझी जाती थी एक मध्यमवर्गीय परिवार में. पापा खुद सरकारी इंजीनियर थे सो उन्हें सबसे सुरक्षित प्रोफेशन इंजीनियरिंग ही लगता. कोई इंजीनियर लड़का बताता तो ही जाते देखने. घर की पहली लड़की की शादी थी सो मां पापा कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते थे.लेकिन उन्हें क्या पता था कि अपनी बिरादरी में लड़के का ऐसा अकाल पड़ा होगा. एक दो अच्छे लड़कों कापता चला भी तो उनके नखरे ऐसे कि फिर पापा दोबारा जाने को टस से मस नहीं हुए. मां ने लगभग गुस्सा दिखातेहुए ही कहा था. 'उन्हें लड़की हेमा मालिनी जैसी चाहिए तो हमारी लड़की क्या देखने में कम सुंदर है'.

बड़ी-बड़ी आंखोंवाली बड़ी दी के तीखे नक्श और लंबे बालों पर तो लड़कियां जान देती थी. भला लड़के कहां पीछे रहते. दोस्त उनकीसुंदरता का बखान किए नहीं थकती थी. और घर का कौन सा ऐसा काम होगा जो वो जानती नहीं थी. सिलाई.कढाई. बुनाई. टैटिंग के अलावा बागवानी का भी खूब शौक था उन्हें. पूरी कॉलोनी के लोग उनकेबोनासाई कलेक्शन की तारीफ करते न अघाते थे. उस पर लिखने पढ़ने का इतना शौक कि जितना ही मैगजीन पढ़ती. उतना ही उनके लिए लिखती भी. लेकिन लगातार चार सालों तक लड़का ढूंढकर परेशान हो गए थे पापा. एक दिन मां से कहने लग गए. 'अपनी बड़ी के लिए कोई लड़का बना भी है कि नहीं'. उसी दिन शाम में गांव सेदूर के रिश्ते के एक दादाजी आए थे. उन्होंने बताया था एक लड़के के बारे में. 'उसका घर तो बहुत ही साधारण है.लड़के के पापा रेलवे में गार्ड है लेकिन लड़का साउथ के एक कॉलेज से मैकेनिकल इंजीनियरिंग करके बोकारो स्टीलसिटी में नौकरी कर रहा है. कल आ जाना बात करने'. कहकर चले गए थे दादाजी. लड़के की किल्लत सेपरेशान मां पापा ने पूरी रात लगाकर बेमन से अपने को तैयार किया था उस लड़के के लिए और दूसरे दिन ही शादीपक्की हो गई थी.

तीन भाइयों में सबसे बड़े जीजाजी पर ही पूरे घर की जिम्मेदारी थी. उनकी इकलौती छोटी बहन की शादी तो बड़ी दी के ही सारे सामानों को देकर निबटा दिया गया था. बड़ी दी के लिए मां की शौक से खरीदी गयी कुछ साड़ियों और गहनों को भी नहीं बख्शा गया था. आज भी कई बार भावुक हो जाती हैं सालों पुरानी साड़ी और गहनों वाली उस बात को लेकर. शादी के बाद बोकारो चली गई थी बड़ी दी. तब से कुछ सालों तक चिट्ठियों में सिर्फ हमारे भले की बातें लिखती रहीं. लेकिन हर बार की चिट्ठी से बिलकुल अलग था इस बार का मेल. हिंदी की अपनीपूरी चिटठी को रोमन लिपि में लिखा था उन्होंने.

प्यारी छोटी.

ढेरों प्यार.

उम्मीद है तुम. मेहमान और पीहू तीनों अच्छे होंगे. तुम्हारे कहने पर मैने आखिर मेल लिखना सीख ही लिया. अब मैं बहुत कुछ करना चाहती हूं छोटी. उम्र पचास साल ही तो है मेरी. अब एक नई जिंदगी शुरू करनी है मुझे. अच्छा है तुम अपने पैरों पर खड़ी हो. लड़की को हमेशा अपने पैरों पर खड़े होना चाहिए. शादी का मतलब मैं कुछ और सोचती थी लेकिन जीना किसी और मायने में पड़ा. तुम्हें शायद याद न हो छोटी कि मेरी शादी के साल ही एम ए फाइनल की अंतिम परीक्षा थी. तब रमेश ने घर में खूब हंगामा खड़ा किया था मेरे मुजफ्फरपुर आने पर. कहने लग थे. 'परीक्षा के बहाने कितनी बार मायके जाओगी'? मेरा एक पेपर तब तीन बार कैसिंल भी हो गया था पेपर आउट होने के कारण. बहुत मुश्किल से दे पायी थी अपनी पूरी परीक्षा. फिर वापस गयी थी बोकारो. अभी पहली एनिवर्सरी भी कहां हुई थी मेरी कि रमेश के घरवालों ने मुझे उलाहना देना शुरू किया था कि मैं बांझ हूं.

साहित्य संध्या में आज पढ़ें, एक औरत के संघर्ष की कहानी ‘ बड़ी दी’



पहली दीवाली पर ससुराल गयी थी मैं और रमेश की मां ने बच्चे के लिए उल्टी सीधी सुनानी शुरू कर दी थी. उसके दसवें दिन ही रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी मेरी. सातवें महीने में एनीमिक होने के कारण मुझे मां के पास जाना पड़ा था और रीतिका का जन्म हुआ था. तीन महीने बाद आए थे रमेश अपनी बिटिया से मिलने. मुझसे मिलने की तो बातही छोड़ो. बेटे लाने की जल्दीबाजी में दूसरे साल ही फिर से प्रेगनेंट हो गई थी मैं . इस बार घरवालों से भी ज्यादाजल्दी रमेश को थी. लेकिन उनका सपना पूरा नहीं होने वाला था. उन्होंने गलत तरीके से टेस्ट कराकर पता कर लिया कि लड़की होने वाली है. मेडिसीन दिया था एबॉर्ट कराने के लिए लेकिन हुआ नहीं और गीतिका का आगमन हुआ था अपनी नानी के घर में ही. जाहिर था इस बार तो रमेश को अपनी बेटी से मिलने की जरूरत कहां से महसूस होती.

कोई चार महीने बाद पापा मुझे लेकर बोकारो गए थे तो वहां रमेश के मां पापा आए हुए थे. उन्होंने बातों ही बातों में रात में पापा से कहा था. 'बेटे के लिए तो अब कुछ करना ही पड़ेगा रामायण बाबू '. पापा घबराते हुए बोले थे. 'इसका क्या मतलब हुआ'? 'मतलब क्या कि खानदान चलेगा कैसे? रमेश की एक और शादी करनी होगी'. बोला था रमेश के पापा ने. फिर तो मुझे कोई उपाय न सूझा था और तीसरी बार कनसीव किया कि रमेश तुम्हें बेटे का बाप भी मैं ही बना दूंगी. हालांकि मेरी तबियत को देखकर डॉक्टर ने मना किया था मुझे. लेकिन सौत के आने से तो अच्छा ही विकल्प था ना छोटी. गन्नू के जन्म के छह महीने बाद ही मैं हार्ट की मरीज बन गई थी.

पांचवें साल में मुझे दिल्ली जाकर एम्स में अपना बाईपास कराना पड़ा था. लगा जैसे अपनी शादी से ही मुझे सदमा लग गया. मुझे क्या पता था मेरे साथ ऐसा कुछ होगा. मन को बिलकुल तार -तार कर दिया था अपने ही पति ने. खैर सब कुछ भूलकर मैं अपने बच्चों की जिंदगी संवारने में ऐसे लग गई कि अपना अस्तित्व भी जैसे याद नहीं रहा. गीतिका और रीतिका कीमेडिकल की पढ़ाई के बाद दोनों की जब शादियां हो गई तब मुझे अहसास होने लग गया कि मैंने अपने साथ पूरीजिंदगी ज्यादती की. इस अहसास को और पुख्ता किया एक बार फिर से रमेश ने.

उस दिन गन्नू अपनी गर्लफ्रेंड को लेकर आया था घर में. अब लगभग तय था कि दोनों शादी करने वाले हैं और गन्नू ने मुझे इस बारे में बताया तो मैंने मीनू को खाने पर बुला लिया था . मैंने सोचा रमेश को होनेवाली बहू से भीमिलवा दूंगी. ऐसा व्यवहार करेंगे रमेश इसका मुझे जरा भी अंदाजा नहीं था. मीनू के सामने तो कुछ नहीं बोलालेकिन उसके जाते ही मुझ पर बिफर पड़े. गन्नू के मना करने के बावजूद चिल्लाते हुए कहा था. 'चली जाओ जहां सेआई थी. ज्यादा मालकिन बनने की जरूरत नहीं है'. मुझे मेरी औकात बताकर रमेश अपने कमरे में चले गए थे .उस दिन मैं निकल पड़ी थी रमेश के घर से बगैर ये सोचे समझे कि कहां जाऊंगी. सोचा सत्ताईस वर्षों में जब अपनाघर नहीं बना सकी तो अब वहां मेरा ना रहना ही अच्छा. मैं स्टेशन पहुंच चुकी थी अपने नए गंतव्य को ढूंढने केलिए. गन्नू और रमेश दोनों पहुंचे थे पीछे से. गन्नू ने हांफते हुए कहा था. 'मां आपके बिना उस घर में हम कैसे रहेंगे ? एक मौका दे दीजिये पापा को'. पापा से सॉरी बुलवाया था.

हालांकि जानती हूँ कि एक सॉरी तो काफी नहीं था . लेकिन अभी फिलहाल गन्नू और मीनू की शादी कराने कीजिम्मेदारी को निभाना ठीक लग रहा है. तब तक मैं कंप्यूटर सीख रही हूं क्योंकि एक स्कूल में मुझे बतौर काउंसलरपार्ट टाइम नौकरी मिल गई है और अगले महीने ज्वाइंन करना है. मनोविज्ञान से एम ए पढ़ने का यही एक फायदा हुआ. हालांकि पैसे ज्यादा नहीं देंगे लेकिन इतना दे रहे हैं कि मेरा खर्चा निकल जाएगा. अब से एक स्वाभिमानी औरत की जिंदगी जीने की तमन्ना पूरी कर लेती हूं नहीं तो बाकी की जिंदगी के लिए भी अपने आप को माफ नहीं कर पाऊंगी. कंप्यूटर सिखाने वाली लड़की बता रही थी कि एक वेबसाइट बनाकर काउंसेलिंग के काम को आगे बढ़ा सकती हूं कि वो उसमें मेरी मदद करने को तैयार है. आज ही शाम में स्मार्ट फ़ोन भी लेकर आऊंगी और सोशल मीडिया पर एक्टिव हो जाऊंगी . और हाँ. आज सुबह ही मैंने पहली बार अपनी नई हेयरस्टाइल भी बनवाई है. बताना कैसी लग रही हूं.

पीहू को प्यार देना.

तुम्हारी.

बड़ी दी.

सॉरी बड़ी दी. आपके लिए कुछ कर नहीं पाई. मुझे पता ही कहां था कि आप ऐसी जिंदगी जी रही थी जो सताईस वर्षों में एक घर न दे पाया आपको. पर मुझे पूरा यकीन है कि शादी के जुए में तो जरूर हार गईं लेकिन इसकेलिए अपनी पूरी जिंदगी को नहीं हरा सकती हैं आप. तभी तो बच्चों की परवरिश के लिए लोग आपसे फोन पर भी सलाह मांगा करते हैं कि आखिर आज के समय में कैसे इतने समझदार बच्चे निकले आपके. आप की चिट्टियों ने हम दोनों बहनों की मंजिलों को भी आसान कर दिया था. और अब मुझे सुकून यह है कि काउंसलिंग की नौकरी एकतरफ जहां राहत आपको देगी वहीं दूसरी तरफ अपनी जिंदगी के अनुभवों से कम से कम कुछ ऐसे बच्चों को आप जरूर गढ़ देंगी जो अपनी जिंदगी में और बातों के अलावा शादी के भी सही मायने को समझ पायेंगे.

लेखिका का परिचय :

निभा सिन्हा

स्वतंत्र पत्रकार एवं गेस्ट लेक्चरर

जनसंचार एवं पत्रकारिता में एम फिल

मानवाधिकार में पी जी डिप्लोमा

आजकल. शोध समागम . मीडिया मैप जैसी साहित्यिक एवं सांस्कृतिक पत्रिकाओं एवं शोध जर्नल में प्रकाशन.

पता: गौड़ ग्रीन सिटी. वैभवखंड.

इंदिरापुरम. ग़ाज़ियाबाद.

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