UPSC Lateral Entry : ब्यूरोक्रेसी में क्या है लेटरल एंट्री? हंगामे के बाद पीएम मोदी ने लगाई नियुक्ति पर रोक
Published by : Rajneesh Anand Updated At : 20 Aug 2024 2:47 PM
UPSC Lateral Entry : यूपीएससी की ओर से 17 अगस्त को एक विज्ञापन जारी किया, जिसमें ज्वाइंट सेक्रेटरी, डायरेक्टर और सेक्रेटरी लेवल के अधिकारियों की नियुक्ति के लिए आवेदन मांगा गया. यह नियुक्ति लेटरल एंट्री के जरिए होनी थी, जिसपर रोक लगा दिया गया है. इस विज्ञापन के जरिए 45 पदों पर नियुक्ति होनी थी. लेटरल एंट्री की जरूरत सबसे पहले यूपीए सरकार ने महसूस की थी, तो फिर राहुल गांधी क्यों कर रहे थे इसका विरोध? लेटरल एंट्री क्या है? इन तमाम बातों की जानकारी के लिए पढ़ें यह आलेख…
UPSC Lateral Entry : यूपीएससी में लेटरल एंट्री को लेकर एक विज्ञापन 17 अगस्त को प्रकाशित किया, जिसमें ज्वाइंट सेक्रेटरी और डायरेक्टर एवं सेक्रेटरी लेवल के अधिकारियों की नियुक्ति के लिए आवेदन मांगा गया, जिसे प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बाद रोक दिया गया है. कार्मिक विभाग के मंत्री जितेंद्र सिंह ने यूपीएससी की चेयरमैन प्रीति सूदन को पत्र लिखकर कहा है कि सोशल जस्टिस को ध्यान में रखते हुए पीएम मोदी ने इस नियुक्ति के विज्ञापन को रोकने का आग्रह किया है. वर्तमान में जो व्यवस्था थी उसके अंतर्गत अगर एक पद पर नियुक्ति होनी थी,तो उसमें आरक्षण लागू नहीं था, इसपर नए सिरे से विचार करने के लिए फिलहाल नियुक्ति पर रोक लगा दी गई है.
इस विज्ञापन के जरिए जिन पदों पर नियुक्ति होनी थी अमूमन उन पदों पर आईएएस अधिकारियों की नियुक्ति होती थी. यूपीएससी ने लेटरल एंट्री के लिए काॅन्ट्रैक्ट बेसिस पर आवेदन मांगा था, जो तीन साल का था और उसे बढ़ाकर पांच साल तक किया जा सकता था. यूपीएससी द्वारा यह विज्ञापन जारी किए जाने के बाद से राजनीतिक जगत में हंगामा मच गया . विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इसे एसएसी-एसटी और ओबीसी का हक मारने वाला बताया है. कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खरगे, अखिलेश यादव और मायावती सहित विपक्ष के कई नेताओं ने बीजेपी की मनमानी बताया है और आरोप लगाया है कि लेटरल एंट्री के जरिए बीजेपी ब्यूरोक्रेसी में अपने लोगों को भरना चाहती है और युवाओं का हक मारना चाहती है.


क्या है लेटरल एंट्री?
लेटरल एंट्री की परिकल्पना किसी विभाग में उस क्षेत्र के एक्सपर्ट की नियुक्ति से जुड़ी है. जिन्हें आईएएस जैसी परीक्षा नहीं देनी होती है और उनकी नियुक्ति सीधे होती है. हां, चूंकि वे संबंधित विषय के एक्सपर्ट होते हैं, इसलिए उनके पास पर्याप्त शिक्षा और विशेषज्ञता होती है. ये एक्सपर्ट अनुभवी व्यक्ति होते हैं और इनकी नियुक्ति काॅन्ट्रैक्ट पर तीस से पांच साल के लिए होती है. इंटरव्यू लेकर इनका चयन किया जा रहा है.
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कब हुई थी ब्यूरोक्रेसी में लेटरल एंट्री की शुरुआत?
ब्यूरोक्रेसी में लेटरल एंट्री का काॅन्सेप्ट सबसे पहले यूपीए सरकार के दौरान सामने आया था. द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग जिसकी अध्यक्षता वीरप्पा मोइली कर रहे थे, उन्होंने एक्सपर्ट की नियुक्ति लेटरल एंट्री के जरिए करने की वकालत की थी. उसके बाद 2017 में नीति आयोग ने अपने तीन साल के एजेंडे में इसे जगह दी और 2018 में नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में पहली बार लेटरल एंट्री के लिए आवेदन मांगा गया, जिसमें यह बताया गया कि लेटरल एंट्री तीन से पांच साल तक के काॅन्ट्रैक्ट पर होगी. उस वक्त सिर्फ ज्वाइंट सेक्रेटरी के पदों पर नियुक्ति के लिए आवेदन मांगा गया था. अबतक देश में कुल 63 नियुक्तियां लेटरल एंट्री के जरिए हुई हैं, जिनमें से 57 अभी भी देश भर में कार्यरत हैं.
राजनीतिक दल क्यों हैं आमने-सामने?
लेटरल एंट्री को लेकर राजनीतिक दल आमने-सामने हैं. कई लोग इसे बीजेपी की साजिश बता रहे हैं, ताकि वे अपने लोगों को ब्यूरोक्रेसी में शामिल कर सके, वहीं कुछ इसे दलितों, पिछड़ों का हक मारने वाला बताया है. जिनमें राहुल गांधी, अखिलेश यादव, मल्लिकार्जुन खरगे, मायावती जैसे नेता शामिल हैं. वहीं सरकार की ओर से अश्विनी वैष्णव ने कहा है कि राहुल गांधी आज लेटरल एंट्री का विरोध कर रहे हैं, जबकि उनकी ही सरकार ने इसकी वकालत की थी. इसलिए उनका असली चेहरा क्या है यह सबके सामने हैं. वहीं कांग्रेस के नेता शशि थरूर ने लेटरल एंट्री का समर्थन किया है. उन्होंने कहा कि लेटरल एंट्री से हमें किसी खास विषय के जानकार की सेवा मिल सकती है. अन्यथा विशेषज्ञता की कमी हमेशा बनी रहेगी. लेटरल एंट्री में जहां सिर्फ एक वेकेंसी है, वहां आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं होगी, लेकिन एक से अधिक पद होने पर आरक्षण की नीतियों का पालन होगा. इन कारणों से ही विपक्ष हमलावर है.
सरकार की मंशा पर राहुल गांधी ने उठाए सवाल : रशीद किदवई
राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई ने प्रभात खबर के साथ बातचीत में कहा कि सरकारों को एक्सपर्ट की जरूरत होती है और सरकारें इनकी सेवा लेती रही हैं. कांग्रेस के शासनकाल में भी एक्सपर्ट की नियुक्ति होती थी, जो सरकार को मदद करते थे. मोटेंक सिंह आहलुवालिया, रघुराम राजन खुद मनमोहन सिंह इसके उदाहरण हैं, लेकिन इनकी नियुक्ति यूपीएससी के जरिए नहीं हुई थी. आज भी सरकारें कंसल्टेंसी के जरिए एक्सपर्ट्स की सेवाएं ले रहे हैं, फिर यूपीएससी के जरिए लेटरल एंट्री की जरूरत क्यों? यूपीएससी के जरिए जो नियुक्तियां होती हैं उसमें आरक्षण की व्यवस्था होती है, अगर सरकार यूपीएससी के जरिए लेटरल एंट्री करेगी तो एसएसी-एसटी और ओबीसी का हक तो निश्चित तौर पर मारा जाएगा. इसलिए राहुल गांधी और तमाम अन्य विपक्षी दलों ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाए.
रशीद किदवई ने कहा कि कंसल्टेंसी के जरिए जो लोग सेवा में आते हैं, वे दो वर्ष के लिए होते हैं, उसके बाद की सेवा के लिए कुछ औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ती है, संभवत: उनसे बचने के लिए सरकार ने लेटरल एंट्री के बारे में सोचा होगा. साथ ही जो लोग लेटरल एंट्री के जरिए आएंगे उन्हें सरकार को पेंशन भी नहीं देना होगा. एक्सपर्ट हमेशा से नियुक्त हुए हैं, सुमन दुबे राजीव गांधी के साथ थे, एमजे अकबर भी सरकार में थे. आज के समय में 1000 से ज्यादा लोग कंसल्टेंसी के जरिए काम कर रहे हैं, जो बहुत बड़ी संंख्या है. Government e Marketplace (GeM) जैसी कंसल्टेंसी के जरिए भी लोग आते हैं और काम करते हैं.
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लेटरल एंट्री क्या है?
लेटरल एंट्री के जरिए जिनकी नियुक्ति होती है, उन्हें परीक्षा नहीं देनी पड़ती है, सीधे इंटरव्यू के जरिए नियुक्ति होती है.
लेटरल एंट्री के जरिए पहली बार नियुक्ति कब हुई थी?
2018 में पहली बार लेटरल एंट्री के जरिए नियुक्ति हुई थी.
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लेखक के बारे में
By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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