जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित होते युवा

climate change impact on youth
जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ़ नीति-कागज़ों तक सीमित नहीं, बल्कि बिहार, झारखंड, यूपी और पश्चिम बंगाल के लाखों युवाओं के जीवन का सच बन गया है। खराब होती फसलें, बंद स्कूल और बिगड़ता मॉनसून उनकी पढ़ाई, कमाई और भविष्य को सीधे तौर पर प्रभावित कर रहा है।
-आलोक कुमार पांडेय, प्रोजेक्ट एसोसिएट सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन डिजास्टर मैनेजमेंट विकास प्रबंधन संस्थान (डीएमआइ)-
जलवायु परिवर्तन को लेकर जो बहस बरसों तक सम्मेलन कक्षों, नीति दस्तावेजों और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक सीमित रही, वह अब बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के लाखों युवाओं के जीवन का सीधा हिस्सा बन चुकी है. उन युवाओं के, जिन्होंने न तो यह संकट पैदा किया और न इसे रोकने का बड़ा अधिकार अभी उनके हाथों में है. फिर भी खराब होती फसलें, बंद होते स्कूल और साल-दर-साल बिगड़ता मॉनसून सबसे पहले और सबसे गहरी चोट उन्हीं की पढ़ाई, कमाई और भविष्य की योजनाओं पर कर रहे हैं. इस बार भी मॉनसून ने वही किया, जो पिछले कुछ वर्षों से उसकी आदत बन गयी है- देर से आना, फिर बीच में ठहर जाना. मौसम विभाग के अनुसार जून, 2026 में देश में औसतन करीब 40 प्रतिशत कम बारिश दर्ज हुई, और इसका सर्वाधिक असर पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत पर पड़ा, यानी ठीक वही क्षेत्र जहां बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश आते हैं.
इस बीच अंतरराष्ट्रीय जलवायु प्रदर्शन सूचकांक (सीसीपीआइ) 2026 में भारत 13 पायदान गिरकर 23वें स्थान पर आ गया. एक वर्ष पहले तक जो देश ‘हाइ परफॉर्मर’ श्रेणी में था, अब ‘मध्यम’ श्रेणी में सिमट गया है. ये आंकड़े दूर की बात नहीं लगते, जब घर के आसपास ही इनका असर दिखने लगे. मुजफ्फरपुर में इस बार शाही लीची की फसल आधी से भी कम रही. बेमौसम बारिश और कीट के हमले ने उस फल को बुरी तरह प्रभावित किया, जो अकेले बिहार से देश के करीब 43 प्रतिशत लीची उत्पादन का हिस्सा है. यह सिर्फ किसानों की समस्या नहीं, यह उस पूरी युवा पीढ़ी की समस्या है जिसके करियर, कमाई और स्टार्टअप जैसे सपने एग्री बिजनेस, फूड प्रोसेसिंग और एक्सपोर्ट सप्लाई चेन से जुड़े हैं. झारखंड में तस्वीर थोड़ी अलग है : वहां जेएसएलपीएस से जुड़े करीब तीन लाख महिलाओं के स्वयं सहायता समूह अब सिर्फ बचत तक सीमित नहीं रहे, बल्कि गांव स्तर पर जलवायु जोखिम मैप करने और स्थानीय एक्शन प्लान बनाने में जुट गये हैं.
यानी समाधान भी अब उन्हीं जमीनी समुदायों से निकल रहे हैं, जो सबसे पहले असर झेलते हैं. पश्चिम बंगाल में सुंदरबन जैसे इलाके समुद्र स्तर के बढ़ने और बार-बार आने वाले चक्रवातों की मार झेल रहे हैं, तो उत्तर प्रदेश में असमय बारिश और लू की जोड़ी हर वर्ष फसल और स्कूल दोनों पर भारी पड़ती है. यह बेचैनी सिर्फ भारत की नहीं है. कुछ सप्ताह पहले, अमेरिका के फिलाडेल्फिया में 14 से 21 वर्ष के युवाओं ने कला और कविता के जरिये अपने शहर की बढ़ती गर्मी और अचानक आने वाली बाढ़ को शब्दों में उतारा. लगभग उसी दौर में यूनेस्को से जुड़े एक वैश्विक युवा नेटवर्क ने मांग रखी कि जलवायु आपदाओं की वजह से बाधित होने वाली पढ़ाई को अब शिक्षा के अधिकार से जोड़कर देखा जाये. यह दिखाता है कि पटना का कोई छात्र, फिलाडेल्फिया का कोई कवि और अफ्रीका या दक्षिण एशिया का कोई युवा, सब एक ही प्रश्न से जूझ रहे हैं : क्या हमारा भविष्य सुरक्षित है?
आपदा जोखिम संचार और व्यवहार परिवर्तन के क्षेत्र में छोटे शहरों में जलवायु अनुकूलन से जुड़ी परियोजना पर काम करते हुए यह बात बार-बार सामने आयी है कि आंकड़े और नीतियां अपनी जगह जरूरी हैं, पर बदलाव जमीन पर तभी टिकता है, जब उसके वाहक युवा बनते हैं, जो जलवायु परिवर्तन की जमीनी हकीकत को डिजिटल यूजर्स के बीच सहज तरीके से ला रहे हैं. एक किसान का अनुभव, किसी स्वयं सहायता समूह की महिला की योजना, या किसी युवा कवि की चार पंक्तियां अक्सर वह बात समझा देती हैं, जो पन्नों भर के आंकड़े नहीं समझा पाते. यही वजह है कि जागरूकता अभियानों को अब नीति के साथ-साथ युवा कंटेंट क्रिएटर में भी उतना ही निवेश करना होगा. जलवायु परिवर्तन को रोकने में युवाओं की सार्थक भागीदारी के मजबूत उदाहरण भी देखने को मिल रहे हैं. 'मिशन लाइफ अभियान' अब तक करोड़ों नागरिकों से पर्यावरण अनुकूल आदतें अपनाने की शपथ दिलवा चुका है, 'माइ भारत' के तहत सैकड़ों शहरों के स्कूलों में इको क्लब बन चुके हैं, और इंदौर जैसे शहर में तो युवाओं की राय को सीधे शहर की जलवायु नीति में जगह मिल रही है.
तीस सेकंड की एक रील आज उतनी ही तेजी से लू से बचाव या जल संरक्षण की जानकारी फैला सकती है, जितनी किसी भाषण या पर्चे से कभी संभव नहीं थी, बशर्ते वह जानकारी सही हो, स्थानीय भाषा में हो और सतत बनी रहे. तो वास्तविक प्रश्न अब यह नहीं कि आज का युवा जलवायु परिवर्तन को लेकर वाकिफ है या नहीं. प्रश्न यह है कि क्या हमारे स्कूल, हमारी संस्थाएं और हमारी सरकारें इस जागरूकता को गंभीरता से लेने और ठोस कार्रवाई में बदलने के लिए तैयार हैं, पाठ्यक्रम में, नीति-निर्माण की मेज पर, और उसी डिजिटल भाषा में, जिसमें आज का युवा सबसे पहले सुनता और समझता है. यदि यह पीढ़ी जाग रही है, तो यह चेतावनी नहीं, एक अधिक टिकाऊ और जवाबदेह भविष्य गढ़ने का मौका है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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By Prabhat Khabar Digital Desk
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