E20 Petrol Controversy : फायदे का सौदा या नई मुसीबत! जानिए क्या है एथेनॉल विवाद

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AI द्वारा बनाया गया तस्वीर

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कहानी शुरू हुई थी विदेशी तेल पर भारत की निर्भरता कम करने के इरादे से, सरकार ने एथेनॉल पर बड़ा दांव लगाया और देखते ही देखते E20 तक पहुंच गया. फिर इस कहानी में ऐसा क्या हुआ कि अब वाहन मालिक, किसान और विशेषज्ञ इसको लेकर सवाल उठा रहे हैं?

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E20 Petrol Controversy : साल था 2014..भारत हर दिन लगभग 38 लाख बैरल तेल खरीद रहा था. सरकार के रिकॉर्ड के मुताबिक, उस साल 112.74 बिलियन अमेरिकी डॉलर ( लगभग ₹6,87,369 करोड़) खर्च कर, भारत ने 189.43 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) कच्चे तेल का आयात किया. हालांकि यह पहली बार नहीं था. उससे पहले से भारत हर साल अरबों डॉलर का कच्चा तेल खरीद रहा था. हां कीमतें इधर-उधर जरूर रहती थी.

इसका एक मतलब ये था कि सरकार अपने पैसे का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ तेल खरीदने के लिए कर रही थी. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण, इसके विकल्पों की तलाश तेज हुई. सरकार ने एक रास्ता चुना, पेट्रोल में एथेनॉल मिलाना.

एथेनॉल गन्ना, मक्का और दूसरे खेती के उत्पादों से आसानी से बन जाता है, और जानकारों के मुताबिक पेट्रोल के बदले उपयोग में लाया जा सकता था.

सरकार को इससे तीन बड़े फायदे दिख रहे थे...

  • विदेशों से तेल कम खरीदना पड़ेगा.
  • किसानों को अपनी फसल के लिए नया बाजार मिल जाएगा.
  • और पर्यावरण को भी कम नुकसान होगा.

फिर क्या था..सरकार ने इस ओर कदम बढ़ाने शुरू कर दिए.

कैसे और कब शुरू हुई भारत के एथेनॉल मिशन की कहानी

हालांकि उससे पहले से ही सरकार पेट्रोल में एथेनॉल मिलाना शुरू कर दिया था. भारत ने पहली बार 2001 में एक छोटे-से प्रयोग के तौर पर पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की शुरुआत की थी. जिसका मकसद और उद्देश्य साफ था.

  • विदेशों से आयात होने वाले कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना,
  • किसानों को उनकी फसलों का बेहतर दाम दिलाना
  • पर्यावरण को अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन देना

दो साल बाद जनवरी 2003 में भारत सरकार ने एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम की औपचारिक रूप से शुरूआत की, लेकिन शुरुआती दिनों में कई कारणों के चलते यह योजना कागज से आगे नहीं बढ़ सका. इसके रफ्तार अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि लगभग 10 साल बाद यूपीए सरकार ने 2013 में एथेनॉल ब्लेंडिंग से जुड़ी अधिसूचना जारी की. हालांकि अधिसूचना जारी होने के बाद भी जमीनी स्तर पर इसके रफ्तार में तेजी नहीं आई. इसके पीछे जो सबसे बड़े कारण बताए जा रहे थे, उसमें

गन्ने से बनने वाले एथेनॉल की सीमित उपलब्धता, इसके कीमतों को लेकर अनिश्चितता, और तेल कंपनियों द्वारा एथेनॉल की खरीद प्रक्रिया में उदासीनता

शामिल था. नतीजा 2014 तक देश के पेट्रोल में एथेनॉल की हिस्सेदारी महज 1.5 प्रतिशत के आसपास ही थी.

फिर आया कहानी में नया मोड़...

दिसंबर 2014 में केंद्र सरकार ने एथेनॉल खरीद के लिए प्रशासित मूल्य तंत्र (Administered Price Mechanism) को दोबारा लागू किया. सरकार ने एथेनॉल की कीमत तय करने की जिम्मेदारी अपने हाथ में ली, जिससे चीनी मिलों और एथेनॉल उत्पादकों को भरोसा मिला और तेल कंपनियों के लिए खरीद प्रक्रिया सरल हुई. इसी फैसले ने एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम में नई जान फूंकी. एथेनॉल की आपूर्ति तेजी से बढ़ने लगी और अगले कुछ वर्षों में उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश भी शुरू हो गए...

एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम में आए इस बदलाव को 16 मई 2018 को नई दिशा तब मिली, जब केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति-2018 को मंजूरी दी. इस नीति ने एथेनॉल उत्पादन का दायरा केवल गन्ने तक सीमित नहीं रखा.बल्कि खराब अनाज, टूटे चावल और मक्का जैसी फसलों से भी एथेनॉल बनाने की अनुमति दी गई. साथ ही 2030 तक पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण (E20) का लक्ष्य तय किया गया. ऊर्जा सुरक्षा और तेल आयात में कमी लाने की महत्वाकांक्षा के चलते इस लक्ष्य को पांच साल पहले, यानी 2025 तक हासिल करने का फैसला किया गया और सरकार के अनुसार, 2025 तक E20 रोलआउट का लक्ष्य पूरा भी कर लिया गया.

एथेनॉल वाले पेट्रोल से क्यों डर रहे हैं लोग

मतलब, एक समय जो मिश्रण स्तर 1.5 प्रतिशत पर अटका हुआ था, वह आज देशभर के पेट्रोल पंपों पर मानक बन चुका था. शुरुआत में पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा बहुत कम थी.. फिर धीरे-धीरे E10 (10% एथेनॉल) पूरे देश में लागू हुआ और आज सरकार E85 की बात भी कर रही है. नतीजा, देशभर में नई डिस्टिलरी लगीं, हजारों करोड़ रुपये का निवेश हुआ और एथेनॉल उत्पादन क्षमता कई गुना बढ़ाई गई..योजना इतनी आकर्षक थी कि किसी ने ज्यादा सवाल नहीं उठाए. सब कुछ एक सफलता की कहानी जैसा दिखाई दे रहा था.

आज स्थिति यह है कि देश में एथेनॉल बनाने की क्षमता तो बहुत बढ़ गई है, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा पूरी तरह उपयोग नहीं हो पा रहा. अब इस अतिरिक्त क्षमता को काम में लाने के लिए E20 से भी आगे बढ़कर E85 जैसे मिश्रणों की चर्चा होने लगी है. हालांकि फिलहाल E85 केवल फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए उपयुक्त माना जाता है और इसे आम पेट्रोल के रूप में लागू करने की कोई घोषणा नहीं हुई है. भारत के लिए फिलहाल यहीं चिंता भी है. भारत की सड़कों पर आज भी करोड़ों ऐसे वाहन हैं, जिन्हें कम एथेनॉल मिश्रण (E10 या उससे कम) को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया था.

बचत होगी तो आम नागरिकों की जेब भी होगी ढीली

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि E20 से अधिक एथेनॉल मिश्रण व्यापक रूप से लागू किया गया और पुराने वाहन उसी ईंधन का उपयोग करने लगे, तो कुछ वाहनों में इंजन, फ्यूल पाइप और अन्य पुर्जों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है. नतीजा जंग लगने, माइलेज घटने और रखरखाव का खर्च भी बढ़ सकती है. यानी देश की बचत कहीं आम नागरिक के खर्च में न बदल जाए.

दूसरी तरफ एथेनॉल की बढ़ती मांग का असर खेतों तक पहुंच चुका है. पहले जहां गन्ने से ज्यादा चीनी बनती थी, अब उसी गन्ने का बड़ा हिस्सा एथेनॉल की ओर जा रहा है. मक्का की खेती बढ़ रही है और टूटे चावल जैसे खाद्यान्न भी एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल हो रहे हैं. भविष्य में दूसरी पीढ़ी (2G) की तकनीकें कृषि अपशिष्ट, जैसे पराली और अन्य गैर-खाद्य अवशेषों से एथेनॉल बनाएंगी. यदि यह तकनीक सफल होती है, तो खाद्यान्न पर दबाव काफी कम हो सकता है.

भारत अकेला नहीं... दुनिया पहले से दौड़ रही है एथेनॉल की दौड़

ऐसा नही है कि सिर्फ भारत ही एथेनॉल वाला पेट्रोल उपयोग कर रहा है, बल्कि दुनियां के कई देश काफी पहले से ऐसा कर रहे हैं. जब भारत ने पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की रफ्तार तेज की, तब कई लोगों को लगा कि यह कोई नया प्रयोग है. लेकिन हकीकत इससे अलग है. दुनिया के कई बड़े देशों ने दशकों पहले ही एथेनॉल को अपनी ऊर्जा रणनीति का अहम हिस्सा बना लिया था. फर्क सिर्फ इतना है कि उन्होंने यह सफर धीरे-धीरे तय किया, जबकि भारत ने कुछ ही वर्षों में लंबी छलांग लगा दी.

एथेनॉल की बात हो और ब्राजील का नाम न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता. ब्राजील को दुनिया की एथेनॉल कैपिटल कहा जाता है. वहां पेट्रोल में लगभग 27 प्रतिशत एथेनॉल (E27) मिलाना आम बात है और सरकार इस स्तर को 30–35 प्रतिशत तक ले जाने की तैयारी कर रही है. इतना ही नहीं, वहां पेट्रोल पंपों पर E100, यानी लगभग शुद्ध एथेनॉल भी मिलता है. इसकी वजह है कि देश की 80 प्रतिशत से अधिक नई कारें फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक से लैस हैं, जो पेट्रोल और एथेनॉल, दोनों पर आसानी से चल सकती हैं.

दूसरी ओर, अमेरिका एथेनॉल का दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है. यहां मक्के से बड़े पैमाने पर एथेनॉल बनाया जाता है. E10 वर्षों से सामान्य पेट्रोल है, E15 का उपयोग लगातार बढ़ रहा है और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए E85 भी व्यापक रूप से उपलब्ध है.

अमेरिका और ब्राजील मिलकर दुनिया में इस्तेमाल होने वाले लगभग 90 प्रतिशत ईंधन एथेनॉल की खपत करते हैं.

केवल यही दो देश नहीं, बल्कि कई अन्य राष्ट्र भी एथेनॉल मिश्रण को अपनी ऊर्जा नीति का हिस्सा बना चुके हैं. पैराग्वे ने E30 को अनिवार्य कर दिया है. थाईलैंड में E20 सामान्य ईंधन है और सरकार टैक्स रियायत देकर E85 को बढ़ावा देती है. वहीं यूरोप, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में E5 और E10 लंबे समय से आम ईंधन हैं. फिर सवाल उठता है कि भारत को लेकर इतनी चर्चा क्यों हो रही है?

असल वजह एथेनॉल नहीं...फिर क्या दिक्कत है

ब्राजील, अमेरिका और कई अन्य देशों ने 5 प्रतिशत से 20 प्रतिशत मिश्रण तक पहुंचने में दो से तीन दशक लगाए. इस दौरान ऑटोमोबाइल उद्योग को नए इंजन विकसित करने, ईंधन वितरण प्रणाली बदलने और उपभोक्ताओं को तैयार करने का पर्याप्त समय मिला. जबकि भारत ने यह दूरी लगभग एक दशक में तय कर ली. 2014 में जहां एथेनॉल मिश्रण मुश्किल से 1.5 प्रतिशत था, वहीं 2025 तक देश ने E20 का लक्ष्य हासिल कर लिया. ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से यह बड़ी उपलब्धि है, लेकिन इतनी तेज रफ्तार ने एक नई बहस भी खड़ी कर दी है, क्या देश की करोड़ों पुरानी गाड़ियां इस बदलाव के लिए तैयार हैं? क्या फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक को पर्याप्त बढ़ावा मिला है? और क्या भविष्य में E85 जैसे हाई मिश्रण की ओर बढ़ने से पहले बुनियादी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं? यही वे सवाल हैं, जिनके जवाब भारत की एथेनॉल नीति का भविष्य तय करेंगे.

तो भारत को अब क्या करना चाहिए?

जानकारों का कहना है कि भारत को एथेनॉल से पीछे नहीं हटना चाहिए. बल्कि अगला कदम अधिक संतुलित होना चाहिए. जिसके लिए जरूरी है कि...

  • पुराने वाहनों के लिए E10 ईंधन की उपलब्धता बनी रहे.
  • नए फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को तेजी से बढ़ावा मिले.
  • दूसरी पीढ़ी की एथेनॉल तकनीकों में निवेश बढ़े.
  • और सबसे महत्वपूर्ण, उपभोक्ता के पास ईंधन चुनने का अधिकार बना रहे.

कुल मिलाकर एथेनॉल केवल एक ईंधन नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा, किसानों की आय और पर्यावरण से जुड़ी बड़ी रणनीति है. लेकिन हर अच्छी नीति तभी सफल होती है जब उसका लाभ देश के साथ-साथ आम नागरिक तक भी पहुंचे. यदि भारत भविष्य में E85 और उससे आगे बढ़ना चाहता है, तो केवल ईंधन नहीं, बल्कि वाहन, बाजार और उपभोक्ता तीनों को साथ लेकर चलना होगा. भारत ने अरबों डॉलर का तेल आयात घटाने के लिए एथेनॉल पर बड़ा दांव तो लगाया. लेकिन अब सवाल उठ रहा है, क्या इस सफलता की कीमत कहीं करोड़ों वाहन मालिकों और उपभोक्ताओं को तो नहीं चुकानी पड़ेगी?


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गौतम कुमार

लेखक के बारे में

By गौतम कुमार

दैनिक भास्कर से शुरू हुआ ये कारवां अब प्रभात खबर तक आ पहुंचा है. पढ़ाई और पत्रकारिता की बारीकियां सीखने का सफर अभी जारी है, किताबों से भी सीख रहा हूं, लोगों से भी और खबरें तो है हीं..

पेशा पत्रकारिता का है, लेकिन जिज्ञासा उसकी सीमाओं से थोड़ी बड़ी है. राजनीति, इतिहास, साहित्य, संगीत, खेल, लोक संस्कृति या फिर मनोरंजन... जो भी नई बात मिले, उसे समझने की कोशिश करता हूं और जो भी दिलचस्प लगे, उसमें खो जाता हूं. किताब कैसी है, इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, मिल जाएं तो वक्त का पता नहीं चलता और हां, अच्छी फिल्में मिल जाएं तो फिर बाकी दुनिया थोड़ी देर के लिए इंतजार कर सकती है.

लिखना पसंद है, इसलिए रोज थोड़ा बेहतर लिखने की कोशिश करता हूं. जो पढ़ता हूं, देखता हूं, समझता हूं और लगता है कि आपकी टाइमलाइन तक पहुंचना चाहिए, वही यहां शेयर करता हूं. हो सकता है एक-आध बात पर आपकी राय अलग हो, लेकिन बातचीत और सीखने का सिलसिला शुरू हो सकता है, इसके लिए आपके सुझाव आंमत्रित है...

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